इमामे जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.)

इमाम मो. बाक़िर (अ.स.) के बाद इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) इमाम हुए। आप रसूले इस्लाम के छटे जानशीन हुए। आप भी अपने अजदाद की तरह मासूम, आलमे ज़माना और अफज़ले कायनात थे। अल्लामा इब्ने तलहा शाफ़ई लिखते हैं कि आप अहलेबैत और सादात की अज़ीम तरीन फ़र्द थे और मुख़्तलिफ़ क़िस्म के उलूम से भरपूर थे आप ही से कुरआने मजीद के मानी के चश्मे फूटते रहे हैं। आप के बहरे इल्म से उलूम के मोती रोले जाते थे। आप ही से इल्मी अजायबात व कमालात का ज़हूर व इन्किशाफ़ हुआ। (📚मतालिबुल सऊल पेज 273)

अल्लामा इब्ने हजरे मक्की लिखते हैं कि उलमा ने आप से इस दर्जा नक्ले उलूम किया है जिसकी कोई हद नहीं हों। आपका आवाज़-ए-इल्म तमाम अमसा व दयार में फै़ला हुआ था (📚सवायके मोहर्रिका पेज 120)

"मुल्ला जामी" लिखते हैं कि आपके उलूम का अहाता फ़हमो इदराक से बुलन्द है। (📚शवाहिदुन्नबूवत पेज 180)

अल्लामा मिस्र शेख़ मो. खिज़री लिखते हैं कि इन से इमामे मालिक बिन उन्स, इमाम अबू हनीफ़ा और उलमाये मदीना ने रिवायत की है मगर इमाम बुख़ारी ने इनसे कोई रिवायत नहीं ली।(📚तारीख़े फिक़्ह पेज 273 कराची)

इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम ने यूनिवर्सिटी क़ायम की थी जिसमें दीनी उलूम के साथ-साथ दुनियावी उलूम साइंस वगैरा भी पढ़ाई जाती थी इमाम के शार्गिदों की तादाद 4000 थी।

इमाम के बे इन्तिहा सिफातो कमालात के बावजूद आले रसूल से बादशाहाने वक़्त की दुश्मनी बढ़ती ही गई। आपकी विलादत के वक़्त अब्दुल मलिक बिन मरवान (MARWAN) बादशाह था। इसके बाद "वलीद" सुलैमान, उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ मलिक, वलीद बिन यज़ीद बिन अब्दुल मलिक, यज़ीद अलनाकिस, इब्राहिम बिन वलीद और मरवान अल हम्मार बिल तरतीब बादशाह हुए। ये सभी दुश्मने अहले बैत थे इसके बाद बनी उमैया की हुकूमत ख़त्म हो गयी।

"बनी अब्बास" का हुकूमत पर कब्ज़ा हो गया जिसका पहला बादशाह अबुल अब्बास, सफ्फाह और दूसरा "मनसूरे दवानिकी" हुआ। मनसूर ने आपको ज़हर दिलवाकर शहीद करा दिया। 15 शव्वाल सन् 148 हिजरी में आपकी शहादत हुई। (📚इरशाद मुफीद पेज 413, आलामुल वरा पेज 159)

इमामे मूसा काज़िम (अ.स.) ने नमाज़ पढ़ाई और जन्नतुल बकीअ में दफ़्न हुए। दुश्मनों ने आले रसूल की इस रौशन शमा को भी गुल कर दिया।

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