शोहदा ए कर्बला के मुख़्तसर सवाने हयात

1  हज़रते हुर इब्ने यज़ीदे अर-रियाही
आप का नामे नामी और इस्मे गिरामी हुर्र इब्ने यज़ीद इब्ने नाजीया इब्ने अनब इब्ने इताब इब्ने हुरमी इब्ने रिया इब्ने यरबू इब्ने खन्ज़ला इब्ने मालिक इब्ने ज़ैदमना इब्ने तमीम अल यरबूई अर रियाही था।

आप अपने हर अहदे हयात में शरीफे कौम थे। आप के बाप दादा की शराफ़त मुसलेमात से थी पैग़म्बरे इस्लाम के मशहूर सहाबी ज़ैद इब्ने उमर इब्ने कैस इब्ने इताब जो (अहवज़) के नाम से मशहूर थे और शायरी में बा-कमाल माने जाते थे वो आप के चचा ज़ाद भाई और आप के ख़ानदान के चश्मों चराग़ थे।

हज़रते हुर्र का शुमार कुफे के रइसों में था। इब्ने ज़ियाद ने जब आप को एक हज़ार के लश्कर समैत इमाम हुसैन (अलै०) से मुकाबेला करने के लिये भेजा था उस वक़्त आप को एक गैबी रिश्ते ने जन्नत की बशारत दी थी। जनाबे हुर्र का लश्कर मैदान मारता हुआ जब मकामे "शराफ्" पर पहुँचा और इमाम हुसैन (अलै०) के काफिले को देखकर दौड़ा तो तमाज़ते आफ‌ताब और रास्ते की दोश ने प्यास से बेहाल कर दिया था। मौला की ख़िदमत में पहुँच कर जनाबे हुर्र ने पानी का सवाल किया। साकिये कौसर के फ़र्ज़न्द ने सेराबी का हुक्म दे कर आने की गरज़ पूछी, उन्होनें अर्ज़ की, मौला ! आप की पेश-कदमी रोकने और आप का मुहासिरा करने के लिये हमको भेजा गया है। पानी पिलाने से फ़रागत के बाद इमाम हुसैन (अलै०) ने नमाज़े ज़ोहर अदा फ़रमाई। हुर ने भी साथ ही नमाज़ पढ़ी। फिर नमाज़े अस्र पढ़ कर हज़रत इमाम हुसैन (अलै०) ने कूच कर दिया। हुर्र अपने लश्कर समेत काफिला-ऐ-हुसैनी से कदम मिलाये हुये चल रहे थे और किसी-किसी मकाम पर हज़रत की ख़िदमत में मौत का हवाला देते थे। मक़सद ये था कि यज़ीद की बैअत करके अपने को हलाकत से बचा लीजिये आप इस के जवाब में इरशाद फ़रमाते थे "हक पर जान देना हमारी आदत है" रास्ते में ब-मकामे अज़ीब तरमाह इब्ने अदी अपने चार साथियों समेत इमाम हुसैन (अलै०) से आ मिले। हुर्र ने कहा ये आप के हमराही नही है इस वक़्त कूफ़े से आ रहे है ये..... मैं इन्हे आप के हम-रकाब रहने न दूँगा आप ने फ़रमाया तुम अपने मुआहदे से हट रहे हो। सुनो ! अगर तुम अपने मुआहदे के ख़िलाफ इब्ने ज़्यिाद के हुक्म पहुँचने से पहले हम से कोई मुज़ाहेमत की तो फिर हम तुम से जंग करेंगे। ये सुन कर हुर्र खामोश हो गए और काफिला आगे बढ़ गया। "क़स्रे बनी मुक़ातिल पर मालिक इब्ने नसर नामी एक शख़्स ने हुर्र को इब्ने ज़ियाद का हुक्मनामा दिया जिस में मरकूम था कि जिस जगह मेरा यह ख़त तुम्हें मिलें उसी मक़ाम पर इमाम हुसैन अलै० को ठहरा देना। और उस अम्र का ख़ास ख़्याल रखना कि जहाँ वो ठहरें वहाँ पानी और सब्ज़ी का नामो निशान तक न हो इस हुक्म को पाते ही हुर्र ने आप को रोकना चाहा। आप तरमाह इब्ने अदी के मशविरे से आगे बढ़े और दो मोहरम यौमे पंजशम्बा ब-मकामे करबला जा पहुँचे हुर्र ने आपको बे-ग्याह जंगल में पानी से बहुत दूर ठहराया और इस अर्म की कोशिश की कि हुक्मे इब्ने ज़्याद में फर्क न आने पाये। (१)

