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दुनिया ज़हूरे इमामे ज़माना अतफ़श से क़ब्ल

⭐दुनिया ज़हूरे इमामे महदी अ.स. से क़ब्ल जब तक हम रौशनी और खुशहाली में होते हैं, उसकी क़्द्रो कीमत का कम अन्दाज़ा होता है। हमें उस वक़्त इसकी हकीकी क़्द्रो कीमत मालूम होगी जब हम जु़ल्मत व तारीकी के घटाटोप अन्धेरे में घिर जायेंगे। जब सूरज उफुक आसमान पर दरख़शां होता है हम उसकी तरफ कम तवज्जो देते हैं, लेकिन जब बादल में छिप जाता है और एक मुद्दत तक अपनी नूरानियत व हरारत से महरूम कर देता है तो उसकी अरज़िश का अन्दाज़ा होने लगता है। ज़हूरे आफताब विलायत के लाज़मी होने का हमें उस वक़्त एहसास होगा जब ज़हूर से पहले बेसरो सामानी और नाअमनी के माहौल से बाख़बर हों, और उस वक़्त के नागुफ्ता बा हालात को दर्क कर लें।  उस ज़माने की कुल्ली तौर पर नकशाकशी, जो रिवायात से माखूज़ है, दर्ज जैल है  इमामे ज़माना अज्जलल्लाहो तआला फराजहू अल शरीफ के ज़हूर से कत्ल फितना व फसाद, हरज व मरज, बेसरोसामानी, नाअमनी, ज़ुल्म व इस्तेबदाद, अद्म मसावात, ग़ारतगरी, कब्ल व कुशतार, और तजावुज़ तमाम आलम को मुहीत होगा और ज़मीन ज़ुल्म व सितम और नाइन्साफी से लबरेज़ होगी। खूनी जंग का आगाज़ मिल्लतो और मुमालिक के दरमियान हो चुका होगा, ...