इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम की मुख़्तसर सवाने हयात

⭕ इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम की मुख़्तसर सवाने हयात 

🔹हज़रत इमाम हुसैन (अ.) अबुल आइम्मा अमीरल मोमेनीन हज़रत अली (अ.) व सय्यदुन्निसां हज़रत फात्मतुज़ ज़हरा के फज़न्द और पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफा (स.) व जनाबे ख़दीजतुल कुबरा के नवासे और शहीद मज़लूम इमाम हसन (अ.) के कुव्वते बाजू थे। आपको अबुल आइम्मतुस सानी कहा जाता है। क्योंकि आप ही की नस्ल से नौ इमाम मुतावल्लिद हुये। आप भी अपने पदरे बुजुर्गवार और बरादरे आली वकार की तरह मासूम मनसूस अफज़ले ज़माना और आलिमे इल्मे लदुन्नी थे।

🔸आपकी विलादत: हज़रत इमाम हसन (अ.) की विलादत के बाद पचास रातें गुजरी थीं कि हज़रत इमाम हुसैन (अ.) का नुकतए वजूद बतने मादर में मुस्तक हुआ था। हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.) इरशाद फ़रमाते हैं कि विलादते हसन (अ.) और इस्तेकरारे हमल हुसैन में तोहर का फासला था। (असाबा नजलुल अबरार वाकेदी) अभी आपकी विलादत न होने पाई थी कि बा रवायाते उम्मुल फ़ज़ल बिनते हारिस ने ख़्वाब में देखा कि रसूले करीम (स.) के जिस्म का एक टुकड़ा काट कर मेरी आगोश में रखा गया है इस ख़्वाब से वह बहुत घबराई और दौड़ी हुई रसूले करीम (अ.) की ख़िदमत में हाज़िर होकर अर्ज़ परदाज हुई कि हुज़ूर आज एक बहुत बुरा ख़्वाब देखा है। हज़रत ने ख़्वाब सुनकर मुस्कराते हुये फ़रमाया कि यह ख़्वाब तो निहायत ही उम्दा है। ऐ उम्मुल फ़ज़ल इसकी ताबीर यह है कि मेरी बेटी फ़ातिमा के बतन से अनकरीब एक बच्चा पैदा होगा जो तुम्हारी आगोश में परवरिश पायेगा। आपके इरशाद फ़रमाने को थोड़ा ही अरसा गुज़रा था कि खुसूसी मुद्दते हमल सिर्फ 6 माह गुज़ार कर नूरे नज़र रसूल (स.) इमाम हुसैन (अ.) बातारीख़ 3 शाबान सन् 4 हिजरी बमुकाम मदीनए मुनव्वरा बतने मादर से आगोशे मादर में आ गये। (📚शवाहेदुल नबूवत सफा 13. व अनवारे हुसैनिया जिल्द 3, सफा 43 बा हवालए साफी सफा 298. व जामए अब्बासी सफा 59, व बेहारुल अनवार व मिसबाहे तूसी व मफतल इब्ने नम्मा सफा 2.) वगैरा उम्मुल फ़ज़ल का बयान है कि मैं हसबुल हुक्म इनकी ख़िदमत करती रही। एक दिन मैं बच्चे को लेकर आं हज़रत (स) की ख़िदमत में हाज़िर हुई। आपने आगोशे मोहब्बत में लेकर प्यार किया और आप रोने लगे मैंने सबब दरयाफ़त किया तो फ़रमाया कि अभी अभी जिबराईल मेरे पास आये थे वह बतला गये हैं कि यह बच्चा उम्मत के हाथों निहायत ज़ुल्मों सितम के साथ शहीद होगा और ऐ उम्मुल फ़ज़ल वह मुझे इसकी क़त्लगाह की सुर्खू मिट्टी भी दे गये हैं। (📚मिशकात जिल्द 8, सफा 140 तबा लाहौर और मसनद इमाम रज़ा सफा 38) में हैं कि आं हज़रत (स.) ने फ़रमाया देखो वह वाकेया फ़ातिमा (स.) से कोई न बतलाए वरना वह सख़्त परेशान होंगी।

मुल्ला जामी लिखते हैं कि उम्मे सलमा ने बयान किया कि एक दिन रसूले खुदा (स.) मेरे घर इस हाल में तशरीफ़ लाये कि आपके सरे मुबारक के बाल बिखरे हुये थे और चेहरे पर गर्द पड़ी हुई थी। मैंने इस परेशानी को देख कर पूछा कि क्या बात है, फ़रमाया मुझे अभी, अभी जिबरईल ईराक़ के मकामे करबला में ले गये थे। वहां मैंने जाय कत्ले हुसैन (अ.) देखी है और ये मिट्टी लाया हूँ। ऐ उम्मे सलमा (अ.) इसे अपने पास महफूज़ रखो। जब यह खून हो जाये तो समझना कि मेरा हुसैन शहीद हो गया। (📚शवाहेदुन नबूवत सफा 174)

