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इमामे मासूम का हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम पर सलाम

इमामे मासूम का हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम पर सलाम हज़रत साहबुल अस्र अलैहिस्सलाम जियारते नाहिया में हजरत अब्बास पर इन लफ़्ज़ों में सलाम फ़रमा रहे हैं: तर्जुमा : अमीरूल मोमेनीन हज़रत अली के फ़रज़न्द जनाबे अबुल फज़लिल अब्बास अलैहिस्सलाम पर सलाम हो जो अपनी जान अपने भाई पर निसार करने वाले और उन पर कुर्बान होने वाले। उन्हें अपनी रूह के जरिये से बचाने वाले और तलबे आब में अपने हाथों को कटाने वाले थे। खुदा उनके कातिलों यजीद इबने रेकाद और हकीम इबने तुफैल पर लानत करे। (📝बिहारूल अनवार जिल्द 10 स० 208 तबाअ ईरान)

हज़रते अब्बास अलैहिस्सलाम के हाथों क़त्ल होने वालों की तादाद

हज़रत अब्बास के हाथों क़त्ल होने वालों की तादाद हज़रत अब्बास के हाथों से कितने दुश्मनाने इस्लाम क़त्ल हुए हैं। इसकी तफ़्सील बतानी मुश्किल है। क्योंकि वह एक ऐसे बहादुर थे जो हज़रत अली की तरह जब तलवार उठाते थे पुरे के पुरे साफ़ कर देते थे और तलवार से क़त्ल किये जाने वालों की तादाद का लिखना इस लिये भी मुश्किल है कि तक़रीबन हर मुजाहिद मैदान में आपसे मदद चाहता था और आप जाकर तलवार चलाते रहे। अलबत्ता आपने नैज़े से जितने दुश्मनों को क़त्ल किया है उसकी तफ़सील यह है:- ताविया पर सवार होने से पहले 53, ताविया पर सवार होकर 280, नहरे फुरात में उतरने से पहले 800, दाहिना हाथ कटने से पहले 450, बायां हाथ कटने से पहले 50, दोनों हाथ कट जाने के बाद दांतों और कटी हुई कलाई के ज़रिये से 305, दुश्मनों को वासिले जहन्नुम किया। (📚नूरूल ऐन इमामे इस्हाक असफराएनी स० 58 ता 60 तबअ मुम्बई व इसरारूल शहादत आकाए दरबन्दी स0 337 तबअ ईरान)

असहाबे इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम और जन्नत में अपना मुक़ाम

♦️इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने जन्नत दिखला दी हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने असहाबे बावफ़ा का जाएज़ा लेने और पूरा पूरा इत्मिनान कर लेने के बाद अपने क़रीब बुलाते हैं और एक दफ़ा फिर फ़रमाते हैं कि तुम्हारी बातों से तौके बैयत उतारे लेता हूं। यह रात का पर्दा हाएल है इसे सिपर के काम में लाओ और अपनी जान बचा लो। यह दुश्मन तो सिर्फ मेरा खून चाहते हैं। जब मुझे क़त्ल कर लेंगे तो तुम्हारी तरफ़ रूख भी न करेंगे। वह बोले, ख़ुदा की कसम यह तो कभी न होगा।   आपने फ़रमाया। जो कहता हूं उस पर गौर करो। कल तुम सब के सब ज़रूर क़त्ल कर दिये जाओगे और एक भी न बचेगा। अर्ज़ की अलहम्दो लिल्लाह कि हम आपके साथ शहीद होने से मुशर्रफ होंगे। फिर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने असहाब को क़रीब बुलाया और फ़रमाया ज़रा सर तो उठाओ और देखो। उन्होंने सर उठाया और जन्नत में अपनी मंजिल और जगह देखी आप फ़रमाते जाते थे कि ऐ हबीब, ऐ ज़ुहैर वगैरा यह तुम्हारी जगह है यह तुम्हारी जगह है इसी तरह सब को दिखला दिया। उसे देखने के बाद हर शख़्स नैज़ों और तलवारों का अपने सीने और चेहरे से इस्तेक़बाल करने लगा। ताकि जल्द से जल्द जन्नत में दाखिल हो क...

हज़रत अब्बास अ० की ख़िदमत में अमान नामा

⭕हज़रत अब्बास अ० की ख़िदमत में अमान नामा मोहर्रमुल हराम की नवीं तारीख को दिन ढल चुकने के बाद शिम्र अपने खेमे से बरामद हुआ और हज़रम इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के करीब आकर आवाज़ दी। अब्दुल्लाह, जाफ व अब्बास व उस्मान कहां हैं। मेरे सामने आयें। मैं उनके लिये हुक्मे अमान लाया हूं। उन हज़रात ने जब अमन का लफ़्ज़ सुना खामोशी इख़्तियार फमाई और बज़ाहिर जवाब भी देने का इरादा न था। लेकिन हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने शिम्र के कलेमात सुनते ही हज़रत अब्बास अ० से फरमाया। तुम लोग देखो तो सही यह कहता क्या है। अगर चे यह फासिक है, लेकिन तुम्हारा मामू होता है। (1)      {1. अल्लामा कन्तूरी लिखते हैं कि बाज़ रिवायात की बिना पर हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने हज़रत अब्बास से नहीं बल्कि उनके भाईयों से फ्रमाया था कि शिम्र मलाऊन को जवाब दो। उनके एयूने अल्फाज़ यह हैं फकालल हुसैन ला खोतेहि अजबूहो और आपने यह इस लिये कहा था ताकि हज़रत अब्बास अ० का एहतेराम हो सके।} यह सुनकर हज़रत असदुल्लाह अली बिन अबीतालिब के चारों शेर खेमे से निकल पड़े, और करीब जाकर पूछा। क्या कहता है। उसने कहा ऐ मेरे भांजो ! तुम्हारे लिये...

