ईदे ग़दीर की अज़्मत मासूमीन अस की निगाह में

 ईदे ग़दीर की अज़्मत मासूमीन अस की निगाह में 

1

रसूल ख़ुदा (स.अ.) (ने मैदान ए ग़दीर में फ़रमाया) जिसका मैं मौला हूं ये अली (अस) उसके मौला हैं। एै अल्लाह! जो इन्हें दोस्त रखे, तू उसे दोस्त रख और जो इन्हें दुश्मन रखे, तू उसे दुश्मन रख, और उसकी मदद कर जो उसकी मदद करे और उसकी मदद कर जो इनकी मदद करे और उसकी मदद न कर जो इनकी मदद न करे और उस पर लानत कर जिसने इन पर ज़ुल्म किया। 

📚मौला अली (अ.स.) की शान में 1000 हदीस, स.351

2

रिवायत :-

 रसूले खुदा (सअ) ने अपने असहाब के दरमियान अख़ुव्वत बरकरार की, उमर और अबू बक्र को एक दूसरे का भाई बनाया और इसी तरह दुसरो के दरमियां भी अखुल्वत बरकरा की। इसी दौरान अली (अ.स.) पैगंबर ए ख़ुदा (सअ) के पास आये और अर्ज़ की, "आप ने असहाब के दरमियान अख़ुव्वत को बरक़रार किया लेकिन मुझे किसी का भाई नहीं बनाया"। रसूले ख़ुदा (सअ) ने फरमाया, "तुम इस दुनिया और आख़ेरत में मेरे भाई हो"। 

📚मौला अली (अ.स.) की शान में 1000 हदीस, स.270

3

रिवायत :-

रसूले ख़ुदा (सअ) ने अपने असहाब के दरमियान बिरादरी बरकरार की। उस वक्त खुद पैग़म्बर (सअ), अबू बक्र, उमर और अली (अ.स.) बाकी रह गए। पैग़म्बर (सअ) ने अबू बक्र और उमर को एक दूसरे का भाई बनाया और अली (अ.स.) से फरमाया, "आप मेरे भाई हैं और मैं आप का भाई हूं। अगर कोई आपको जानता ना हो तो कह दीजिए, 'मैं ख़ुदा का बंदा और रसूले ख़ुदा (सअ) का भाई हूं'। आप के बाद झूठों के अलावा कोई और ये दावा नहीं करेगा। 

📚मौला अली (अ.स.) की शान में 1000 हदीस, स.270

4

रिवायत :-

 जब रसूले ख़ुदा (सअ) ने ग़दीर ए ख़ुम में हज़रत अली (अ.स.) की नियाबत ओ विलायत का ऐलान किया तो इब्लीस के चेले खूब रोए-पीटे और उन्होंने इब्लीस से कहा के अब तुम्हारा इब्लीसी निज़ाम ना-काम हो चुका है, मुहम्मद मुस्तफ़ा (सअ) ने अपना जानशीन मुक़र्रर कर दिया है, लिहाज़ा अब हमारा निजाम क़ायम नहीं रह सकता, इब्लीस ने कहा, "तुम्हें डरने और परेशान होने की जरूरत नहीं है। उम्मत ए इस्लामिया में मेरे कुछ हम-नवा (समर्थक आवाज) भी मौजूद हैं और वो अली (अस) को मसनद ए इक़्तेदार (सत्ता की कुर्सी) पर आने ही नहीं देंगे।" 

📚तफ़सीर नूर उस सक़लैन, ज7, स.89

5

इमाम सादिक़ (अ.स.) से मुफ़ज़्ज़ल बिन उमर ने दरयाफ़्त किया, "मुसलमानों की कितनी ईदें हैं?" आप ने फरमाया, "4", मुफ़ज़्ज़ल ने कहा, "ईदैन (ईद उल फ़ितर और ईद उज़ ज़ोहा) और जुमा को तो मैं जनता हूं। चौथी ईद कौन सी है?" आप ने फरमाया, "चौथी ईद उन तमाम ईदों से अफज़ल ओ अकरम है वो है ईद ए ग़दीर, जब हुज़ूर ए अकरम (सअ) ने 18 ज़िल्हिज को अपने भाई को अपना जानाशीन मुक़र्रर फरमाया था"। मुफ़ज़्ज़ल ने पुछा, "हमें उस दिन क्या करना चाहिए"। इमाम (अ.स.) ने फरमाया, "उस दिन हर सात (पल कृपा) अल्लाह की हम्दो शुक्र करना चाहिए और रोज़ा रखना चाहिए, पिछली उम्मतों में भी ये दस्तूर था के जिस दिन किसी वसी का ऐलान किया जाता था तो वो उम्मत उस दिन को ईद का दिन करार देती थी। 