दूसरी मोहरम तक ज़मीने करबला पर हुर्रे रियाही इब्ने ज़ियाद और इब्ने सअद के हर हुक्म की तकमील करते रहे और हालात का जायज़ा लेते रहे। सुबहे आशूर आप इस नतीजे पर पहुँचे कि जन्नत व दोज़ख कां का फैसला कर लेना चाहिये।

चुनान्चें आप इन्तेहाई तरद्दुद व तफ़‌क़्कुर में इब्ने सअद के पास गये और पूछा कि क्या वाकई इमाम हुसैन (अलै०) से जंग की जाये ? इब्ने सअद ने जवाब दिया बे-शक तन फड़केगें, सर बरसेगें, और कोई भी हुसैन और उनके साथियों में से न बचेगा।

ये सुन कर हुर्र ख़ामोशी के साथ आहिस्ता-आहिस्ता इमाम हुसैन (अलै०) के लश्कर की तरफ बढ़ने लगे यहाँ तक कि इमाम हुसैन (अलै०) की ख़िदमत में आ पहुँचे। बनी हाशिम ने इस्तेबाल किया। इमाम हुसैन अलै०ने सीने से लगाया। हुर्र ने अर्ज़ की, मौला ! ख़़ता मुआफ मेरे पदरे नामदार ने आज शब को ख़्वाब में मुझे हिदायत की है कि मैं शरफ़े कदम बोसी हासिल कर के दरजा-ए-शहादत पर फाऐज़ हो जाऊँ। मौला ! मैं ने ही सब से पहले हुजूर को रोका था। अब सब से पहले हुजूर पर कुर्बान हो जाना चाहता हूँ।

(१) मुअर्ररखीन का कहना है कि इब्ने ज़ियाद और उमरे सअद को हुर्र पर बड़ा ऐतेमाद था इसीलिये सब से पहले उन्ही को रवाना किया था और फिर यौमे आशूर लश्कर की तक्सीम के मौके पर भी उन्हें लश्कर के चौथाई हिस्से पर जो क़बीला -ए-तमीम व हमदान पर मुश्तमिल था। सरदार कार दिया था।

इज़्ने जिहाद दिजिये ताकि गर्दन कटाकर बारगाहे रिसालत में सुर्ख-रू हो सकूं।

इमाम हुसैन अलै० ने इजाज़त दी. जनाबे हुर्र मैदान में तशरीफ लाये और दुश्मनों को मुखातिब करके कहा।

* ऎ दुश्मने इस्लाम शर्म करो अरे तुमने नवासे रसूले को ख़त लिखकर बुलाया। उन की नुसरत व हिमायत का वायदा किया और ख़ुतूत में ऐसी बातें तहरीर कि के हुजूर को शरअन तामील करना पड़ी और वह जब तुम्हारे दावत नामों पर भरोसा कर के आ गयें हैं तो तुम उन पर मज़ालिम के पहाड़ तोड़ रहे हो उन्हे चारों तरफ से घेरा हुआ है और उन के लिये पानी की बन्दिश कर दी है।"

एै ज़ालिमों ! सोचो यहूदो नसारा पानी पी रहे हैं और हर किस्म के जानवर पानी में लोट रहे हैं लेकिन आले मोहम्मद एक-एक कतरा-ए-आब के लिये तरस रहे हैं। अरे तुमने मोहम्मद कि आल के साथ कितना बुरा सुलूक रवा रखा है।

