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असहाबे इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम और जन्नत में अपना मुक़ाम

♦️इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने जन्नत दिखला दी हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने असहाबे बावफ़ा का जाएज़ा लेने और पूरा पूरा इत्मिनान कर लेने के बाद अपने क़रीब बुलाते हैं और एक दफ़ा फिर फ़रमाते हैं कि तुम्हारी बातों से तौके बैयत उतारे लेता हूं। यह रात का पर्दा हाएल है इसे सिपर के काम में लाओ और अपनी जान बचा लो। यह दुश्मन तो सिर्फ मेरा खून चाहते हैं। जब मुझे क़त्ल कर लेंगे तो तुम्हारी तरफ़ रूख भी न करेंगे। वह बोले, ख़ुदा की कसम यह तो कभी न होगा।   आपने फ़रमाया। जो कहता हूं उस पर गौर करो। कल तुम सब के सब ज़रूर क़त्ल कर दिये जाओगे और एक भी न बचेगा। अर्ज़ की अलहम्दो लिल्लाह कि हम आपके साथ शहीद होने से मुशर्रफ होंगे। फिर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने असहाब को क़रीब बुलाया और फ़रमाया ज़रा सर तो उठाओ और देखो। उन्होंने सर उठाया और जन्नत में अपनी मंजिल और जगह देखी आप फ़रमाते जाते थे कि ऐ हबीब, ऐ ज़ुहैर वगैरा यह तुम्हारी जगह है यह तुम्हारी जगह है इसी तरह सब को दिखला दिया। उसे देखने के बाद हर शख़्स नैज़ों और तलवारों का अपने सीने और चेहरे से इस्तेक़बाल करने लगा। ताकि जल्द से जल्द जन्नत में दाखिल हो क...

हज़रत अब्बास अ० की ख़िदमत में अमान नामा

⭕हज़रत अब्बास अ० की ख़िदमत में अमान नामा मोहर्रमुल हराम की नवीं तारीख को दिन ढल चुकने के बाद शिम्र अपने खेमे से बरामद हुआ और हज़रम इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के करीब आकर आवाज़ दी। अब्दुल्लाह, जाफ व अब्बास व उस्मान कहां हैं। मेरे सामने आयें। मैं उनके लिये हुक्मे अमान लाया हूं। उन हज़रात ने जब अमन का लफ़्ज़ सुना खामोशी इख़्तियार फमाई और बज़ाहिर जवाब भी देने का इरादा न था। लेकिन हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने शिम्र के कलेमात सुनते ही हज़रत अब्बास अ० से फरमाया। तुम लोग देखो तो सही यह कहता क्या है। अगर चे यह फासिक है, लेकिन तुम्हारा मामू होता है। (1)      {1. अल्लामा कन्तूरी लिखते हैं कि बाज़ रिवायात की बिना पर हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने हज़रत अब्बास से नहीं बल्कि उनके भाईयों से फ्रमाया था कि शिम्र मलाऊन को जवाब दो। उनके एयूने अल्फाज़ यह हैं फकालल हुसैन ला खोतेहि अजबूहो और आपने यह इस लिये कहा था ताकि हज़रत अब्बास अ० का एहतेराम हो सके।} यह सुनकर हज़रत असदुल्लाह अली बिन अबीतालिब के चारों शेर खेमे से निकल पड़े, और करीब जाकर पूछा। क्या कहता है। उसने कहा ऐ मेरे भांजो ! तुम्हारे लिये...

