इमामे मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम

हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.)

इमाम अली रिज़ा (अ.) के बाद हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.) इमाम हुए जो रसूले ख़ुदा सअवव के नवें जानशीन और सिलसिला-ए-इस्मत की ग्यारहवीं कड़ी थे। आप भी अपने आबा व अजदाद की तरह से मासूम थे सारी कायनात से अफज़ल थे। अल्लामा इन्ने तलहा शाफ़ई लिखते हैं कि इमाम मो० तक़ी (अ.स.) अगरचे तमाम मासूमीन में सबसे कम्सिन और छोटे थे लेकिन आप की क़द्रो मन्ज़िलत आप के आबाओ अजदाद की तरह निहायत ही अज़ीम थी और आप का बुलन्द तज़किरा बर सर नोके ज़बान था। (📚मतालिबुल सऊल पेज 159)

"अल्लामा हुसैन वायज़ काशिफी" लिखते हैं कि "आप की मन्ज़िलत व हस्ती निहायत ही बुलन्द थी।" (📚रौजेतुश्शोहदा 438)

"अल्लामा खाविन्द शाह" लिखते हैं "इल्मो फज़्लो अदब व हिक़मत में इमामे मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को वह कमाल हासिल था जो किसी को भी नसीब नहीं था।" (📚रौज़तुस्सफा जिल्द 3 पेज 16)

"अल्लामा शलन्जी" लिखते हैं कि इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) कम सिनी के बावजूद फज़ायल से भर पूर थे ओर आप के मनाकिबो मदहा बे शुमार हैं। (📚नूरूल अबसार पेज 145)

आपके शरफ़ो क़मालात से मुतासिर हो कर मामून रशीद ने अपनी बेटी उम्मुल फज़्ल का अक्द भी इनके साथ कर दिया था मगर यह भी एक सियासी चाल थी हकीकत यह है कि बनी अब्बास की दुश्मनी में कोई कमी नहीं हुई थी। ख़लीफ़-ए-वक़्त "मोतसिम" ने आप को मदीने से बग़दाद में बुलवा कर क़ैद कर दिया। "अल्लामा अर्बली" लिखते हैं कि चूँके मोतसिम ब ख़िलाफत व नशिस्त आँ हज़रत रा अज मदीन-ए-तैयबा बदारूल ख़िलाफत बग़दाद आर्बुदा व हब्स फरमूदह। (📚कश्फुल गम्मा पेज 121)

एक साल तक आप ने बे र्जुमो ख़ता क़ैद की सख़्तियां बर्दाश्त की यहां तक वह वक़्त आ गया कि मोतसिम अब्बासी ने अपनी बेटी उम्मुल फज़्ल के ज़रिये इमाम को ज़हर से शहीद करा दिया। सिर्फ 25 साल तीन माह बारह दिनों की उम्र में क़ैद खाने के अन्दर ही आप की शहादत हुई।

"अल्लामा इब्ने हजरे मक्की" लिखते हैं कि आप को इमामे रिज़ा की तरह ज़हर से शहीद किया गया। (📚सवायके मोहर्रिका पेज 123)

"अल्लामा हुसैन वायज़ काशिफी", मुल्ला जामी, नेमतुल्लाह जज़ायरी, अल्लामा तबरिसी, नवाब सिद्दीक हसन और अल्लामा शलन्जी सभी मोअरिंखीन के मुताबिक इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को मोतसिम अब्बासी ने ज़हर देकर शहीद किया था। उनकी बीबी उम्मुल फज़्ल, मोतसिम के पास चली गयी। इमाम ने शहादत के वक़्त उम्मुल फ़ज़ल के बदतरीन मुस्तक़बिल का ज़िक्र फ़रमाया था। जिसके नतीजे में उसके नासूर हो गया था और वह दीवानी हो कर मरी थी।

इमाम की शहादत के बाद आपके फर्ज़न्द इमाम अली नकी (अ.स.) ने नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई और आप अपने जद इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) के पहलू में काज़मैन में दफ़्न हुए।

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