जनाबे हुर की बात अभी ख़त्म न होने पाई थी कि तीरों की बारिश शुरू हो गई आप ज़ख़्मी हो कर इमाम हुसैन अलै० कि ख़िदमत में हाज़िर हुऐ और अर्ज की, मौला अब आप मुझसे खुश हो गये इमाम हुसैन अलै० ने दुआ दी और फ़रमाया एै हुर्र । फरदा अज़ अतिशी दोज़ख आज़ाद ख्वाही वूद। तू फरदा-ए-क़यामत में अतिशे जहन्नम से आज़ाद हो गया।

इसके बाद जनाबे हुर्र फिर मैदान में तशरीफ लाऐ और निहायत बे-जिगरी से नबर्द आज़माँ हुऐ और आप ने पचास दुश्मनो को तहे तेग कर दिया दौराने जंग में अय्यूब इब्ने मशरा ने एक ऐसा तीर मारा जो जनाबे हुर्र के घोड़े के पीठ में लगा और आपका घोड़ा बे-काबू हो गया आप प्यादा हो कर लड़ने लगे नागाह आप का नैज़ा टूट गया और आपने तलवार संभाली अलमदारे लश्कर को आप क़त्ल करना ही चाहते थे कि दुश्मनों ने चारो तरफ़ से शदीद हमला कर दिया। बिल आख़िर कसूर लई इब्ने कुनाना ने सीना-ऐ-हुर्र पर एक ज़बरदस्त तीर मारा जिसके सदमे से आप ज़मीन पर गिर पड़े और इमाम हुसैन अलै० को आवाज़ दी मौला ख़बर लीजिये ! इमाम हुसैन अलै० जनाबे हुर्र की आवज़ पर मैदाने जंग में पहुँचे और देखा जाँ-निसार ऐडियाँ रगड़ रहा है। आप उसके करीब गये और आपने उनके सर को अपनी आगोश में उठा लिया। जनाबे हुर्र ने आँखें खोल कर चेहरा-ए-इमामत पर निगाह की और इमाम हुसैन अलै० को बेबसी के आलम में छोड़ कर जन्नत का रास्ता लिया।

रियाज़े शहादत में है कि आप को सब शोहदा की तदफीन के मौके पर बनी असद ने इमाम हुसैन अलै० से एक फ़रसख के फासले पर गरबी जानिब दफ़्न किया और वही पर आप का रौज़ा बना हुआ है।

⬛ हज़रते हुर अलैहिस्सलाम के बेटों का तज़्केरा 
हज़रते हुर्र की कई औलादें थी। अली इब्ने हुर्र ने करबला में शहादत पाई हजर इब्ने हुर्र को इमाम हुसैन अलै० पर पानी बन्द करने के लिये चार हजार का लश्कर दे कर भेजा गया था। लेकिन जब इब्ने ज़ियाद को मालूम हुआ कि हुर्र इमाम हुसैन अलै० की तरफ झुक रहा है तो फौरन शीस इब्ने रबीअ को एक लश्करे गरों के हमराह करबला में बन्दिशे आब के लिये भेजा और इब्ने हुर्र पर भी उसे निगरॉ करार दिया। मातीन 351 हिजरी में है कि हज़रते हुर्र के लश्करे उमरे सअद लईं के निकल आने के बाद हजर इब्ने हुर्र भी निकल आये और उन्होंने हज़रत इमामे हुसैन अलै० से इजाज़त हासिल करके लश्करे उमरे सअद लईं पर हमला किया और घमासान की जंग में 120 दुश्मनों हो को क़त्ल करके शहीद हुये उन की शहादत के बाद इमाम हुसैन अलै० ने चाहा कि उन की लाश उठायें मगर दुश्मनों ने मज़ाहेमत बिल आख़िर इमाम हुसैन अलै० ने जंग आज़माई शुरू की आठ सौ दुशमनों को क़त्ल करके लाशा-ए- हजर बिन हुर्र को ख़ेमे तक पहुँचाया।