🔸आपका इस्मे गेरामी : इमाम शबलेंजी लिखते हैं कि विलादत के बाद सरवरे कायनात (स.) ने इमाम हुसैन (अ.) की आँखों में लोआबे दहन लगाया और अपनी ज़बान उनके मुँह में देकर बड़ी देर तक चुसाया इसके बाद दाहिने कान में अज़ान और बायें में अकामत कही। फिर दुआए ख़ैर फ़रमा कर हुसैन नाम रखा। (📚नूरुल अबसार, सफा 113) उलेमा का बयान है कि यह नाम इस्लाम से पहले किसी का भी नहीं था। वह यह भी कहते हैं कि यह नाम खुद खुदा वन्दे आलम का रखा हुआ है। (📚अरहज्जुल मतालिब व रौजतुल शोहदा सफा 236) किताब आलाम अल वरा तबरसी में है कि यह नाम भी दीगर आइम्मा के नामों की तरह लौहे मैहफूज़ में लिखा हुआ है।

🔹आपका अकीका :-इमाम हुसैन (अ.) का नाम रखने बाद सरवरे कायनात (स.) ने हज़रत फ़ातिमा (स.) से फ़रमाया कि बेटी जिस तरह हसन (अ.) का अकीका किया गया है उसी तरह इसके अकीके का इन्तिज़ाम करो, और इसी तरह बालों के हम वज़न चांदी तसदुक करो जिस तरह हसन (अ.) के लिये कर चुकी हो। अलगरज़ एक मेंढा मंगवाया गया और रस्मे अकीका अदा की गई। (📚मतालेबुल सुवेल सफा 241 बाज़ माअसरीन ने अकीके के साथ खत्ने का जिक्रू किया है। जो मेरे नज़दीक कतअन नाकाबिले क़ुबूल है। क्योंकि इमाम का मख्तून पैदा होना मुसल्लेमात से है।

🔸कुन्नियत व अलक़ाब :- आपकी कुन्नियत सिर्फ़ अबु अबदुल्ला थी अलबत्ता अलक़ाब आपके बेशुमार हैं। जिसमें सय्यद, सिब्ते असग़र, शहीदे अकबर और सय्यदुश शोहदा ज्यादा मशहूर हैं। अल्लामा मोहम्मद बिन तलहा शाफेई का बयान है कि सिब्ते और सय्यद ख़ुद रसूले करीम (स.) के मोअय्यन करदा अलक़िब हैं। (📚मतालेबुल सवेल, सफा 321)

⭕ इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम की रज़ाअत :- उसूले काफ़ी बाब मौलूदुल हुसैन (अ.) सफा 114 में है कि इमाम हुसैन (अ.) ने पैदा होने के बाद न हज़रत फ़ातिमा जहरा (स.) का शीरे मुबारक नोश किया और न किसी दाई का दूध पिया। होता यह था कि जब आप भूखे होते तो सरवर कायनात तशरीफ़ लाकर ज़बाने मुबारक दहने अकदस में देते थे और इमाम हुसैन (अ.) उसे चूसने लगते थे। यहां तक कि सेरो सेराब हो जाते थे। मालूम होना चाहिये कि इसी से इमाम हुसैन (अ.) का गोश्त पोस्त बना और लोआबे दहने रिसालत से हुसैन (अ.) परवरिश पाकर कारे रिसालत अंजाम देने की सलाहियत के मालिक बने। यही वजह है कि आप रसूले करीम (स.) से बहुत मुशाबेह थे। (📚नुरुल अबसार सफा 113)

⭕ख़ुदा वन्दे आलम की तरफ़ से विलादते इमाम हुसैन (अ.) की तहनियत और ताज़ियत

अल्लामा हुसैन वाएज़ काशेफी रक्म तराज़ हैं कि इमाम हुसैन (अ.) विलादत के बाद ख़ल्लाके आलम ने जिबराईल को हुक्म दिया कि ज़मीन पर जा कर मेरे हबीब मोहम्मद मुस्तफा (स.) को मेरी तरफ से हुसैन (अ.) की विलादत पर मुबारक बाद दे दो और साथ ही साथ उनकी शहादते उजमा से भी उन्हें मुत्तला करके ताज़ियत अदा कर दो। जनाबे जिबरईल बा हुक्मे रब्बे जलील जमीन पर वारिद हुऐ और उन्होने आं हज़रत की ख़िदमत में पहुँच कर तहनीयत अदा की। इसके बाद अर्ज परदाज़ हुये कि ऐ हबीब रब्बे करीम आपकी ख़िदमत में शहादते हुसैन अलैहिस्सलाम की ताज़ियत भी मिन जानिबे अल्लाह अदा की जाती है। यह सुन कर सरवरे कायनात (स.) का चेहरा बदला और आपने पूछा कि जिबरईल माजेरा क्या है। तहनियत के साथ ताज़ियत की तफ़सील बयान करो। जिबरईल (अ.) ने अर्ज़ किया कि एक वो दिन होगा जिस दिन आपके इस चहिते फरज़न्द "हुसैन" के गुलूए मुबारक पर ख़न्जरे आबदार रखा जायगा और आपका यह नूरे नज़र बे यारो मद्दगार मैदाने करबला में यक्काओ तनहा तीन दिन का भूखा प्यासा शहीद होगा। यह सुन कर सरवरे आलम (स.) महवे गिरया हो गये। आपके रोने की ख़बर ज्योंही अमीरल मोमेनीन (अ.) को पहुँची वह भी रोने लगे आलमे गिरया में दाख़िले खानए सय्यदा हो गये। जनाबे सय्यदा (स.) ने जो हज़रत अली (अ.) को रोता देखा तो दिल बेचैन हो गया। अर्ज़ किया अबुल हसन रोने का सबब क्या है। फ़रमाया बिन्ते रसूल (स.) अभी जिबरईल आये हैं और वह हुसैन की तहनियत के साथ साथ उसकी शहादत की ख़बर भी दे गये हैं हालात से बा ख़बर होने के बाद फ़ातिमा का गिरया गुलूगीर हो गया। आपने हुज़ूर (स.) की ख़िदमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ किया बाबा जान ये सब कब होगा। फ़रमाया जब न मैं हूँगा न तू होगी न अली (अ.) होंगे, न हसन होंगे। फ़ातिमा (स.) ने पूछा बाबा मेरा बच्चा किस ख़ता पर शहीद होगा। फ़रमाया बेजुर्म व बे ख़ता सिर्फ़ इस्लाम की हिमायत में शहादत होगी। फ़ातिमा (स.) ने अर्ज़ की बाबा जान हम में से कोई न होगा तो इस पर गिरया कौन करेगा और उसकी सफे मातम कौन बिछायेगा।

