ख़ुत्बा ए अयादत

ख़ुत्बा ए अयादत
शुएैब बिन गफ़ला कहते हैं कि जिस वक़्त हज़रते फ़ातिमा ज़हरा सअ के दुनिया से रुख़सती का वक़्त क़रीब आया तो मुहाजरीन व अंसार की ख़्वातीन आप की अयादत के लिए हाज़िर हुईं और आपसे पूछा के एै बिन्ते पैग़म्बर अब आप की तबीयत कैसी है तो आप ने ख़ुदा की हम्दो सना और अपने बाबा पर दुरूद और सलाम के बाद फ़रमाया :-

बिस्मिल्लाह हिर्रहमा निर रहीम
 
बा ख़ुदा मेरी कैफ़ियत ये है के अब मैं तुम्हारी दुनिया से बेज़ार और तुम्हारे मर्दों से मुत्नफ़्फ़िर हो चुकी हूं, मैंने उन्हें आज़माने के बाद उन से दूरी अख़्तियार कर ली है उनका इम्तेहान लेने के बाद मुझे उनसे नफ़रत हो गई ग़ासिबो के मुक़ाबले में सुकूत, इस्लामो मुस्लेमीन से ख़ेड़वाड़, फ़ुज़ूल काम और दुश्मनों के सामने झुक जाना, आक़ायद की ख़राबी और अफ़कार की गुमराही ये सब किस क़द्र बुरा है। यकीनन उनके नुफ़ूस ने अपने मुस्तक़बिल के लिए बहुत बुरा इंतेज़ाम किया है जिस के सबब अल्लाह उन पर ग़ज़बनाक हो गया और वो हमेशा के लिए अज़ाब में गिरफ़्तार हो गए। तो फिर हमने भी उन की लगाम ख़ुद उनकी गर्दन पर डालदी और उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया ज़िल्लत का सेहरा उन्हीं के सर पर बांध दिया ज़ालिमों पर ख़ुदा की लानत हो वाए हो उन पर! आख़िर उन्होंने किस तरह ख़ेलाफ़त को रेसालत के मज़्बूत क़िले से नबूवत और हिदायत की मुस्तहकम बुनियादों से जिबरील के मुक़ामे नुज़ूल से दिनी और दुनियावी उमूर से आशना हस्तीयों से जुदा कर दिया ? आगाह हो जाओ के खुला हुआ ख़सारा यही है अली (अस) पर उन्हें क्या एतेराज़ है दर हक़ीक़त उन्होंने अली (अस) की धार दार तलवार का इंकार किया मौत से उनकी बेबाकी को नज़रअंदाज़ किया मैदाने जंग में उनकी शजाअत और दुश्मन पर उन के पै दर पै हमले की नाक़दरी की उनके बुग़्ज़ेलिल्लाही पर वो मुतारिज़ हुए जबके बाख़ुदा लोगों के राहे हक़ से भटकने और वाज़ेह दलीलों के उनके इंकार की सूरत में (अली अस) बड़ी नर्मी व मोहब्बत से उन्हें हक़ की तरफ़ रवाना कर देते इस तरह के ना तो इस सफ़र में कोई तकलीफ़ होती ना सवारी को कोई नुक्सान पहुंचता और ना मुसाफ़िर ही थकन का एहसास करता और फिर आख़िरकार उन्हें एक एैसे लज़ीज़ो ख़ुश्गवार चश्में तक पहुंचा देते जिसके दोनों तरफ़ शफ़्फ़ाफ़ पानी बह रहा हो और उसके बाद उन्हें ख़ूब सेराब करके वापिस अपनी मंज़िल की जानिब ले आते और वो अली (अस) को हर हाल में अपना मुख़्लिस और ख़ैर ख़्वाह पाते अली (अस) कभी दुनिया से अपने लिए कोई फ़ायदा ना उठाते और ना उससे कुछ अपने लिए हासिल करते बस इतना करते के प्यासों को सेराब कर देते और भूखों का पेट भर देते और यहीं पर दुनिया परस्त और परहेज़ग़ार का फ़र्क वाज़ेह हो जाता झूठा और सच्चा अलग अलग हो जाते और अगर इन पर बस्तियों के बाशिंदे इमान लाते और परहेज़ग़ारी अख़्तियार करते तो हम उन पर आसमान व ज़मीन