हज़रते अब्बास अलैहिस्सलाम का अपने भाईयों से ख़ेताब

⭕तारीखों से पता चलता है कि हज़रत अब्बास अलमबरदार ने अपने सब भाईयों को शहादत से पहले जमा किया और जब सब इकट्ठा हो गये तो आपने फ़रमाया :- " ऐ मेरे भाईयों ! अब वह वक्त आ पहुंचा है कि तुम लोग भी मैदाने कताल में कदम रखो और ऐसी जंग करो कि मैं अपनी आखो से देख लूँ कि तुमने खुदा और रसूल की राह में अपनी जानें कुर्बान कर वीं। देखो, आज के दिन जान देने से गुरेज़ का महल नहीं है, लेहाज़ा उजलत करो और शर्फे शहादत हासिल करके बारगाहे रिसालत में सुर खुरू हो जाओ। हज़रते अब्बास (अ) ने अपने बेटों और भाईयों की शहादत को अपनी शहादत पर मुकददम क्यों समझा ? इस जैल में साहब मुनाफउल अबरार का कहना है कि मुमकिन है इस ख़्याल के तहत ऐसा किया हो कि कारे खैर में जल्दी करना चाहिऐ इस लिये कि शैतान गैर मासूम को बहका कर अमरे खैर से बाज़ भी रख सकता है। लेकिन मौलाना सय्यद नजमुल हसन साहब करारवी ने अपनी किताब जिकरूल अबास में अपनी राय का इज़हार फरमाया है वह ज़्यादह करीने क़्यास है। आप फरमाते हैं:- " हज़रत अब्बास (अ) ने अपने से इसलिये मुकददम रखा कि मेरी शहादत उनकी नज़रों के सामने न हो। क्योंकि कहीं ऐसा न हो कि मेरे मरने से ...

शबे आशूर इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम का ख़ुत्बा

🔰हज़रत इमाम हुसैन का एक और ख़ुत्बा  रात का एक हिस्सा गुज़र चुका है और तारीकी छा चुकी है। इमाम अलैहिस्सलाम ख़ेमे से बरामद हो कर अपने असहाब के क़रीब जाते हैं, और उनके फिर मजतमा होने का हुक्म फ़रमाते हैं। आने वाहिद में असहाबे बावफ़ा मौजूद होते हैं (📚नासिखुल तवारीख जिल्द 6 स0 247) आप साज की कुर्सी पर जलवा अफ़रोज़ हो कर अपने असहाब से बादीदा पुरनम फ़रमाते हैं। (📝रौज़तुल शोहदा स० 309) मेरे वफ़ादार असहाब मैंने तुम से बारे बैअत उठा लिया तुम अपने क़बीलों और अज़ीज़ों दोस्तों में जा मिलो। फिर अपने अहलेबैत अ० की तरफ़ मुतावज्जेह हो कर फ़रमाने लगे। मैं तुम्हें अपनी जुदाई के मुताल्लिक मशविरा देता हूं। इस लिये कि तुम दुश्मनों की कसरत ओर ताक़त की ताब न ला सकोगे और देखो दुश्मन सिर्फ मुझी को चाहते हैं तुम मुझे दुश्मनों में छोड़ कर चले जाओ बेशक ख़ुदा मेरी मदद करेगा और हमारे आबाओ अजदाद की तरह हम पर नज़रे मरहमत रखेगा। (📚दमअतुस्साकेबा स० 325 व नासेखुत्तवारीख़ जिल्द 6 स0 247) इस ख़ुत्बे के बाद भी जॉबाजों ने दिलेराना जवाब दिया। 📝ज़िकरुल अब्बास अलैहिस्सलाम 

हज़रते जौन अलैहिस्सलाम

⭕हज़रत जौन गुलामे अबुज़र गफ़्फ़ारी की शहादत ज़ुहैर इब्ने कै़न की शहादत के बाद अबु समामा साईदी, हेज़ाज बिन मसरूक, यहीया इब्ने कसीर, ख़ताला इब्ने साअद अब्दुलरहमान बिन हन्ज़ला और उमरू बिन करतता सफे हुसैनी से निकल कर मैदान में आये और एक अन्दाज़े के मुताबिक उन्होंने मजमुई तौर पर तकरीबन २६५ मुखालफीन को कत्ल किया और दर्जए शहादत पर फायज़ हुये। इन शहादतों के बाद हज़रते जौन गुलाम अबुज़र गफ़्फ़ारी इमाम की ख़िदमत में हाज़िर हुये और उन्होंने मैदाने कारज़ार की इजाज़त चाही। इमाम (अ.) ने इस ज़ईफ, सिन रसीदह और क़दीम जॉनिसार को इजाज़त दी। जौन ने मआरका कार ज़ार में दिलेरी और शुजाअत के ज़ौहर दिखाये और बहुत से दुश्मनों को फिन्नार (जहन्नम भेज) करके दर्जेए शहादत पर फायज हुये। इमाम (अ) जिस घड़ी जौन के सिरहाने पहुँच उस वक़्त जान बाकी थी और अबुज़र का यह वफादार गुलाम अपनी बंद आँखों से बेहिश्त के नज़ारे कर रहा था। इमाम (अ.) ने जौन के खून आलूद चेहरे को देखा और फरमायाः- “ अगर कोई ख़्वाहिश है तो ब्यान करो " जौन ने आँख खोल दी और कहा:-" या इब्ने रसूल (स.) मैंने तमाम उमर राहत और नेअमत के दरमियान आपकी ख़िदमत मे...