रावी का बयान है कि इस सवाल का हज़रत रसूले करीम (स.) अभी जवाब न देने पाये थे कि हातिफे ग़यबी की आवाज़ आई, ऐ फ़ातिमा ग़म न करो। तुम्हारे इस फ़र्ज़ंद का ग़म अब्द उल आबाद तक मनाया जायगा और इसका मातम कयामत तक जारी रहेगा।

एक रवायत में है कि रसूल ख़ुदा (स.) ने फ़ातिमा के जवाब में यह फ़रमाया था कि ख़ुदा कुछ लोगों को हमेशा पैदा करता रहेगा, जिसके बूढ़े, बूढ़ों पर और जवान जवानों पर और बच्चे, बच्चों पर और औरतें, औरतों पर गिरया व जारी करते रहेंगें।

⭕फ़ितरुस का वाकेया :- अल्लामा मज़कूर बाहवालए हजरत शेख़ मुफ़ीद अल रहमा रकमतराज़ हैं कि इसी तहनियत के सिलसिले में जनाबे जिबरईल बे शुमार रिश्तों के साथ ज़मीन की तरफ आ रहे थे। नागाह उनकी नज़र ज़मीन के एक गैर मारूफ़ तबके पर पड़ी। देखा कि एक फरिश्ता ज़मीन पर पड़ा हुआ जारो क़तार रो रहा है। आप उसके क़रीब गये और आपने उससे माजरा पूछा। उसने कहा कि ऐ जिबरईल मैं वही फरिश्ता हूँ जो पहले आसमान पर सत्तर हज़ार फ़रिश्तों की क़यादत करता था। मेरा नाम फ़ितरुस है। जिबरईल ने पूछा तुझे किस जुर्म की सज़ा मिली है। उसने अर्ज़ की, मरज़ीए माबूद के समझने में एक पल की देरी की थी। उसकी यह सज़ा भुगत रहा हूँ। बालो पर जल गये हैं। यहाँ कुजें तन्हाई में पड़ा हूँ। ऐ जिबरईल ख़ुदारा मेरी कुछ मदद करो। अभी जिबरईल जवाब न देने पाये थे कि उसने सवाल किया। ऐ रूहुल अमीन आप कहाँ जा रहे हैं। उन्होंने फ़रमाया कि नबी आखेरूज़ ज़मा हज़रत मोहम्मद मुस्तफा (स.) के यहाँ एक फरज़न्द पैदा हुआ है। जिसका नाम "हुसैन" (अ.) है। मैं ख़ुदा की तरफ़ से उसकी अदाए तहनियत के लिये जा रहा हूँ। फ़ितरुस ने अर्ज़ की ऐ जिबरईल ख़ुदा के लिये मुझे अपने हमराह लेते चलो। मुझे इसी दर से शिफ़ा और निजात मिल सकती है। जिबरईल उसे साथ लेकर हुज़ूर की ख़िदमत में उस वक़्त पहुँचे जबकि इमाम हुसैन (अ.) आगोशे रसूल (स.) में जलवा फ़रमा थे। जिबरईल ने अर्ज़े हाल किया। सरवरे कायनात (स.) ने फ़रमाया कि फ़ितरुस के जिस्म को हुसैन (अ.) के जिस्म से मस कर दो, शिफ़ा हो जायेगी। जिबरईल ने ऐसा ही किया और फ़ितरुस के बालो पर उसी तरह रोईदा हो गये जिस तरह पहले थे। वह सेहत पाने के बाद फख्रो मुबाहात करता हुआ अपनी मंज़िले असली आसमानी सेयुम पर जा पहुँचा और मिसले साबिक सत्तर हजार फ़रिश्तों की क़यादत करने लगा।
"बाद अज़ शहादते हुसैन (अ.) चूँ बरां ज़िया मतला शुद"
यहाँ तक कि वह ज़माना आया जिसमें इमाम हुसैन (अ.) ने शहादत पाई और इसे हालात से आगाही हुई तो उसने बारगाहे अहदियत में अर्ज़ की "मालिक मुझे इजाज़त दी जाये कि मैं ज़मीन पर जा कर दुश्मनाने हुसैन (अ.) से जंग करूँ। इरशाद हुआ कि जंग की कोई ज़रूरत नहीं अलबत्ता तू सत्तर हज़ार फरिश्ते लेकर ज़मीन पर चला जा और उनकी कब्रे मुबारक पर सुबह व शाम गिरियो मातम किया कर और इसका जो सवाब हो उसे उनके रोने वालों के लिये हिबा कर दे। चुनांचे फितरूस ज़मीने करबला पर जा पहुँचा और ता क्याम क़यामत शबो रोज़ रोता रहेगा। (📚रौज़तुल शोहदा अज़, 236 ता सफा 238 तबा बम्बई 1385 हिजरी व गनीमतुल तालेबीन शेख अब्दुल कादिर जीलानी)