📚हिदायत उश शिया, स.280

6

इमाम सादिक़ (अ.स.) जब रसूले ख़ुदा (सअ) ने जुमा के दिन अरफ़ात में क़याम किया तो जिब्रील ए अमीन (अ.स.) नाज़िल हुए और कहा, "अल्लाह तआला आप पर सलाम भेजता है और आप से कह रहा है के, 'आप अपनी उम्मत को ये पैग़ाम पहुंचा दें "अल यौमा अकमलतु लकुम दीनाकुम", मैंने विलायत ए अली (अ.स.) के ज़रीये से तुम्हारे दीन को मुकम्मल किया है; अब इसके बाद मैं कोई और फ़रीज़ा तुम पर नाज़िल नहीं करूंगा, मैंने तुम पर नमाज़ फ़र्ज़ की है , माह ए रमज़ान के रोज़ फ़र्ज़ किए हैं, मैंने तुम पर ज़कात की अदायगी को फ़र्ज़ किया है और बैतुल्लाह का हज तुम पर फ़र्ज़ किया है और अब मैंने तुम पर विलायत फ़र्ज़ की है, पहले चारों फ़राएज़ उस वक़्त तक क़ुबूल नहीं करूँगा जब तक पांचवी फ़र्ज़ पर अमल नहीं करोगे'।"

📚 ग़यातुल मराम, ज1, स.530

7

इमाम रज़ा (अ.स.) 

तुम जहां भी हो हर हाल में ह.अमीर (अस) की बरग़ाह में हाज़िर हो, क्यों की ख़ुदा वंदे आलम (ग़दीर के दिन) हर मोमिनो मोमिना और मुस्लिमो मुस्लिमा के 70 साल के गुनाह माफ़ करता है और उस से 2 गुना (डबल) लोगों को जहन्नुम से आज़ाद करता है जिस क़दर माह ए रमज़ान में और लैलतुल क़द्र में और शब ए ईद उल फ़ितर में आज़ाद करता है, और तुम्हारा इस दिन मोमिन भाईयों पर एक दिरहम ख़र्च करना 1000 दिरहम के बराबर है। पस, तुम इस दिन अपने (इमानी) भाईयों पर मेहरबानी करो और मोमिन ओ मोमिना को शाद/ख़ुश करो।

📚 वसाएल उश शिया, ज10, स.227

8

इमाम सादिक़ (अ.स.) 

(ईद-ए-अफ़ज़ल-ईद-ए-ग़दीर) जिस रोज़ अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) इमाम ए ख़ल्क़ बनाए गए वो ईद दोनो ईदों से अफ़ज़ल ओ अशरफ़ है। इस दिन रोज़ा रखो और मुहम्मद (स.अ.) और आल ए मुहम्मद (अ.स.) पर बहुत ज़्यादा दुरूद भेजो और उनके ज़ालिमों से बेज़ारी ज़ाहिर करो, अम्बिया (अ.स.) अपने अपने औसिया को आज के दिन रोज़ा रखने का हुक्म देते और अपना वसी इस दिन बनाते थे और इस दिन ईद मनाने का हुक्म देते थे।" 

📚फ़ुरू ए काफ़ी,ज3, स.325

9

इमाम सादिक़ (अ.स.) 

जुमा मुसलमानों की ईद है जो ईद उल फ़ितर और ईद उल क़ुर्बान से भी अफ़ज़ल है, और 18 ज़िल्हिज यानी ईद ए ग़दीर तमाम ईद से अफ़ज़ल है। और हमारे क़ायम ए आल ए मुहम्मद (अतफ़श) जुमा के दिन ज़हूर फरमाएंगे और क़यामत भी जुमा के दिन क़ायम होंगी, और जुमे के दिन सब से अफ़ज़ल अमल सरकार ए मुहम्मद ओ आल ए मुहम्मद (अ.स.) पर दुरूद ओ सलाम भेजना है। 

📚वसाए उश शिया, ज5, स.69

10

इमाम अस्करी (अ.स.) 

से सवाल हुआ के रसूले ख़ुदा (सअ) के क़ौल/हदीस "मन कुन्तो मौलाहो फ़ा हाज़ा अलीयुन मौला" का क्या मतलब है? आप ने फरमाया, "रसूले ख़ुदा (सअ) (की इस हदीस) का मतलब ये है कि जब मुसलमानो में फिरका-बंदी और गिरोह-बंदी (सांप्रदायिकता) हो तो ह. अली (अस) इलाही (अल्लाह के) गिरोह की अलामत (निशानी) क़रार पायें"। 

📚बिहार उल अनवर, ज9, स.315

11

इमाम बाक़िर (अ.स.) 