अबीदुल्लाह इब्ने हुर्र क़मक़ाम में है कि इस का शुमार शुजाआने अरब में था। उस ने जंगे सिफ़्फ़ीन में माविया के साथ हज़रत अली के लश्कर से जंग की। आप की शहादत के बाद कूफ़े में सुकूनत गीर हो गया था। वाक्या-ए-करबला के मौके पर ये बिल-क्रद कहीं चला गया था और उसने किसी का साथ नही दिया। एक दिन ये इब्ने ज़ियाद से मिलने गया। इब्ने ज़ियाद ने पूछा कि तू कहाँ था ? उस ने जवाब दिया कि मैं अलील था, फिर इब्ने ज़ियाद ने दरयाफ़्त किया कि तू हमारे दुश्मनों के साथ करबला में था उस ने कहा अगर ऐसा होता तो उसके कुछ असरात होते ये बातें हो ही रही थीं कि इब्ने ज़ियाद किसी और तरफ़ मुतावज्जो हो गया अबीदुल्लाह इब्ने हुर्र घोड़े पर सवार होकर किसी तरफ़ चल दिया जब इब्ने ज़ियाद ने उसे न पाया तो उसे तलाश कराया अबीदुल्लाह इब्ने हुर्र को लोगो ने पा लिया और उससे कहा 'कि चलो इब्ने ज़ियाद ने बुलाया है' तो उस ने जवाब दिया कि 'मैं अपने इख़्तेयार से तो किसी तरह उसके पास न जाऊँगा।' फिर उसके बाद वह वहाँ से अपने लश्कर यानी हमराहियों समेत करबला को चला गया वहा पहुँच कर उस ने बेपनाह गिरया किया और सात शेरो पर मुश्तमिल एक मरसिया कहकर उसे करबला में पढ़ा और मदायन को चला गया उसके मरसिये का एक शेर यह है :-

व लौ अना अवासियाह वे-नफ्सी लनलत करामता यौम-अल सलाक।

इस में कोई शक नहीं कि मैं अगर इमाम हुसैन अलै० कि आवाज़ पर लब्बैक कहकर उन की मदद के लिये गया होता तो ज़रूर कयामत के दिन बड़ी करामात का मालिक होता लेकिन अफसोस मैं उस शरफ़े ख़िदमत से महरूम रहा।

⬛हज़रते हुर की हयाते अबदी

जिस तरह तमाम शोहदा ज़िन्दा हैं उसी तरह से हज़रते हुर्र की ज़िन्दगी भी मुसल्लम है मिर्ज़ा मोहम्मद हैदर शिकोह इब्ने मिर्ज़ा मोहम्मद काम बक्श इब्ने र्मिज़ा मोहम्मद सुलेमान शिकोह इब्ने शाहे आलम बादशाह देहली ने अपने रिसाला "इल्मे हैदरी " में लिखा है कि 804 हि० में ये मालूम करके हज़रते हुर्र के सरे मुबारक पर एक ऐसा रूमाल बधा हुआ है जो हज़रते फ़ातिमा ज़हरा स० का काता व बुना हुआ है। मैंने चाहा कि कब्र खुदवा कर उसे निकाल लूँ लेकिन ओलमा ने इसकी इजाज़त न दी मैं सख़्त रंजीदा था कि सय्यद मदनी मुल्ला हसन ने मुझसे कहा कि मदीने में एक ज़ैद हाशमी है उनके पास हजरते सय्यदा स० की बुनी हुई एक चादर है जिस पर बहुत से नक़्श और हर्फ़ उभरे हुऐ है मैंने कोशिश करके उसे हासिल कर लिया और उसे सर पर बाँध कर नजाते उख़रवी का ज़रिया करार दिया हबीब-अल-सीर में है कि सन् 914 हि० में शाह इस्माईल सफ़वी ने हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम हज़रते अब्बास अलै० और जनाबे हुर्र के रौज़ो की तजदीद व तरफीअ की अल्लामा नेमत-उल-अल्लाह जज़ायरी तहरीर फ़रमाते है। "इसी सन् 914 हि० में शाह अब्बास ने हज़रते हुर्र की क़ब्र खुदवा कर उन की लाशे मुतहर से वो रूमाल खोला जो इमाम हुसैन अलै० ने ब-वक़्ते शहादत उन के सर पर बांध दिया था। रूमाल का खोला जाना था कि सरे हुर्र से खूने ताज़ा जारी हो गया ये देख कर रूमाल फौरन बंधवा दिया गया" ।