⭕ इमाम हुसैन (अ.) का रूए ताबां :- मुल्ला जामी रहमतुल्लाह अलैहा तहरीर फ़रमाते हैं कि इमाम हुसैन (अ.) को ख़ुदा बन्दे आलम ने वह हुस्न व जमाल दिया कि जिसकी नज़ीर नज़र नहीं आती आपके रूऐ ताबां का यह हाल था कि जब आप जाय तारीक में बैठ जाते थे तो लोग आपके रूए रौशन से शमए तरीक का काम लेते थे। यानी हर चीज़ रौशन हो जाती थी और लोगों को तारीकी में राहबरी की ज़हमत नहीं होती थी। (📚शवाहेदुन नबूवत, रूकन 6, सफा 174 व रौजतुल शोहदा, बाब 7 सफा 238) शेख़ अब्दुल वासेए इब्ने यहीया वासेई लिखते हैं कि इमाम हसन (अ.) और इमाम हुसैन (अ.) एक दिन रसूले करीम (स.) की ख़िदमत में हाज़िर थे यहाँ तक कि रात हो गई। आपने फ़लमाया मेरे बच्चों अब रात हो गई तुम अपनी माँ के पास चले जाओ। बच्चे हसबुल हुक्म रवाना हो गये। रावी का बयान है कि जैसे यह बच्चे घर की तरफ़ चले एक रोशनी पैदा हुई जो उनके रास्ते की तारीकी को दूर करती जाती थी। यहाँ तक कि बच्चे अपनी माँ की ख़िदमत में जा पहुँचे। पैग़म्बरे इस्लाम (स.) जो इस रोशनी को देख रहे थे इरशाद फ़रमाने लगे।
{अल्हम्दोलिल्लाहिल लजी अकरामना अहल्ल बैत}
ख़ुदा का शुक्र है कि उसने हम अहले बैत को इज़्ज़त व करामत अता फरमाई है।
(📚मसन्दे इमामे रज़ा सफा 32 मतबुआ मिस्र, 1341 हिजरी)

⭕जनाबे इब्राहीम का इमाम हुसैन (अ.) पर कुर्बान होनाः- उलेमा का बयान है कि एक रोज़ हजरत रसूले ख़ुदा (स.) इमाम हुसैन (अ.) दाहिने जानू पर और अपने बेटे जनाबे इब्राहीम को बायें जानू पर बिठाये हुये प्यार कर रहे थे कि नागाह जिबरईल नाज़िल हुये और कहने लगे इरशादे ख़ुदा वन्दी है कि दो में से एक अपने पास रखो। पैगम्बरे इस्लाम ने इमाम हुसैन (अ.) को इब्राहीम पर तरजीह दी और अपने फ़रज़न्द इब्राहीम को हुसैन पर फिदा कर देने के लिये कहा। चुनांचे इब्राहीम अलील होकर तीन यौम में इन्तेकाल कर गये। रावी का बयान है कि इस वाकिये के बाद से जब इमाम हुसैन (अ.) आआं हज़रत (स.) के सामने आते थे तो आप उन्हें आगोश में बिठा कर फ़रमाते थे कि यह वह है जिस पर मैंने अपने बेटे इब्राहीम को क़ुर्बान कर दिया है।
(📚शवाहेदुन नबूवत सफा 174 व तारीखे बगदाद जिल्द 2 सफा 204)

⭕हसनैन की बाहमी ज़ोर आज़माई:- इब्नल ख़्वाब शेख़ कमालुद्दीन और मुल्ला जामी लिखते हैं कि एक मरतबा इमाम हसन और इमाम हुसैन (अ.) कमसिनी के आलम में रसूले ख़ुदा (स.) की नज़रों के सामने आपस में ज़ोर आज़माई करने और कुश्ती लड़ने लगे। जब बाहम एक दूसरे से लिपट गये तो रसूले ख़ुदा (स.) ने इमाम हसन (अ.) से कहना शुरू किया, हां बेटा, "हसन बगीर, हुसैन रा" हुसैन को गिरा दे और चित कर दे। फ़ातिमा ने आगे बेटे की हिम्मत अफ़ज़ाई नहीं करते। आपने फ़रमाया कि ऐ बेटी यह तो देखो कि जिबरईल खड़े हुये हुसैन से कह रहे हैं, "बगीर हसन रा" ऐ हुसैन तुम हसन को गिरा दो, और चित कर दो।
(📚शवाहेदुन नबूवत, सफा 174, व रौजतुल शोहदा, सफा 239, नूरूल अबसार सफा 114, तबा मिस)

