सहाबी ए रसूल हज़रते अबुज़र ग़फ़्फ़ारी रअ
हज़रते अबुज़र ग़फ़्फ़ारी रअ
हजरत अबुज़र ग़फ़्फ़ारी मदीने से मशिरक की जानिब वाके एक छोटे से गांव "रबज़ा" के रहने वाले थे। आपका असल नाम जनदिब बिन जनादा था। जब रसूले अकरम सल० के बारे में सुना तो मक्के आये और ख़िदमते पैग़म्बर सल० में बारयाब होकर इस्लाम कुबूल किया जिस पर कुफ़्फ़ारे कुरैश ने उन्हें तरह तरह की तकलीफें और अज़ीयतें पहुंचाई मगर आपके सिबाते कदम में लगज़िश न आई। इस्लाम कुबूल करने वालों में आप पांचवें नम्बर पर शुमार किये जाते हैं। इस सबकते इस्लामी के साथ आपके ज़ोहद व तक़वा का यह आलम था कि रसूले अकरम सल० ने फ़रमाया, मेरी उम्मत में अबुज़र ज़ोहद व विरा में ईसा बिन मरयम की मिसाल हैं।
आप उमर के ज़मानये ख़िलाफ़त में शाम चले गये थे और उस्मान के ज़मानये ख़िलाफ़त में भी वहीं मुकीम रहे और शब व रोज हिदायत व तबलीग़ के फाएज़ अंजाम देते रहे। हाकिमे शाम माविया को आपका तरीक़ा तबलीग़ गिरां गुजरता था क्योंकि आप उस्मान की सरमायादारी, अक़रूबा परवरी और बेराह रवी पर खुल्लम खुल्ला नक़द व तबसिरा किया करते थे। मगर उसके बावजूद माविया के कुछ बनाये न बनती थी। आख़िरकार उसने उस्मान को लिखा कि अगर अबुज़र कुछ दिनों और यहां मुकीम रहे तो अतराफ के तमाम लोगों को आपकी तरफ से बरगश्ता कर देंगे लेहाज़ा इसका इन्सदाद होना चाहिये। उसके जवाब में उस्मान ने माविया को लिखा कि अबुज़र को किसी सरकश, बेकजावा और तेज रफ़्तार ऊँट पर सवार करके तुन्दखू, बे रहम और संग दिल रहबर के साथ मदीने की तरफ़ भेज दो। चुनानचे हजरत अबुज़र जब मदीने पहुंचे तो अज़ीयत नाक सवारी की वजह से आपकी रानों का गोश्त जुदा हो चुका था और सिर्फ हड्डियों की सफेदी जाहिर हो रही थी। लेकिन मदीने पहुंच कर भी आपकी ज़बाने सदाक़त खामोश न रह सकी। मुसलमानों को रसूल सल० का जमाना याद दिलाते, निज़ामें हुकूमत पर तंज़ करते, सरमायादारी की मुखालिफ़त करते और शाहाना ठाट बाट की बरसरे आम मज़म्मत करते।
उस्मान के लिये जनाबे अबुज़र का यह तर्जे अमल नाकाबिले बर्दाश्त था। चुनान्चे आपने उन्हें एक दिन बुलाया और कहा कि मैंने सुना है कि तुम कहते हो कि बनी उमय्या की तादाद तीस हज़ार तक पहुंच जायेगी तो वह अल्लाह के शहरों को अपनी जागीरें, उसके बन्दों को अपना गुलाम और उसके दीन को फ्रेबकारी का ज़रिया क़रार दे लेंगे।
अबुज़र ने कहा बेशक मैंने पैग़म्बर सल० से यह हदीस सुनी है। उस्मान ने कहा, तुम झूट कहते हो। फिर अपने मुसाहेबीन को मुखातिब करते हुए पूछा कि तुममे से किसी ने पैगम्बर सल० की ज़बान से यह हदीस सुनी है? सबने जवाब नफी में दिया। जिस पर अबुज़र ने फ़रमाया कि इस हदीस के बारे में अमीरूल मोमेनीन हज़रत अली अलै० से पूछा जाये वही इसकी हक़ीक़त बतायेंगे। चुनानचे हज़रत अली अलै० को बुला कर दरियाफ़्त किया गया तो आपने फ़रमाया कि अबुज़र सच कहते हैं। उस्मान ने कहा, आप किस बिना पर इस हदीस की सेहत की गवाही दे रहे हैं? फरमाया, मैंने पैगम्बर सल० को यह कहते सुना है कि "ज़मीन के ऊपर और आसमान के नीचे अबुज़र से ज़्यादा सच बोलने वाला कोई नहीं है'।
अब उस्मान के पास कोई जवाब न था। अगर झुटलाते तो पैग़म्बर सल० की तक़ज़ीब लाज़िम आती लेहाजा पेच व ताब खा कर रह गये और कोई तरदीद न कर सके। अब सरमाया परस्ती के ख़िलाफ़ अबुज़र की सदाए एहतेजाज और बुलन्द होने लगी यहां तक कि आप जब उस्मान को देखते तो इस कुरआनी आयत की तिलावत शुरू कर देते