हज़रते ज़ुहैर इब्ने कै़न अलैहिस्सलाम

⭕ हज़रते ज़ुहैर इब्ने कै़न अलैहिस्सलाम की तक़रीर इमाम हुसैन (अ.) का ख़ुत्बा तमाम हुआ तो ज़ुहैर इब्ने कै़न जिनका शुमार उस्मानी गिरोह में था और वह मक्का से करबला के रास्ते में इमाम (अ.) के साथ हो गये थे, आगे बढ़े और उन्होंने कूफा व शाम के काज़िबों को ललकराते हुये कहाः- “ ऐ कूफा व शाम के गद्दारों ! अज़ाबे इलाही से डरो और ख़ौफ़ खाओ। अपनी जेहालत और शैतनत से इस्लामी रिशतऐ अखूवत को न तोड़ो। जब तक हमारे और तुम्हारे दरमियान तलवार नहीं चलती उस वक़्त तक यह रिश्ता क़ायम है और जब यह तलवार चलेगी तो यह खुद ब खुद टूट जायेंगे। मैं तुम्हें आगाह करता हूँ कि परवरदिग़ार ने अपने नबी मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.) की औलाद इमाम हुसैन (अ.) के ज़रिये हमें अज़माईश में डाला है और वह यह देखना चाहता है कि हम उनके साथ क्या सुलूक करते हैं। अल्लाह ज़ालिमों को पसन्द नहीं करता। ख़ुदा के लिये इब्ने ज़ेयाद का साथ छोड़कर नवासए रसूल (स.) की मदद पर कमर बस्ता हो जाओ यकीन मानों की यज़ीद और इब्ने ज़ेयाद वगैरह का शुमार ज़ालमीन में है। यह लोग तुम्हारे साथ हमदर्दी का बरताव या बेहतरी का सुलूक नहीं कर सकते मैं तुम्हें आगाह करता हूँ कि यह वही...

शबे आशूर

⚫शबे आशूर शबे आशूर के जै़ल में मोअरेख़ीन का कहना है कि यह रात इमाम हुसैन (अ.) आपके असहाब व अन्सार, अईज़्ज़ा व अकरबा और मुखद्देराते असमत व तहारत ने तसबीह व तक़दीस, हमदो सना और इबादते इलाही में बसर की (तबरी भाग ६ प्रष्ठ २४०) और यह नूरानी काफेला रात भर कभी रूकू में कभी सजूद कभी क्याम और कभी कुऊद में मसरूफ व मशगूल रहा है और उनकी मुनाजाती आवाजें तमाम रात शहद की मक्खियों की अवाजों की तरह फ़िज़ाओं में तहलील होती रहीं। यकीनन इमाम (अ.) के आबिदाना ज़ौक और ज़ाहिदाना मौकुफ का फितरी तकाज़ा भी यही था कि वह अपनी ज़िन्दगी की इस आखिरी रात को अपने माबूद की इबादत, उसकी खुशनूदी और उसकी हमदो सना, में बसर करके उसकी रज़ा को अपनी जानिब मुकम्मल तौर पर मुतवज्जह करते। लेकिन इसके साथ ही इस जिक में यह सवाल भी पैदा होता है कि क्या इमाम आली मुकाम की हयाते ताहेरा का कोई लम्हा ऐसा भी गुज़रा जो इबादत व ऐताअते इलाही से खाली रहा हो ? क्या कोई साअत ऐसी भी गुज़री है जिसमें रज़ाये इलाही आपकी तरफ मुतवज्जह न हो ? अगर इसका जवाब नफी है तो फिर इल्तेवाये जंग और एक शब की मोहलत तलबी का मक़सद क्या था ? जब उमरे साद के सामने पेश की जा...