इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम का मर्तबा पेशे ख़ुदा
इमामे हुसैन (अ.स.) का मर्तबा पेशे खुदाः-
रसूले अकरम महज़ दुनियावी रिश्ते से हुसैन (अ.स.) को नहीं चाहते थे बल्कि ख़ुदा वन्दे आलम की खुश्नूदी भी इस मोहब्बत में शामिल थी जिनके गवाह सैकड़ों वाकेआत हैं। कुछ का ज़िक्र हम कर चुके हैं। एक वाकेआ ये भी है कि एक दिन इमामे हसन (अ.स.) और इमामे हुसैन (अ.स.) ने तख़्ती लिखी फिर आपस में मुकाबला हुआ कि किसकी तहरीर अच्छी है। दोनों अपने नाना के पास गये। नाना रसूले अकरम ने कहा कि अपने बाबा "अली" (अ.स.) के पास जाओ। दोनों भाई हज़रत अली के पास गये। अली (अ.स.) ने कहा कि अपनी माँ फ़ातिमा (स.अ.) के पास जाओ। दोनो भाई अपनी माँ की ख़िदमत में हाज़िर हुए और सवाल किया कि मादरे गिरामी किसका ख़त अच्छा है। माँ ने फ़रमाया दोनों का लेकिन अगर तुम नही मुतमइन हो तो इसका फैसला अल्लाह करेगा। मैं अपना गुलूबन्द तोड़े देती हूँ। दोनों इसके मोती चुन लो। उन्होंरे हार तोड़ कर डाल दिया जिसमें सात मोती थे। दोनों बच्चों ने मोती चुने और दोनों के हाथ तीन तीन मोती आये आख़िरी मोती के बचते ही ख़ुदा के हुक्म से जिबरईल नाज़िल हुए और उन्होंने मोती को दो हिस्सों में बाँट दिया। दोनों बच्चों ने आधा आधा मोती उठा लिया। इस तरह ख़ुदा ने किसी की दिल शिकनी नहीं होने दी।
इसी तरह हालते नमाज़ में पुश्ते रसूल पर इमाम हुसैन का आना और हुक्मे ख़ुदा से रसूल को सजदे में तूल देना और हिरन के बच्चे का इमाम हुसैन के लिये आना इसी तरह के सैकड़ो वाकेआत है जिनसे ज़ाहिर होता है ख़ुदा की निगाह में हुसैन (अ.स.) का क्या मर्तबा व अज़मत है।
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