ख़ूने ताज़ा का जारी होना शहादत देता है कि हज़रते हुर्र भी हयाते अबदी के मालिक है जिस तरह तमाम शोहदा ज़िन्दा है उसी तरह ये भी वाई ज़िन्दगी से बहरावर हैं।

⬛अली इब्ने हुर्रे रियाही

आप हज़रते हुर्र इब्ने यज़ीद अल-रियाही के बेटे थे। आप का नाम अली था। हज़रत की शहादत के बाद आपके दिल में मोहब्बते पदरी ने जोश मारा आप की अक्ल ने जज़्बा-ऐ-शहादत को उभारा इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बेबसी और बेकसी ने दिल व दिमाग़ में इज़्तेराब पैदा कर दिया। बिल आख़िर घोड़े को पानी पिलाने के बहाने से लश्कर इब्ने सअद को छोड़ निकले (काशफी)।

आप ने हज़रते हुर्रे शहीद के कदमों से अपनी आँखों को मला फिर आगे बढ़े और इमाम हुसैन अलै० के कदम बोस हुऐ इमामे मज़लूम ने इजाज़त दी और आप मैदान में नबर्दआज़मा हुऐ आप ने ऐसी जंग की कि दुश्मन हैरान रह गये बिल आखिर आप दुश्मनों को क़त्ल करके शहीद हो गये।

3️⃣➡️ नईम इब्ने अजलान अन्सारी अलैहिस्सलाम 

आप क़बीला ख़ज़रज के चश्मों चराग थे। आप के दो भाई और थे। एक का नाम नज़र और दूसरे का नाम नोमान था ये तीनो भाई अमीरुल मोमिनीन हज़रते अली अलै० के असहाब में से थे। इन लोगो ने जंगे सिफ्फीन में बड़ी जवाँ मर्दी का सबूत दिया था शुजाअत उन के घर की लौंडी थी ये शायर भी थे। नज़र और नोमान वाक्या-ए-करबला से पहले वफात पा चुके थे। और नईम जंगे करबला में शरीक हुऐ। नईम का शुमार हुसैनी वफादारों में था आपको जब पता चला कि फर्ज़न्दे रसूल इमाम हुसैन अलै० आज़िमे इराक़ हैं तो आप कूफ़े से निकलकर हज़ की ख़िदमत में आहाज़िर हुए और आशुरे के दिन पहले हमले में शहीद हो गये।

4️⃣➡️इमरान इब्ने कअब अल-अशजई‌ अलैहिस्सलाम 

आप का पूरा नाम इमरान इब्ने काब इब्ने हारिस अल-अशजई था। आप निहायत शुजाअ और बे-इन्तेहा दीनदार थे। आप ने इमाम हुसैन अ० का जिस वक़्त से साथ इख़्तेयार किया है आख़िर दम तक उसी पर कायम रहे। यहाँ तक कि आप ने सुबहे आशूर जंगे मग़लूबा में जामे शहादत नोश फ़रमाया।

5️⃣➡️खज़ला इब्ने उमर अल-शीबानी अलैहिस्सलाम 

आप इमामे हुसैन अलै० के वफ़ादरों में थे। आप इमामे हुसैन अलै० पर कुरबान होने को तय्यार रहते थे। आले मोहम्मद की ख़िदमत में जान कुरबान करने में खुशी महसूस करते थे। सुबहे आशूर जो दुश्मन की तरफ से कयामत खेज़ हमला हुआ था जनाबे ख़ज़ला इसी में शहीद हो गये थे।


📚72 तारे, मौलाना नजमुल हसन करारवी सा0 


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