रोज़ा रखा करो यौम ए ग़दीर (18 ज़िल्हिज) और 27 रजब को क्यों की ग़दीर के रोज़ अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) क़ुल कायनात के इमाम और 27 रजब को रसूलुल्लाह मुहम्मद (स.अ.व.) को नबूवत का ताज पहनाया गया था, इस दिन का रोज़ा 60 महीनों के रोजों से अफ़ज़ल है। 

📚अक़्वाल ए मासूमीन (अ.स.), स.134

12

इमाम सादिक़ (अ.स.) 

ग़दीर ए ख़ुम के दिन का रोज़ा अगर कोई क़यामत तक ज़िंदा रहे तो पूरी उम्र के बराबर है और इस दिन का रोज़ा ख़ुदा के नज़दीक 100 क़ुबूल-शुदा हज और उमरा के बराबर है और यही वो दिन है जो अज़ीम ईद में शुमार होता है। 

📚मौला अली की शान में 1000 हदीस, स.356

13

इमाम सादिक़ (अ.स.) .

इस (ईद ए ग़दीर) के दिन बजा जाने वाला अमल 80 महीनों के अमल के बराबर है।

📚सवाबुल आमाल ओ इक़ाबुल आमाल, स.161

14

इमाम सादिक़ (अ.स.) 

ग़दीर ए ख़ुम में रसूले ख़ुदा (सअ) ने ह. अली (अस) को लोगों का रहनुमा मुक़र्रर किया और विलायते अली अस ये इस्लाम का आख़िरी फ़रीज़ा है इसके बाद ख़ुदा ने किसी फ़रीज़े को नाज़िल नहीं किया। 

📚ग़यातुल मराम, ज1, स.527

15

इमाम सादिक़ (अ.स.) 

मैं अली (अ.स.) पर तअज्जुब करता हूं, हज़ारों गवाह होने के बवाजूद उन्हें अपना हक़ नहीं मिला, जब कि अपना हक़ पाने के लिए सिर्फ़ 2 गवाह ज़रूरी हैं। 

📚(बिहार उल अनवर, ज.37, स.140), 40 हदीस - ग़दीर

16

इमाम रज़ा (अ.स.)

 जो आज (ग़दीर) के दिन किसी मोमिन को मिलने जाएगा, अल्लाह 70 किस्म के नूर उसकी क़ब्र में भेजेगा और रोज़ाना 70000 फ़रिश्ते उसकी क़ब्र में मिलने आयेंगें और जन्नत की बशारत देंगे।

📚 40 हदीस - ग़दीर

17

इमाम सादिक़ (अ.स.) 

जो आज (ग़दीर के दिन) किसी भी वक़्त 2 रकअत नमाजध पढ़े मगर अफ़ज़ल ये है कि ज़वाल के क़रीब पढ़े..(इसका सवाब ये है) के जैसे वो उस दिन ग़दीर में मौजूद था।

📚 40 हदीस - ग़दीर

18

इमाम सादिक़ (अ.स.) 

हर साल ग़दीर ए ख़ुम के दिन रोज़ा रखना ख़ुदा के नज़दीक 100 हज और उमरा मक़बूल (क़ुबूल-शुदा/स्वीकार) के बराबर है और इस दिन ख़ुदा की बहुत बड़ी ईद है।

📚 मौला अली की शान में 1000 हदीस, स.356

19

इमाम बाक़िर (अ.स.)

 इस्लाम 5 बुनियाद पर क़ायम है - (नमाज़, ज़कात, रोज़ा, हज और विलायत) और किसी के लिए लोगों को ऐलान नहीं किया गया जैसे विलायत के लिए ग़दीर के दिन हुआ। 

📚40 हदीस - ग़दीर

20

रिवायत

 जिस दिन ह. इब्राहिम (अ.स.) पर आतिश ए नमरुद गुल्ज़ार हुई, वो ग़दीर का दिन था, पस उन्होंने खुशी में रोज़ा रखा। 

📚तफ़सीर ए अनवार ए नजफ़,ज15, स.11

21

इमाम रज़ा (अ.स.) 

हम मोहर्रम के मनाने की ताकीद इस लिए करते हैं के कहीं तुम ग़दीर की तरह आशूरा को भी ना भूल जाओ।

📚 अक़्वाल ए मासूमीन (अ.स.), स.160

22

इमाम सादिक़ (अ.स.) 

ग़दीर का दिन बाकी दिनों की निस्बत आसमान में ज़्यादा मशहूर है।

📚 वसाएल उश शिया, ज10, स227

23

इमाम सादिक़ (अ.स.)

 ग़दीर ए ख़ुम के दिन रोज़ा रखना 60 साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा है।

📚मौला अली की शान में 1000 हदीस, स.356


👉नोट :- इन्शाल्लाह अभी और भी अहादिसे ईदे ग़दीर के मुताअल्लिक बाक़ी हैं जो आगे पोस्ट की जाएगीं।


✍️ वफ़ा अब्बास ख़ान, अमहट सुल्तानपुर


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