संदेश

ईदे अकबर ईदे ग़दीर

⭕ग़दीरे ख़ुम का वाक़िआ और जानशीन की तअ़यीन आमाले हज बजा लाने के बाद मुसलमान अपने अपने शहरों और देहात की तरफ़ रवाना हुए। आँ हज़रत स०अ० मदीने की तरफ़ चले। जब आँ हज़रत स०अ० का यह कारवाँ ग़दीरे ख़ुम की सरज़मीन (जहफा से पांच किलोमीटर के फास्ले) पर पहुंचा तो ख़ुदा की जानिब से हज़रते जिबरईल अ०स० सूरए माएदा की आयत नम्बर 67 लेकर आँ हज़रत पर नाज़िल हुए कि उसमें इरशाद हैः القرآن الكريم.. {۞ يَٰٓأَيُّهَا ٱلرَّسُولُ بَلِّغۡ مَآ أُنزِلَ إِلَيۡكَ مِن رَّبِّكَۖ وَإِن لَّمۡ تَفۡعَلۡ فَمَا بَلَّغۡتَ رِسَالَتَهُۥۚ وَٱللَّهُ يَعۡصِمُكَ مِنَ ٱلنَّاسِۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهۡدِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلۡكَٰفِرِينَ《٦٧ المائدة!》} {या अय्योहर्मूलो बल्लिग मा उन्ज़िला इलैका मिर्रब्बेका व इंल लम तअल फ्‌मा बल्लगता रिसालतहू वल्लाहो यअसेमोका मिनन्नासे......} "ऐ पैग़म्बर स०अ० ! आप इस हुक्म को पहुंचा दें जो आपके परवरदिग़ार की तरफ़ से नाज़िल किया गया है और अगर आप ने यह न किया तो गोया उसके पैग़ाम को नहीं पहुंचाया और ख़ुदा आपको लोगों के शर से महफूज़ रखेगा"। दर हक़ीक़त ग़दीर का बियाबान ऐसा चौराहा था जो हिजाज़ के लोगों के रा...

ज़ियारते इमामे अली रज़ा अलैहिस्सलाम की फ़ज़ीलतें

💠 ज़ियारते इमामे अली रज़ा अलैहिस्सलाम की फ़ज़ीलत 🔹इमाम तकी (अ.स.) जो शख़्स मेरे वालिद-ए-माजिद (इमाम रज़ा (अ.स.)) की ज़ियारत करेगा उसके लिए जन्नत है। वसाइल उश शिया, ज10, स304 इमाम सादिक़ (अ.स.) हमारी मौत के बाद हमारी ज़ियारत करने वाला, हमारी ज़िंदगी में हमारी ज़ियारत करने वाले इंसान के मानिंद है। आदाब ए इस्लामी, ज2, स277 इमाम काज़िम (अ.स.) ने इमाम अली रज़ा (अ.स.) की तरफ़ इशारा करके फ़रमाया, "जो शख़्स मेरे इस बेटे की ज़ियारत करेगा उसके लिए जन्नत है"। कामिल उज़ ज़ियारत, स410 इमाम रज़ा (अ.स.) जो हमारी ज़ियारत को नहीं आ सकते, वो हमारे नेक और सालेह शिया की मुलाक़ात करे। उन्हें हमारी ज़ियारत करने का सवाब मिलेगा… ग्रेटर सिंसI, 7 ग्रेटर सिंस इमाम सादिक़ (अ.स.) जो हमारी वफ़ात के बाद हमारी क़ब्रों की ज़ियारत करता है, वो हमारी ज़िंदगी में ही हमारी ज़ियारत कर रहा होता है। मीज़ान उल हिकमा (इंतेखाब ओ तख़लीस), ज3,स71 इमाम रज़ा (अ.स.) जो शख़्स भी मेरी ज़ियारत करेगा और उसे बारिश, सर्दी या गर्मी की कुछ तकलीफ़ पहुंचाएगी तो ख़ुदा उसके जिस्म को दोज़ख पर हराम क़रार दे देगा। वसाइल उश शिया, ज10,स30...

