⭕ मुआविया ल.अ. ने ख़ुद एतेराफ़ किया कि मैं अली इब्ने अबितालिब अलैहिस्सलाम के साथ वही किया जो ख़ोलफ़ा ने किया !!

⭕ मुआविया ल.अ. ने ख़ुद एतेराफ़ किया कि मैं अली इब्ने अबितालिब अलैहिस्सलाम के साथ वही किया जो ख़ोलफ़ा ने किया !!

जब हज़रत अली अलैहिस्सलाम सरीर आराये ख़िलाफ़त हुए और माविया ने मुख़ालिफ़त शुरू की तो ख़लीफ़ा अव्वल के साहबज़ादे मोहम्मद बिन अबिबकर ने माविया को ख़त लिखा कि जिसमें बनी उमय्या के कबाएह और अमीरूल मोमेनीन की फज़ीलतों को बयान करते हुए माविया को इस अम्र पर उभारा कि वह हज़रत अमीरूल मोमेनीन की मुताबेअत करे वरना अज़ाबे आख़िरत के लिये तैयार हो जाये। माविया ने इस ख़त के जवाब में मोहम्मद बिन अबीबकर को यह ख़त लिखा :

तर्जुमा :- यह ख़त है माविया बिन सख़र की जानिब से अपने बाप को ऐब लगाने वाले मोहम्मद बिन अबीबकर की तरफ

अम्मा बाद, मुझे तेरा ख़त मिला, जिसमें तूने ख़ुदा की कुदरत व अज़मत और सुतूत का तज़किरा किया है, जिसका वह अहल है और उस फज़ाएल का ज़िक्र किया है जिनकी वजह से ख़ुदा ने रसूलुल्लाह को बरगुज़ीदा किया है। इसके साथ तूने ऐसी भी बहुत सी बातें लिख दी हैं जिनसे तेरी कमज़ोरी और तेरे बाप की मलामत व ज़लालत ज़ाहिर होती है।

तूने इस ख़त में अली इब्ने अबीतालिब की फज़ीलत और उनके क़दीम साबिक खुसूसियात और रसूल से उनकी कराबत और हर ख़तरे और ख़ौफ के मौके पर रसूल से उनकी हमदर्दी का हाल लिखा है।
पस मेरे मुकाबिले में तेरा इस्तेदलाल करना और मुझमें ऐब निकालना एक दूसरे (यानि अली इब्ने अबीतालिब) के फज़ाएल के ज़रिये से है, अपनी किसी फ़ज़ीलत के ज़रिये से नहीं है। तो मैं उस ख़ुदा का शुक्र करता हूँ जिसने इस फज़ीलत को तुझसे हटा कर तेरे गैर को अता किया है।
हकीकत तो यह है कि हम लोग जिनमें तेरा बाप (अबूबकर) भी शामिल था, अली इब्ने अबीतालिब की फज़ीलत को अच्छी तरह जानते थे और उनके हक को अपने लिये लाज़िम और ज़रूरी समझते थे। पस जब ख़ुदा ने अपने नबी के लिये इस नेअमत को पसन्द कर लिया जो उनके लिये उसके पास मुकर्रर थी, और हज़रत से अपने वादे को पूरा कर दिया और हज़रत की दावत को ज़ाहिर और उनकी हुज्जत को रौशन कर दिया, और उनको अपने पास बुला लिया, तो तेरे बाप और उनके फारूक ही अव्वल वह लोग थे, जिन्होंने अली का हक़ छीन लिया, और उनकी ख़िलाफत के मुताल्लिक उनकी मुखालिफ़त की, इसी बात पर उन दोनों ने इत्तिफाक कर लिया और उसी को कर दिखाया। फिर उन लोगों ने अली को बुलाया कि उन दोनों की बैअत करें, पस अली ने उन दोनों से पहलू तही की और बैअत से किनाराकशी की, पस उन दोनों ने अली को रंज व इन्दोह पहुंचाने का इरादा कर लिया और बड़े बड़े कसद किये..... फिर यह दोनों इस हाल पर रहे कि न तो अली को अपने किसी अम्र में शरीक करते थे न अपने किसी राज़ पर उनको मुत्तेला करते थे, यहां तक कि ख़ुदा ने उन दोनों को मौत दी। फिर तीसरा उस्मान खड़ा हुआ, पस वह उन्हीं दोनों की बताई राह पर चला। पस तूने और तेरे साथी ने उसकी ऐब जोई शुरू की। यहां तक कि दूर दराज़ के नादान लोग भी उसके मुताल्लिक तमा में पड़ गये, पस तुम दोनों ने उसके आफ्तों को चाहा और अपनी अदावतों को ज़ाहिर कर दिया। यहां तक कि उसके मुताल्लिक तुम अपनी मुराद को पहुंच गये।
पस ऐ अबूबकर के बेटे ! तू चौकन्ना रह। और अपनी बालिश्त को अपनी उंगलियों के दरमियानी विसअत पर क्यास कर। तू उस शख़्स (यानि खुद माविया) की बराबरी से आजिज़ है जिसका हिल्म पहाड़ों के बराबर है, दबाओ से उसका नैज़ा नर्म नहीं होता, और न कोई बोलने वाला उसके हुक्म का इदराक कर सकता है। उसने अपनी हुकूमत का तख़्त बिछाया, और अपनी सल्तनत को मुस्तहकम कर लिया।
अब जिस मसअले ख़िलाफ़त पर हम लोग गुफ़्तुगू कर रहे हैं अगर दुरूस्त है तो तेरे बाप (अबूबकर) ही ने अकेले अकेले अलग उसका इन्तेज़ाम कर लिया था और हम लोग तो सिर्फ उसके काम में आ कर उसके शरीक हो गये थे। अगर तेरा बाप इससे पहले ऐसा बर्ताव न किये होता तो हम भी हरगिज़ अली बिन अबीतालिब की मुख़ालिफ़त न करते बल्कि ख़िलाफ़त को उनके लिये मान लेते, लेकिन हमने तेरे बाप को देखा कि उसने अली के साथ ऐसा सुलूक हमसे पहले किया। पस हमने उसके मिस्ल किया। अब तेरा जी चाहे तो जो कुछ ऐब लगाना है अपने बाप को लगा। या फिर इस अम्र से बाज़ आ। वस्सलाम अला मिन अनाब।"
📖 (मरवज्जुज़ ज़हब, अल‌सऊदी, बरहाशिया तारीखे कामिल जिल्द शशुम स० 79 मतबूआ मिस्र जि० 3, कुम, दारूल हजर, 1409 हिजरी, स० 12-13 व किताब फज़ाएले बाहरा फी महासिन मिस्र व काहेरा व शरह नहजुल बलाग़ा इब्ने अबीउल हदीद जुज़ सोम स० 162 छापा ईरान)
📚शोहदा ए कर्बला और उनका सियासी पसमंजर, मोअल्लिफ़ अल्लामा ज़मीर नक़वी सा0

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