"(तर्जुमा) जो लोग सोना और चांदी जमा करते हैं और अल्लाह की राह में उसे खर्च नहीं करते उन्हें दर्दनाक अज़ाब की ख़बर सुना दो कि जिस दिन उनका जमा किया हुआ चांदी और सोना दोज़ख़ की आग में तपाया जायेगा और उससे उनकी पेशानियां दागी जायेंगी और उनसे कहा जायेगा कि यह वही है जिसे तुमने अपने लिये ज़ख़ीरा किया था तो अब ज़ख़ीरा अन्दोज़ी का मज़ा चखो।"
उस्मान ने अपनी तीनत, फितरत और आदत के मुताबिक अबुज़र को भी माल व जर का लालच दिया मगर इस ताएरे आज़ाद को - सुनहरी जाल में जकड़ न सके। तशदुद और सख़्ती से भी काम लिया मगर जबान बन्द न कर सके। आख़िर कार उस्मान को ज़ालिमाना रविश ने इस हक़ परस्त को मदीना छोड़ देने और रबज़ा की तरफ़ चले जाने पर अपने शाही फरमान के जरिये मजबूर कर दिया और मरवान को इस अमर पर मामूर किया गया कि वह उन्हें मदीने से बाहर निकाल दे। यह शाही | फ़रमान भी जारी हुआ कि वक्ते रूखसत कोई भी शख़्स अबुज़र से कलाम न करे और न उन्हें अलविदा कहे। मगर अमीरूल मोमेनीन हज़रत अली अलै०, हज़रत इमाम हसन अलै०, हज़रत इमाम हुसैन अलै०, जनाबे अकील अलै०, अब्दुल्लाह इब्ने जाफर अलै० और अम्मार यासिर वगैरा ने इस फ़रमान की कोई परवा नहीं की और यह तमाम हज़रात अशकबार आंखों के साथ ना हज़रत अबुज़र के साथ दूर तक रूख़सत करने के लिये आये।
जिला वतनी के बाद रबज़ा में अबुज़र की जिन्दगी इन्तेहाई मसाएब व आलाम में कटी। आपके फज़न्द "ज़र" ओर अहलिया ने यहीं इन्तेकाल किया। जो भेड़ बकरियां गुज़ारा के लिये पाल रखी थीं वह भी हलाक़ हो गयीं सिर्फ़ एक बेटी रह गयी थी जो बाप के साथ तमाम दुखों में बराबर की शरीक थी। जब सरो सामाने ज़िन्दगी नापैद हो गये और मुसलसल फ़ाकों पर फ़ाके होने लगे तो उसने अबुज़र से कहा, बाबा यह जिन्दगी के दिन अब कैसे कटेंगे, कहीं आना जाना चाहिये और रिज़क़ का सामान फ़राहम करना चाहिये। बेटी की इस तजवीज़ पर अबुज़र उसे, हमराह ले कर सहरा की तरफ़ निकल खड़े हुए मगर घास फूस और दरख्तों के पत्ते भी मयस्सर न आ सके। आख़िरकार थक कर एक जगह बैठ गये। सहरा की रेत इकट्ठा की और उस पर सर रख कर लेट गये। इसी आलमें ग़ुरबत में आपकी सांसे उखड़ने लगीं और निजाई कैफियत तारी हो गयी। जब अबुज़र की दुख्तर ने यह हाल देखा तो सरा सीमा व मुजतरिब हो कर कहने लगीं कि बाबा जान! अगर आपने इस लक व दक सहरा में इन्तेकाल फ़रमाया तो मैं क्यों कर कफ़न दफ़न का इन्तेज़ाम करूंगीं। आपने फरमाया, बेटी घबराओं नहीं, रसूल उल्लाह सल० ने मुझसे फ़रमाया था कि ऐ अबुज़र तुम आलमें गुरबत में इन्तेक़ाल करोगे और कुछ इराकी तुम्हारी तजहीज़ व तकफ़ीन करेंगे। लेहाजा अगर मैं दुनिया से रूख़सत हो जाऊँ तो एक चादर मेरे ऊपर डाल देना और सरे राह जाके बैठ जाना। जब इधर से कोई काफिला गुज़रे तो उससे कहना कि सहाबिये रसूल सल० अबुज़र ने इन्तेकाल किया है।
चुनानचे अबुज़र की रेहलत के बाद उनकी बेटी सरे राह जाकर बैठ गयी। कुछ देर बाद एक काफ़िला नमूदार हुआ जिसमें हिलाल बिन मालिक, एहनिफ बिन कैस तमीमी, असअसा बिन सूहान अबदी, असूद बिन कैस तमीमी और मालिक बिन हारिस अशतर वगैरा शामिल थे। जब उन्होंने हज़रत अबुज़र के इन्क़ाल की ख़बर सुनी तो इस बेकसी की मौत पर तड़प उठे। सवारियां रोक ली गयीं और तजहीज़ व तकफ़ीन के लिये सफ़र मुलतवी कर दिया गया। मालिके अशतर ने जो कफ़न दिया उसकी कीमत चार हज़ार दिरहम थी यह लोग तजहीज़ व तकफ़ीन के फ़राएज अंजाम देने के बाद रूख़सत हुए और अबुज़र की बेटी को भी अपने हमराह ले गये। यह वाकिया ८ जिलहिज सन् ३२ हिजरी का है। एक रिवायत में है कि मालिके अशतर और उनके साथियों ने कफ़न व दफ़न से फारिग हो कर अबुज़र के हक़ में दुआये मग़फेत की और उस्मान के लिये बद दुआ की।
📚 तारीख़े इस्लाम,ज3, अल्लामा फ़रोग़ काज़मी
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