ख़ाके शिफ़ा की फ़ज़ीलत

🔰ख़ाके शिफ़ा की फ़ज़ीलत  "इमाम सादिक (अ.स.) अपने बच्चों को खाक-ए-शिफ़ा की घुट्टी दो के वो बलाओं से महफ़ूज़ रहेंगे। 📝तहजीब उल इस्लाम,स 263" "इमाम काज़िम (अ.स.) जब मय्यत को दफ़्न करें तो उसके मुंह के पास कर्बला की मिट्टी की एक सजदा-गाह रख दें। 📝तहज़ीब उल इस्लाम,स266" "रिवायत" अगर इस पाक मिट्टी (खाक ए शिफ़ा) को माल ए तिजारत में रख दिया जाए, तो वो माल तिजारत में बरकत का बाइस बनेगा। 📝इरफान ए मज़लूम, स22" "रिवायत" अपनी औलाद (नए जन्मे बच्चे) को आब-ए-फ़ुरात और खाक-ए-शिफ़ा की घुट्टी दो। और अगर यह न मिल सके तो बारिश के पानी की दो। 📝वसाइल उश शिया,ज15,स130" "इमाम काज़िम (अ.स.) मोमिन के पास 5 चीज़ें रहनी चाहिए: मिस्वाक (टूथब्रश), कंघी (कंघी), जा-नमाज़, खाक ए शिफ़ा की 34 दाने की तस्बीह और अक़ीक़ की अंगूठी। 📝तहज़ीब उल इस्लाम, स266" "इमाम सादिक़ (अ.स.) बच्चे (नवजात शिशु) को खाक ए क़ब्र ए इमाम हुसैन (अ.स.) (खाक ए शिफ़ा) की घुट्टी दो के उसको बहुत से दर्दों से, बलाओं से, बीमारियों से महफ़ूज़ रखेगी। 📝तहज़ीब उल इस्लाम,स124" "...

मेराज हज़रते रसूले अकरम सअवव

🪐मेराजुन नबी स० अल्लामा जीशान हैदर जव्वादी रक़म तराज़ हैं:- "27 रजब की शब आलमे इस्लाम में वह अज़ीम रात है जिसे "शबे मेराज" कहा जात है। मेराज की दास्तान कुरान मजीद में दो मुकाम पर तफ़सील के साथ ब्यान हुई है। एक मर्तबा सूरये असरा में और दूसरी मर्तबा सूरये वननज्म में। बाज़ ओलमाये कराम ने उन्हें खुसूसियात के पेश नज़र यह रास्ता इख़तियार किया है कि सरकारे दो आलम स० को कम अज़ कम दो मर्तबा मेराज हुई है। एक का हाल सुरये असरा में ब्यान हुआ है जिसका ज़ाहिर सफ़र मस्जिदे अक्सा पर तमाम हो गया था और दूसरी का तज़किरा सूरये वननज्म में है जहाँ सिदरतुल मुनतहा और काबा कौसैन तक तज़किरा है। इस सिलसिले में यह एहतेमाल भी पाया जाता है कि यह दो सफ़र हों ओर यह एहतेमाल भी है कि एक ही सफर दो मरहलों में हों। एक मरहला मस्जिदे अक्सा पर तमाम हुआ और दूसरा मरहला मस्जिदे अक्सा से शुरू हुआ हो और अरशे आज़म पर तमाम हुआ हो। बहर हाल सूरते वाकिया कुछ भी हो। न सरकार स० की मेराज में कोई शक हो सकता है और न रवायात के पेशे नज़र तअदु मवाज में कोई शक किया जा सकता है।" तारीखे अबुलफिदा में है कि जनाबे अबुतालिब की व...

27 रजब उल मुरज्जब बेसते रसूले अकरम सअवव

🌹बेअसत और नुजुले कुरान की इब्तेदा हज़रत रसूले खुदा स० ने बेअसत से दो साल कबल (अड़तीस साल की उम्र में) कोहे हिरा के एक गार को जिसकी लम्बाई चार हाथ और चौड़ाई डेढ़ हाथ थी अपनी इबादत गुज़ारी के लिये मुनतख़ब फ़रमा लिया था और उसी गार में बैठ कर आप इबादत व रियाजत के साथ साथ कमाले मारफ़त के आईने में जमाल व जलाले इलाही का मुशाहिदा फ़रमाते और खान-ए-काबा को देख कर दिली सुकून व क़लबी इत्मिनान महसूस करते। कभी कभी खाने की अशया और पीने का पानी भी अपने हमराह ले जाते और चार चार छः छः दिन क्याम फ़रमाते नीज़ रमज़ानुल मुबारक का पूरा महीना वहीं गुज़ारते थे। मुवरेखीन का ब्यान है कि जब आपकी उम्र चालीस साल एक यौम की हुई तो एक दिन आप इसी आलमे तन्हाई में मसरूफे इबादत थे कि कानों में आवाज़ आई "या मुहम्मद स०" आपने इधर उधर देखा मगर कोई दिखायी न दिया। फिर आवाज़ आयी और फिर आपने देखा तो आपकी नज़र एक नूरानी मख़लूक पर पड़ी। वह हज़रत जिबरील अ० थे. उन्होंने कहा या मुहम्मद स० ! पढ़ो "एकरा" आपने फ़रमाया "मा एक़रा" क्या पढ़ो? जिबरील ने कहा, "एक़रा बइसमे रब्बेकल लज़ी ख़ल्का। फिर आपने सब कु...