की बरकतों के दरवाज़े खोल देते लेकिन उन्होंने झुठलाया, लेहाज़ा हमने उनको उनके करतुतों की पदाश में पकड़ लिया और इस क़ौम के ज़ालेमीन का भी यही हश्र होगा के उन्हें भी अपनी बुराईयों का अंजाम भुगतना पड़ेगा और वो अल्लाह को नातवां नहीं बना सकते, अब ज़रा उनकी बेहूदा और बेतुकी दलीलें सुनलो दुनिया वक़्त ग़ुज़रने के साथ साथ तुम्हें बड़ी हैरतअंग़ेज़ चीज़ें दिखाती है ताअज्जुब की बात अगर है तो उनकी बातों पर तुम्हें ताअज्जुब होना चाहिए। काश मैं ये समझ पाती के उन्होंने किस दलील का सहारा लिया? और किस की पुश्तपनाही पर एतेमाद किया किस मोतबर दस्तावेज़ पर तकिया किया और किस की ज़ुर्रियत के सिलसिले में जसारत की और उस पर मुसल्लत हो गए? वाक़ेअई बहुत बुरे मददग़ार और बहुत बुरे मोनिस व हमदम हैं ज़ालिमों के लिए बड़ा ही बुरा बदल है ये लोग बुज़ुर्गो के बजाए ताबेदारों के पीछे चल पड़े बाज़ूओं के बजाए दुम को थाम लिया जो लोग बुरा करते हुए ये समझते हैं के बहुत अच्छा कर रहे हैं उनकी नाक को ज़मीन पर रगड़ दिया जाएगा। होशियार के यही लोग फ़सादी हैं मगर उन्हें शऊर नहीं वाए हो उन पर आख़िर उन्होंने ये नहीं सोचा के हक़ की तरफ़ रहनुमाई करने वाला पैरवी का ज़्यादा हक़दार है या वो के जो ख़ुद अपनी हिदायत के लिए दूसरों का मोहताज है? तुम्हें हो क्या गया है तुम कैसा फ़ैसला करते हो? मेरी जान की क़सम के ख़ेलाफ़त की ऊंटनी हामेला हो चुकी है और तुम इंतेज़ार करो बहुत जल्द वो अपना बच्चा जनेगी फिर तुम उससे दूध के बजाए ख़ूनेताज़ा और मोहलिक ज़हर दूहो गे यही वो वक़्त होगा जब बातिल के तरफ़दार ख़सारा उठाएं गे और पीछे चलने वाले लोग अपने रहबरों की कारस्तानियों को समझ जाएंगे। अब जाओ अपनी दुनिया में मगन हो जाओ और आने वाले सख़्त इम्तेहान के लिए तैयार रहो कब धार दार तलवारें ख़ुंख़्वार ज़ालिमों का तसल्लुत बेपनाह मुश्किलात सितमग़रों का ज़ुल्म व इस्तेबदाद तुम्हें मुबारक हो। ये सब तुम्हारे माल व दौलत को तबाह और तुम्हारी आबादी को बर्बाद कर देंगे, अफ़सोस है तुम पर जब हक़ीक़त तुम पर वाज़ेह नहीं तो आख़िर नेजात की कैसे उम्मीद रखते हो जब तुम इतनी वाज़ेह दलील को तस्लीम नहीं करना चाहते हो क्या हम तुम्हें इस बात पर मज्बूर कर सकते हैं? 
शुएैब बिन गफ़ला कहते हैं कि ख़्वातीन जब अपने घरों को लौट कर अपने मर्दों से जनाबे सय्यदा (सअ) की ग़ुफ़्तुगू का ज़िक्र किया तो कुछ मुहाजरीन व अंसार बिन्ते नबी से माफ़ी मांगने की ग़रज़ से आपकी ख़िदमत में हाज़िर हुए और कहने लगे कि एै सय्यदा ए आलम अगर बयअत से पहले अली (अस) ने हम से ख़िलाफ़त के सिलसिले में बात की होती तो हम उन्हें छोड़कर किसी और तरफ़ कभी ना जाते!!

ये सुनकर हज़रत ने फ़रमाया :- दूर हो जाओ बहाने बाज़ियों के बाद माफ़ी कैसी? अब तुम्हारी कोताहीयों के बाद कुछ करने को बचा ही नहीं।

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