⭕ ख़ाके क़दम हुसैन (अ.) और हबीब इब्ने मज़ाहिर :- अल्लामा हुसैन वाएज़ काशफी लिखते हैं कि एक दिन रसूले ख़ुदा (स.) एक रास्ते से गुज़र रहे थे आपने देखा कि चन्द बच्चे खेल रहे हैं। आप उनके क़रीब गये और उनमें से एक बच्चे को उठा कर अपनी आगोश में बिठा लिया और आप उसकी पेशानी के बोसे देने लगे। एक सहाबी ने पूछा। हुज़ूर इस बच्चे में क्या खुसूसियत है कि आपने इस दरजा क़द्र अफज़ाई फ़रमाई है। आपने इरशाद फ़रमाया कि मैंने इसे एक दिन इस हाल में देखा है कि मेरे बच्चे हुसैन के क़दमों की ख़ाक उठा कर अपनी आँखों में लगा रहा था। बाज हज़रात का बयान है कि वह बच्चा आंहज़रत ने जिसको प्यार किया था उसका नाम हबीब इब्ने मज़ाहिर था । (📚रौज़तुल शोहदा)

⭕इमाम हुसैन (अ.) के लिये बच्चे आहू का आना
किताब कनजुल ग़राएब में है कि एक शख़्स ने सरवरे कायनात (स.) की ख़िदमत में एक बच्चे आहू (हिरन) हदिये में पेश किया। आपने उसे इमाम हसन (अ.) के हवाले कर दिया क्योंकि आप बर वक़्त हाज़िरे ख़िदमत हो गये थे। इमाम हुसैन (अ.) ने जब इमाम हसन के पास हिरन का बच्चा देखा तो अपने नाना से कहने लगे, नाना जान आप मुझे भी हिरन का बच्चा दीजिये। सरवरे कायनात (स. ) इमाम हुसैन (अ.) को तसल्ली देने लगे लेकिन कमसिनी का आलम था। फितरते इन्सानी ने इज़हारे फज़ीलत के लिये करवट ली और इमाम हुसैन (अ.) ने ज़िद करना शुरु कर दिया और क़रीब था कि रो पड़ें, नागाह एक हिरन को आते हुये देखा गया। जिसके साथ उसका बच्चा था। वह आहू (हिरन) सीधा ख़िदमत में आया और उसने बा ज़बाने फ्सीह कहा। हुज़ूर मेरे दो बच्चे थे एक को सय्याद ने शिकार करके आपकी ख़िदमत में पहुँचा दिया और दूसरे को मैं इस वक़्त लेकर हाज़िर हुआ हूँ। उसने कहा मैं जंगल में था कि मेरे कानों में एक आवाज़ आई जिसका मतलब यह था कि नाज़ परवरदए रसूल (स.) बच्चे आहू के लिये मचला हुआ है जल्द से जल्द अपने बच्चे को हुज़ूर रसूले करीम (स.) की ख़िदमत में पहुँचा। हुक्म पाते ही मैं हाज़िर हुआ हूँ और हदिया पेशे ख़िदमत है। आं हज़रत (स.) ने आहू को दुआए ख़ैर दी और बच्चे को इमाम हुसैन (अ.) के हवाले कर दिया।(📚रौज़तुल शोहदा जिल्द 1, सफा 220)

⭕इमाम हुसैन (अ.) सीनए रसूल (स.) पर :- सहाबिए रसूल (स.) अबू हुरैरा रावीए हदीस का बयान हैं। मैंने अपनी आँखों से यह देखा कि रसूले करीम (स.) लेटे हुये हैं और इमाम हुसैन (अ.) निहायत कमसिनी के आलम में उनके सीनए मुबारक पर हैं। उनके दोनों हाथों को पकड़े हुये फ़रमाते हैं। ऐ हुसैन तू मेरे सीने पर कूद चुनांचे इमाम हुसैन (अ.) आपके सीनए मुबारक पर कूदने लगे और उसके बाद हुजूर (स.) ने इमाम हुसैन (अ.) का मुँह चूम कर ख़ुदा की बारगाह में अर्ज़ की ऐ मेरे पालने वाले मैं इसे बेहद चाहता हूँ, तू भी इसे महबूब रख। एक रवायत में हैं कि आंहज़रत (स.) का लोआबे दहन और उनकी ज़बान इस तरह चूसते थे जिस तरह कोई ख़जूर चूसे। (📚अर हज्जुल मतालिब, सफा 359, सफा 361, इसतेआब, जिल्द 1, सफा 144, अबासा, जिल्द 2, सफा 11, कंजुल आमाल, जिल्द 7, सफा 104, कंजुल अल हक़ाएक, सफा 59)

