इमामे मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम

इमाम मूसा काज़िम (अ.स.)

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के बाद इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) इमाम हुए जो रसूले अकरम के सातवें जानशीन ओर इस्मत के सिलसिले की नवीं कड़ी थे। आप भी अपने आबा व अजदाद की तरह मासूम मिनल्लाह और अफज़ले कायनात थे। दुनिया की तमाम ज़बानें जानते थे। इल्मे गैब से आगाह थे जैसा की सभी इमाम थे। अल्लामा इब्ने हजरे मक्की लिखते हैं कि "आप हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ के इल्म, मारेफ़त कमाल और अफज़लयत में वारिस व जानशीन थे। आप दुनिया के आबिदों में सबसे बड़े इबादत गुज़ार, सबसे बड़े आलिम और सबसे बड़े सखी थे।" (📚सवायके मोहर्रिका पेज 121)

इब्ने तलहा शाई लिखते हैं कि "आप बहुत बड़ी इज्ज़त व कद्र के मालिक इमाम और इन्तिहाई शान व शौकत के मुजतहिद थे। आपका इजतिहाद में नज़ीर न था। आप इबादत व ताआत में मशहूरे ज़माना और करामात में मशहूरे कायनात थे। इन चीज़ों में आप की कोई मिसाल न थी, आप सारी रात रूकूओ सुजूद और क़यामो कऊद में गुज़ारते और सारा दिन सदक़ा और रोज़े में बसर करते थे।" (📚मतालिबुल सऊल पेज 308)

अल्लामा शिबली लिखते हैं कि आप बहुत बड़ी कद्रो मन्ज़िलत की दुनिया में मुनफ्रिद इमाम और ज़बरदस्त हुज्जते ख़ुदा थे। नमाज़ों की वजह से हमेशा सारी रात जागते थे और दिन भर रोज़ा रखते थे (📚नूरूल अख़बार पेज 135)

इसी तरह तमाम बड़े रावियों ने आपकी कमाले बुज़ुर्गी इबादतो रियाजत और कमाले इल्म का बयान किया है। करामातो मोजिज़ात बयान किये हैं मगर दुश्मनाने आले रसूल ने इन्हें भी क़ैदो बन्द की मुसीबतों में गिरफ़्तार रखा। अल्लामा इब्ने हजरे मक्की लिखते हैं कि बादशाहे वक़्त हारून रशीद ने आप को बग़दाद में क़ैद कर रखा। आप की वफ़ात के बाद हथकड़ी बेड़ी कटवाई गई। आप की वफ़ात हारून रशीद के ज़हर से हुई जो उसने सन्दी इब्ने शाहक के ज़रिये दिलवाया था। जब आप को खाने या खुरमे में ज़हर दिया तो आप तीन रोज़ तक तड़पते रहे यहाँ तक कि इन्तिक़ाल हो गया। (📚सवायके मोहर्रिका पेज 132 अरहजुल मतालिब पेज 454)

आपकी शहादत 25 रजब सन् 183 हिजरी में जुमे को हुई। 55 साल की उम्र में 

मिर्जा दबीर कहते हैं।
मौला पे इम्तेहा ए असीरी गुज़र गई- 
ज़िन्दान में जवानी व पीरी गुज़र गई।😭😭

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