हज़रते अब्बास अलैहिस्सलाम का अपने भाईयों से ख़ेताब

⭕तारीखों से पता चलता है कि हज़रत अब्बास अलमबरदार ने अपने सब भाईयों को शहादत से पहले जमा किया और जब सब इकट्ठा हो गये तो आपने फ़रमाया :- " ऐ मेरे भाईयों ! अब वह वक्त आ पहुंचा है कि तुम लोग भी मैदाने कताल में कदम रखो और ऐसी जंग करो कि मैं अपनी आखो से देख लूँ कि तुमने खुदा और रसूल की राह में अपनी जानें कुर्बान कर वीं। देखो, आज के दिन जान देने से गुरेज़ का महल नहीं है, लेहाज़ा उजलत करो और शर्फे शहादत हासिल करके बारगाहे रिसालत में सुर खुरू हो जाओ। हज़रते अब्बास (अ) ने अपने बेटों और भाईयों की शहादत को अपनी शहादत पर मुकददम क्यों समझा ? इस जैल में साहब मुनाफउल अबरार का कहना है कि मुमकिन है इस ख़्याल के तहत ऐसा किया हो कि कारे खैर में जल्दी करना चाहिऐ इस लिये कि शैतान गैर मासूम को बहका कर अमरे खैर से बाज़ भी रख सकता है। लेकिन मौलाना सय्यद नजमुल हसन साहब करारवी ने अपनी किताब जिकरूल अबास में अपनी राय का इज़हार फरमाया है वह ज़्यादह करीने क़्यास है। आप फरमाते हैं:- " हज़रत अब्बास (अ) ने अपने से इसलिये मुकददम रखा कि मेरी शहादत उनकी नज़रों के सामने न हो। क्योंकि कहीं ऐसा न हो कि मेरे मरने से ...

शबे आशूर इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम का ख़ुत्बा

🔰हज़रत इमाम हुसैन का एक और ख़ुत्बा  रात का एक हिस्सा गुज़र चुका है और तारीकी छा चुकी है। इमाम अलैहिस्सलाम ख़ेमे से बरामद हो कर अपने असहाब के क़रीब जाते हैं, और उनके फिर मजतमा होने का हुक्म फ़रमाते हैं। आने वाहिद में असहाबे बावफ़ा मौजूद होते हैं (📚नासिखुल तवारीख जिल्द 6 स0 247) आप साज की कुर्सी पर जलवा अफ़रोज़ हो कर अपने असहाब से बादीदा पुरनम फ़रमाते हैं। (📝रौज़तुल शोहदा स० 309) मेरे वफ़ादार असहाब मैंने तुम से बारे बैअत उठा लिया तुम अपने क़बीलों और अज़ीज़ों दोस्तों में जा मिलो। फिर अपने अहलेबैत अ० की तरफ़ मुतावज्जेह हो कर फ़रमाने लगे। मैं तुम्हें अपनी जुदाई के मुताल्लिक मशविरा देता हूं। इस लिये कि तुम दुश्मनों की कसरत ओर ताक़त की ताब न ला सकोगे और देखो दुश्मन सिर्फ मुझी को चाहते हैं तुम मुझे दुश्मनों में छोड़ कर चले जाओ बेशक ख़ुदा मेरी मदद करेगा और हमारे आबाओ अजदाद की तरह हम पर नज़रे मरहमत रखेगा। (📚दमअतुस्साकेबा स० 325 व नासेखुत्तवारीख़ जिल्द 6 स0 247) इस ख़ुत्बे के बाद भी जॉबाजों ने दिलेराना जवाब दिया। 📝ज़िकरुल अब्बास अलैहिस्सलाम 

हज़रते जौन अलैहिस्सलाम

⭕हज़रत जौन गुलामे अबुज़र गफ़्फ़ारी की शहादत ज़ुहैर इब्ने कै़न की शहादत के बाद अबु समामा साईदी, हेज़ाज बिन मसरूक, यहीया इब्ने कसीर, ख़ताला इब्ने साअद अब्दुलरहमान बिन हन्ज़ला और उमरू बिन करतता सफे हुसैनी से निकल कर मैदान में आये और एक अन्दाज़े के मुताबिक उन्होंने मजमुई तौर पर तकरीबन २६५ मुखालफीन को कत्ल किया और दर्जए शहादत पर फायज़ हुये। इन शहादतों के बाद हज़रते जौन गुलाम अबुज़र गफ़्फ़ारी इमाम की ख़िदमत में हाज़िर हुये और उन्होंने मैदाने कारज़ार की इजाज़त चाही। इमाम (अ.) ने इस ज़ईफ, सिन रसीदह और क़दीम जॉनिसार को इजाज़त दी। जौन ने मआरका कार ज़ार में दिलेरी और शुजाअत के ज़ौहर दिखाये और बहुत से दुश्मनों को फिन्नार (जहन्नम भेज) करके दर्जेए शहादत पर फायज हुये। इमाम (अ) जिस घड़ी जौन के सिरहाने पहुँच उस वक़्त जान बाकी थी और अबुज़र का यह वफादार गुलाम अपनी बंद आँखों से बेहिश्त के नज़ारे कर रहा था। इमाम (अ.) ने जौन के खून आलूद चेहरे को देखा और फरमायाः- “ अगर कोई ख़्वाहिश है तो ब्यान करो " जौन ने आँख खोल दी और कहा:-" या इब्ने रसूल (स.) मैंने तमाम उमर राहत और नेअमत के दरमियान आपकी ख़िदमत मे...