🔴हसनैन (अ.) में खुशनवीसी का मुकाबलाः- रसूले करीम (स.) के शहज़ादे इमाम हसन और इमाम हुसैन (अ.) ने एक तहरीर लिखी। फिर दोनों आपस में मुकाबला करने लगे कि किसका ख़त अच्छा हैं। जब बाहमी फैसला न हो सका तो फात्मा ज़हरा की ख़िदमत में हाज़िर हुये। उन्होंने फ़रमाया अली (अ.) के पास जाओ। अली (अ.) ने कहा रसूल अल्लाह से फैसला कराओ। रसूले करीम ने इरशाद किया, ऐ नूरे नज़र इसका फैसला तो मेरी लख़्ते जिगर फ़ातिमा ही करेगी। उसके पास जाओ। बच्चे दौड़े हुये फिर मां की ख़िदमत में हाज़िर हुये। मां ने गले लगा लिया, और कहा ऐ मेरे दिल की उम्मीद, तुम दोनों का ख़त बेहतरीन है और दोनों ने खूब लिखा है, लेकिन बच्चे न माने और यही कहते रहे मादरे गेरामी दोनों को सामने रख कर सही फैसला दीजिये। माँ ने कहा अच्छा बेटा, लो अपना गुलू बंद तोड़ती हूँ। उसके दाने चुनो, फैसला ख़ुदा तरफ दोनों के हाथ बराबर से बढ़े। हुक्मे ख़ुदा वन्दे आलम हुआ जिबरईल दाने के दो टुकड़े कर दो। एक हसन ने ले लिया और एक हुसैन (अ.) ने उठा लिया। मां ने बढ़ कर दोनों के बोसे लिये और कहा क्यों बच्चों मैं न कहती थी कि तुम दोनों के ख़त अच्छे हैं और एक की दूसरे ख़त पर तरजीह नहीं है। (📚खासेतुल मसाएब सफा 335) क़ारी अब्दुल युदूद शम्स लखनवी खलफ मौलवी अब्दुल हकीम उस्ताद मौलवी शेख़ अब्दुल शकूर मुदीर अल नजम पाटा नाला लखनऊ, भारत, अपने एक क़सीदे में लिखते हैं।

दोनों भाई एक दिन, मादर से यह कहने लगे। 
आप फरमाएं कि लिखना, किसको बेहतर आ गया।। 
सात मोती रख के फरमाया, कि जो जाएद उठाये।
 एक मोती, दो हुआ हिस्सा बराबर हो गया।।

🔴जन्नत के कपड़े और फरज़न्दाने रसूल (स.) की ईद
 इमाम हसन और इमाम हुसैन (अ.) का बचपना है। ईद आने को है और इन असखियाये आलम के घर में नये कपड़े का क्या ज़िक्र पुराने कपड़े बल्कि जौ की रोटीयां तक नहीं हैं। बच्चों ने मां के गले में बाहें डाल दीं। मादरे गेरामी मदीने के बच्चे ईद के दिन ज़र्क बर्क कपड़े पहन कर निकलेंगे और हमारे पास नये कपड़े नहीं हैं। हम किस तरह ईद मनायेंगे। मां ने कहा बच्चों घबराओ नहीं, तुम्हारे कपड़े दरज़ी लायेगा। ईद की रात आई, बच्चों ने फिर मां से कपड़ों का तक़ाज़ा किया। मां ने वही जवाब देकर नौनिहालों को खामोश कर दिया। अभी सुबह न होने पाई थी कि एक शख़्स ने दरवाज़े पर आवाज़ दी, दरवाज़ा खटखटाया, फिज़्ज़ा दरवाज़े पर गई। एक गठरी लिबास की दी। फिज़्ज़ा ने उसे सय्यदए आलम की ख़िदमत में उसे पेश किया। अब जो खोला तो उसमें दो छोटे छोटे अम्मामे, दो कबाएं दो अबाएं गरज़ की तमाम ज़रुरी कपड़े मौजूद थे। मां का दिल बाग बाग़ हो गया। वह समझ गई कि यह कपड़े जन्नत से आये हैं लेकिन मुँह से कुछ नहीं कहा। बच्चों को जगाया कपड़े दिये। सुबह हुई, बच्चों ने जब कपड़ों के रंग की तरफ़ नज़र की तो कहा मादरे गेरामी यह तो सफ़ेद कपड़े हैं। मदीने के बच्चे रंगीन कपड़े पहने होंगे। अम्मा जान हमें रंगीन कपड़े चाहिऐ। हुज़ूर ए अनवर (स.) को इत्तेला मिली, तशरीफ़ लाये फ़रमाया, घबराओ नहीं। तुम्हारे कपड़े अभी अभी और भी रंगीन हो जायेगें। इतने में जिबरईल आफ‌ताबा (एक बड़ा और चौड़ा बरतन) लिये हुऐ आ पहुँचे। उन्होंने पानी डाला, मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.) के इरादे से कपड़े सब्ज़ और सुर्ख हो गये। सब्ज़ (हरा) जोड़ा हसन (अ.) ने पहना, सुर्ख जोड़ा हुसैन (अ.) ने ज़ेबे तन किया। मां ने गले लगाया, बाप ने बोसे दिये, नाना ने अपनी पुश्त पर सवार करके मेहार के बदले अपनी जुल्फ़ें हाथों में दे दीं और कहा मेरे नौनिहालों, रिसालत की बाग तुम्हारे हाथ में हैं। जिधर चाहो मोड़ो और जहां चाहो ले चलो। (📚रौज़तुल भाोहदा, सफा 189, बेहारुल अनवार) बाज़ उलेमा का कहना है कि सरवरे कायनात बच्चों को पुश्त पर बिठा कर दोनों हाथों पैरों से चलने लगे और बच्चों की फ़रमाईश पर ऊँट की आवाज़ मुँह से निकालने लगे। (📚कशफुल महजूब)

