शबे आशूर
⚫शबे आशूर शबे आशूर के जै़ल में मोअरेख़ीन का कहना है कि यह रात इमाम हुसैन (अ.) आपके असहाब व अन्सार, अईज़्ज़ा व अकरबा और मुखद्देराते असमत व तहारत ने तसबीह व तक़दीस, हमदो सना और इबादते इलाही में बसर की (तबरी भाग ६ प्रष्ठ २४०) और यह नूरानी काफेला रात भर कभी रूकू में कभी सजूद कभी क्याम और कभी कुऊद में मसरूफ व मशगूल रहा है और उनकी मुनाजाती आवाजें तमाम रात शहद की मक्खियों की अवाजों की तरह फ़िज़ाओं में तहलील होती रहीं। यकीनन इमाम (अ.) के आबिदाना ज़ौक और ज़ाहिदाना मौकुफ का फितरी तकाज़ा भी यही था कि वह अपनी ज़िन्दगी की इस आखिरी रात को अपने माबूद की इबादत, उसकी खुशनूदी और उसकी हमदो सना, में बसर करके उसकी रज़ा को अपनी जानिब मुकम्मल तौर पर मुतवज्जह करते। लेकिन इसके साथ ही इस जिक में यह सवाल भी पैदा होता है कि क्या इमाम आली मुकाम की हयाते ताहेरा का कोई लम्हा ऐसा भी गुज़रा जो इबादत व ऐताअते इलाही से खाली रहा हो ? क्या कोई साअत ऐसी भी गुज़री है जिसमें रज़ाये इलाही आपकी तरफ मुतवज्जह न हो ? अगर इसका जवाब नफी है तो फिर इल्तेवाये जंग और एक शब की मोहलत तलबी का मक़सद क्या था ? जब उमरे साद के सामने पेश की जा...