जनाबे ज़हरा सअ की अज़्मत मासूमीन अस कि नज़र में

जनाबे ज़हरा सअ की अज़्मत मासूमीन अस कि नज़र में 1 रसूल ख़ुदा (स.अ.व.)  फ़ातिमा (स.अ.) मेरे बदन का टुकड़ा हैं।  📚फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) - तुलु से गुरूब तक,स 21 2 इमाम सादिक़ (अ.स.)  बेशक़, आसमान में फ़ातिमा (स.अ.) का नाम मंसूरा है।  📚फ़ज़ाइल ए अहलेबैत (अ.स.), ज1,स 258 3 रिवायत  जिसने फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) को पहचान लिया, उसने शब ए क़द्र को पहचान लिया।  📚मारेफ़त ए ज़हरा (सअ),स72 4 रसूल ख़ुदा (स.अ.व.)  मेरी बेटी फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) हुरिया है जो ब-शक्ले इंसान पैदा हुई है। 📚बिहार उल अनवर,ज3,स13 5 रिवायत  में है कि जनाबे फ़ातिमा (स.अ.) की वफ़ात मगरिब और ईशा के दरमियान हुई। 📚बैत उल अहज़ान - शेख़ अब्बास कुम्मी,स283 6 इमाम सादिक़ (अ.स.)  अगर तस्बीह ए फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) में शक वक़ए हो उसको एहादा करो (दोबारा पढ़ो)।  📚फुरू ए काफ़ी,ज2,स112 7 इमाम महदी (स.)  बिन्ते रसूल (जे. फ़ातिमा ज़हरा स.अ.) मेरे लिए उस्वातुन हसना (बेहतरीन नामुना) हैं।  📚मारेफ़त ए ज़हरा (सअ),स61 8 इमाम सादिक़ (अ.स.)  तस्बीह ए फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) का शुमार (गिनत...

दुनिया ज़हूरे इमामे ज़माना अतफ़श से क़ब्ल

⭐दुनिया ज़हूरे इमामे महदी अ.स. से क़ब्ल जब तक हम रौशनी और खुशहाली में होते हैं, उसकी क़्द्रो कीमत का कम अन्दाज़ा होता है। हमें उस वक़्त इसकी हकीकी क़्द्रो कीमत मालूम होगी जब हम जु़ल्मत व तारीकी के घटाटोप अन्धेरे में घिर जायेंगे। जब सूरज उफुक आसमान पर दरख़शां होता है हम उसकी तरफ कम तवज्जो देते हैं, लेकिन जब बादल में छिप जाता है और एक मुद्दत तक अपनी नूरानियत व हरारत से महरूम कर देता है तो उसकी अरज़िश का अन्दाज़ा होने लगता है। ज़हूरे आफताब विलायत के लाज़मी होने का हमें उस वक़्त एहसास होगा जब ज़हूर से पहले बेसरो सामानी और नाअमनी के माहौल से बाख़बर हों, और उस वक़्त के नागुफ्ता बा हालात को दर्क कर लें।  उस ज़माने की कुल्ली तौर पर नकशाकशी, जो रिवायात से माखूज़ है, दर्ज जैल है  इमामे ज़माना अज्जलल्लाहो तआला फराजहू अल शरीफ के ज़हूर से कत्ल फितना व फसाद, हरज व मरज, बेसरोसामानी, नाअमनी, ज़ुल्म व इस्तेबदाद, अद्म मसावात, ग़ारतगरी, कब्ल व कुशतार, और तजावुज़ तमाम आलम को मुहीत होगा और ज़मीन ज़ुल्म व सितम और नाइन्साफी से लबरेज़ होगी। खूनी जंग का आगाज़ मिल्लतो और मुमालिक के दरमियान हो चुका होगा, ...