⚫गिरयए हुसैनी और सदमए रसूल (स.) :- इमाम शिब्लंजी और अल्लामा बदख़्शी लिखते हैं कि ज़ैद इब्ने ज़ियाद का बयान है कि एक दिन आं हज़रत (स.) खानए आयशा से निकल कर कहीं जा रहे थे, रास्ते में फ़ातिमा ज़हरा (स.) का घर पड़ा। उस घर से इमाम हुसैन (अ.) के रोने की आवाज़ बरामद हुई। आप घर में दाख़िल हो गये और फ़रमाया ऐ फ़ातिमा " अलम तालमी अन बकाराह यूज़ीनी" क्या तुम्हें मालूम नहीं कि हुसैन (अ. ) के रोने से मुझे किस क़द्र तकलीफ़ और अज़ीयत पहुँचती है। (📚नुरुल अबसार, सफा 114 व मम्बए अहतमी, जिल्द, 9 सफा 201 व ज़खाएर अल अक्बा, सफा 123) बाज़ उलमा का बयान है कि एक दिन रसूले ख़ुदा (स.) कहीं जा रहे थे। रास्ते में एक मदरसे की तरफ़ से गुज़र हुआ। एक बच्चे की आवाज़ कान में आई जो हुसैन (अ.) की आवाज़ से ज़्यादा मिलती थी। आप दाख़िल मदरसे हुये और उस्ताद को हिदायत दी कि इस बच्चे को न मारा करो क्योंकि इसकी आवाज़ मेरे बच्चे हुसैन (अ.) से बहुत मिलती है।

⭕इमाम हुसैन (अ.) की सरदारिए जन्नत :- पैग़म्बरे इस्लाम की यह हदीस मुसल्लेमात और मुतावातेरात से है कि "अल हसन वल हुसैन सय्यद शबाब अहले जन्नतः व अबुहुमा ख़ेर मिन्हमा" हसन व हुसैन जवानाने जन्नत के सरदार हैं, और उनके पदरे बुर्ज़गवार इन दोनों से बेहतर हैं। (इब्ने माजा) सहाबीए रसूल (स.) जनाबे हुज़ैफा यमानी का बयान हैं कि मैंने एक दिन सरवरे कायनात (स.) को बेइन्तेहा खुश देख कर पूछा, हुजुर इफ़राते मसर्रत की क्या वजह है। फ़रमाया ऐ हुज़ैफ़ा आज एक ऐसा मलक नाज़िल हुआ है जो मेरे पास इस से पहले नहीं आया था। उसने मेरे बच्चों की सरदारिए जन्नत पर मुबारक बाद दी है और कहा है कि "अन फ़ातिमा सय्यदुन निसाए अहले सरदार हैं। (📚कंजुल आमाल जिल्द 7 सफा 107, तारीख़ुल ख़ोलफा, सफा 242, सवाएके मोहर्रेका, सफा 114) इस हदीस से सियादते अलविया का मसला भी हल हो गया। कताए नज़र इसके कि हज़रत अली (अ.) में मिसले नबी सियादत का जाती शरफ़ मौजूद था और ख़ुद सरवरे कायनात ने बार बार आपकी सियादत की तसदीक़ सय्यदुल अरब, सय्यदुल मुत्तकीन, सय्यदुल मोमेनीन वगैरा जैसे अल्फाज़ से फ़रमाई है। हज़रत अली (अ.) का सरदाराने जन्नत इमाम हसन और हुसैन (अ) से बेहतर होना वाज़ेह करता है कि आपकी सियादत मुसल्लम भी नहीं बल्कि बहुत बुलन्द दर्ज़ा रखती है। यही वजह है कि मेरे नज़दीक जुम्ला अवलादे अली (अ) सय्यद हैं। यह और बात है कि बनी फ़ातिमा के बराबर नहीं हैं।

⭕इमाम हुसैन (अ.) आलमे नमाज़ में पुशते रसूल (स.) पर

ख़ुदा ने जो शरफ़ इमाम हसन (अ.) और इमाम हुसैन (अ.) को अता फ़रमाया है वह औलादे रसूल (स.) के सिवा किसी को नसीब नहीं। इन हज़रात का ज़िक्र इबादत और उनकी मोहब्बत इबादत यह हज़रात अगर पुश्ते रसूल (स.) पर आलमे नमाज़ में सवार हो जायें, तो नमाज़ में कोई खलल वाके नहीं होता। ऐसा होता था कि यह नौनेहाले रिसालत पुश्ते रसूल (स.) पर आलमे नमाज़ में सवार हो जाया करते थे और जब कोई मना कराना चाहता था तो आप इशारे से रोक दिया करते थे, और कभी ऐसा भी होता था कि आप सजदे में उस वक़्त तक मशगूले ज़िक्र रहा करते थे जब तक बच्चे आपकी पुश्त से ख़ुद न उतर आयें। आप फ़रमाया करते थे, खुदाया मैं इन्हें दोस्त रखता हूँ तू भी इनसे मोहब्बत कर। कभी इरशाद होता था ऐ दुनिया वालों ! अगर मुझे दोस्त रखते हो तो मेरे बच्चों से भी मोहब्बत करो।

