दुनिया ज़हूरे इमामे ज़माना अतफ़श से क़ब्ल
⭐दुनिया ज़हूरे इमामे महदी अ.स. से क़ब्ल
जब तक हम रौशनी और खुशहाली में होते हैं, उसकी क़्द्रो कीमत का कम अन्दाज़ा होता है। हमें उस वक़्त इसकी हकीकी क़्द्रो कीमत मालूम होगी जब हम जु़ल्मत व तारीकी के घटाटोप अन्धेरे में घिर जायेंगे।
जब सूरज उफुक आसमान पर दरख़शां होता है हम उसकी तरफ कम तवज्जो देते हैं, लेकिन जब बादल में छिप जाता है और एक मुद्दत तक अपनी नूरानियत व हरारत से महरूम कर देता है तो उसकी अरज़िश का अन्दाज़ा होने लगता है।
ज़हूरे आफताब विलायत के लाज़मी होने का हमें उस वक़्त एहसास होगा जब ज़हूर से पहले बेसरो सामानी और नाअमनी के माहौल से बाख़बर हों, और उस वक़्त के नागुफ्ता बा हालात को दर्क कर लें।
उस ज़माने की कुल्ली तौर पर नकशाकशी, जो रिवायात से माखूज़ है, दर्ज जैल है
इमामे ज़माना अज्जलल्लाहो तआला फराजहू अल शरीफ के ज़हूर से कत्ल फितना व फसाद, हरज व मरज, बेसरोसामानी, नाअमनी, ज़ुल्म व इस्तेबदाद, अद्म मसावात, ग़ारतगरी, कब्ल व कुशतार, और तजावुज़ तमाम आलम को मुहीत होगा और ज़मीन ज़ुल्म व सितम और नाइन्साफी से लबरेज़ होगी।
खूनी जंग का आगाज़ मिल्लतो और मुमालिक के दरमियान हो चुका होगा, ज़मीन कुश्तों से भरी होगी, कत्ले नाहक इस कद्र ज़्यादा होगा कि कोई घर या खानदान ऐसा नहीं होगा जिसके एक या चन्द अज़ीज़ कत्ल न हुए होंगे। मर्द व जवान जंगों के असर से ख़त्म हो चुके होंगे। यहां तक कि हर 3 आदमी में 2 आदमी कत्ल हो चुका होगा।
कौम व मिल्लत के दरमियान जान व माल बेवक़्त रास्ते गैर महफूज़ होंगे, ख़ौफ व दहशत हर इन्सान के दिल में बैठी होगी, नागहानी और हादसाती मौतों की कसरत होगी, मासूम बच्चे बदतरीन शिंकजों के ज़रिये ज़ालिम व जाबिर हुक्काम के हाथों कत्ल किये जायेंगे, सड़कों और चौराहों पर हामेला औरतों के साथ तजावुज़ होगा, जान लेवा बीमारियां लाशों की बदबू या अनवाअ व इक्साम हथियार के इस्तेमाल से आम हो जायेंगी, खाने पीने की अशिया में कमी होगी, मंहगाई व कहत से लोगों की ज़िन्दगी मफ्लूज हो जायेगी, ज़मीन बीज कुबूल करने नीज़ उसे उगाने से इन्कार कर देगी, बारिश नहीं होगी, या अगर होगी भी तो बेवक़्त और ज़रर्रसां होगी। कहत ऐसा पड़ेगा कि लोगों की ज़िन्दगी इतनी दुश्वार व मुश्किल हो जायेगी कि बाज़ लोग कुव्वते ला यमूत फराहम न करने की वजह से, अपनी औरतों और बच्चियों को मामूली ग़िज़ा के मुकाबिले दूसरे के हवाले कर देंगे।
ऐसे मुश्किल व नासाज़गार माहौल में इंसान नाउम्मीदी व कुनूतियत का शिकार हो जायेगा और उस वक़्त मौत अल्लाह का बेहतरीन हदिया समझी जायेगी, और सिर्फ और सिर्फ लोगों की आरज़ू मौत बन जायेगी नीज़ ऐसे माहौल में जब कोई शख़्स लाशों के दरमियान या कब्रिस्तान से गुज़र रहा होगा तो उसकी आरजू बस यही होगी कि काश मैं भी इन्हीं में से एक होता ताकि ज़िल्लत की ज़िन्दगी से आसूदा खातिर होता।
उस वक़्त कोई ताकत, पार्टी, अंजुमन न होगी जो इस बेसरो सामानी तजावुज़ व ग़ारतगरी का सद्देबाब करे और सितमगरों व ताकतवरों को उनकी बदकिरदारी की सज़ा दे। लोगों के कानों से कोई नजात की आवाज़ नहीं टकरायेगी, सारे झूठे दावेदार इन्सान की नजात का झूठा नारा लगाने वाले खाएन और झूठे होंगे और इंसान सिर्फ एक मुसलह इलाही, खुदाई मौजिज़े का इन्तेज़ार करेगा और बस, उस वक़्त जब कि यास व नाउम्मीदी तमाम आलम को मुहीत होगी, खुदा वन्दे आलम अपने लुत्फ व रहमत से महदीये मऊद अज्जलल्लाहो तआला फाजहू अल शरीफ को मुद्दतों गैबत के इन्तेज़ार के बाद बशरियत की नजात के लिये ज़ाहिर करेगा और हातिफे गैबी की आसमान से ऐसी निदा आयेगी जो हर एक इंसान के कान से टकरायेगीः
🕋"कि ऐ दुनिया वालो! सितमगरों की हाकमियत का ज़माना खत्म हो गया है, और अब अदले इलाही से पुर हुकूमत का दौर है, और महदी अज्जलल्लाहो तआला फाजहू अल शरीफ ज़हूर कर चुके हैं।"
यह आसमानी आवाज, इंसान के बेजान कल्ब में उम्मीद की रूह फूंक देगी और महरूमीन व मज़लूमीन को नजात का मुज़दाह सुनायेगी।
यकीनन मजकूरा बाला माहौल का इदराक करने के बाद मुसलेह इलाही के ज़हूर की ज़रूरत का एहसास कर सकते हैं नीज़ हज़रत महदी अज्जलल्लाहो तआला फराजहू अल शरीफ की आदिलाना हुकूमत की वुसअत का अन्दाज़ा लगा सकते हैं।
यहां पर इमाम अलैहिस्सलाम के ज़हूर से कब्ल नासाज़गार हालात को रिवायात की नज़र में पांच फसलों में ज़िक्र करेंगे।
📚हुकुमत ए महदी अलैहिस्सलाम ज़हूर से पहले और ज़हूर के बाद, मुसन्निफ़ अल्लामा नजमुद्दीन तबसी
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