⭕हदीस हुसैन मिन्नी :- सरवरे कायनात (स.) ने इमाम हुसैन (अ.) के बारे में इरशाद फ़रमाया कि ऐ दुनिया वालों! बस मुख़्तसर यह समझ लो "हुसैन मिन्नी व अना मिनल हुसैन" हुसैन मुझ से है और मैं हुसैन से हूँ। ख़ुदा उसे दोस्त रखे जो हुसैन को दोस्त रखे। (📚मतालेबुल सुवेल, सफा 242, सवाएके मोहर्रेका, सफा 114. नूरुल अबसार सफा 113, व सही तिर्मिजी, जिल्द, 6 सफा 307, मुस्तदरिक इमाम हाकिम जिल्द 3, सफा 177, व मस्नदे अहमद, जिल्द 4, सफा 972 असदउल गाबता, जिल्द 2. सफा 91 कंजुल आमाल, जिल्द 4. सफा 221)सफा 113. व सही तिर्मिज़ी, जिल्द, 6 सफा 307, मुस्तदरिक इमाम हाकिम जिल्द 3, सफा 177. व मस्नदे अहमद, जिल्द 4, सफा 972 असदउल गाबता, जिल्द 2. सफा 91 कंजुल आमाल, जिल्द 4, सफा 221)

⭕मक़तूबात बाबे जन्नत :- सरवरे कायनात हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.) इरशाद फ़रमाते हैं कि शबे मेराज जब मैं सैरे आसमानी करता हुआ जन्नत के क़रीब पहुँचा तो देखा कि बाबे जन्नत पर सोने के हुरुफ़ में लिखा हुआ है। "ला इलाहा इल्लल लाहा मोहम्मदन हबीब अल्लाह अलीयन वली अल्लाह व फ़ातिमा अमत अल्लाह वल हसन वल हुसैन सफुत अल्लाह व मिनल बुग्ज़हुम लानत अल्लाह"
✳️तरजुमा :- खुदा के सिवा कोई माबूद नहीं, मोहम्मद (स.) अल्लाह के हबीब हैं अली (अ.) अल्लाह के वली हैं, फ़ातिमा (स.) अल्लाह की कनीज़ हैं, हसन और हुसैन (अ.) अल्लाह के बुरगुज़ीदा हैं और उनसे बुग़ज़ रखने वालों पर ख़ुदा की लानत है।
(📚अर हज्जुल मतालिब, बाब 3, सफा 313, तबा लाहौर 1261 ई0)

⭕इमाम हुसैन (अ.) और सिफ़ात हसना की मरकज़ीयत

यह तो मालूम ही है कि इमाम हुसैन (अ.) हजरत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.) के नवासे, हज़रत अली (अ.) के बेटे, इमाम हसन (अ.) के भाई थे और इन्हीं हज़रात को पन्जेतन कहा जाता है, और इमाम हुसैन पन्जेतन के आख़री फर्द हैं। यह ज़ाहिर है कि आख़िर तक रहने वाले और हर दौर से गुज़रने वाले के लिये इकतेसाब सिफाते हसना के इम्कानात ज़्यादा होते हैं। इमाम हुसैन (अ.) 3 शाबान, 4 हिजरी को पैदा होकर सरवरे कायनात (स.) की परवरिश व परदाख्त और आगोशे मादर में रहे और कसबे सिफात करते रहे। 28 सफर, 11 हिजरी को जब आंहज़रत (स.) शहादत पा गये और 3 जमादुस्सानी को माँ की बरकतों से महरूम हो गये, तो हज़रत अली (अ.) ने तालीमाते इलाहिया और सिफाते हसना से बहरावर किया, 21 रमज़ान, 40 हिजरी को आपकी शहादत के बाद इमाम हसन (अ.) के सर पर ज़िम्मेदारी आयद हुई। इमाम हसन (अ.) हर किस्म की इस्तेमवाद व इस्तेयानते खानदानी और फैज़ाने बारी में बराबर के शरीक रहे।

28 सफर, 50 हिजरी को जब इमाम हसन (अ.) शहीद हो गये तो इमाम हुसैन (अ.) सिफाते हसना के वाहिद मरकज़ बन गये। यही वजह है कि आप में जुमला सिफाते हसना मौजूद थे, और आपके तरज़े हयात में मोहम्मद (स.) व अली (अ.) फात्मा (स.) और हसन (अ.) का किरदार नुमायां था, और आपने जो कुछ किया कुरआन और हदीस की रौशनी में किया। कुतूबे मक़ातिल में है करबला में जब इमाम हुसैन (अ.) रूख़्सते आख़िर के लिये खैमें में तशरीफ़ लाये तो जनाबे ज़ैनब (स.) ने फ़रमाया था कि ऐ, खामेसे आले एबा आज तुम्हारी जुदाई के तसव्वुर से ऐसा मालूम होता है कि मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.), अली मुर्तुज़ा (अ.), फ़ातिमा ज़हरा (स.) हसने मुजतबा (अ.) हम से जुदा हो रहे हैं।

(📚असाबा सफा 12, जिल्द 2. मुसतदरिक इमाम हाकिम व मतालेबुल सुवेल सफा 223)

📚 चौदह सितारे, मौलाना नजमुल हसन क़रारवी साहब 

इंशाल्लाह जारी रहेगा..............................

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