एतेराफ़े शरफ़

एतेराफे शरफः-

एक बार का ज़िक्र है कि खलीफा-ए-दोम मिंबर पर खुतबा दे रहे थे कि इमामे हुसैन (अ.स.) मस्जिद में दाखिल हुए और ख़लीफ़ा को मुख़ातिब करके बोले कि मेरे बाप के मिंबर से उतर आ। ख़लीफा मिंबर से उतर आये और कहा मेरे माँ बाप आप पर फिदा हों कभी-कभी आ जाया कीजिये। दोबारा मुलाकात पर कहा फज़न्दे रसूल मुझ पर मेरे बेटे से ज़्यादा आपका हक़ है। (📚असाबा पेज 252)

उलमाये अहले सुन्नत का बयान है कि एक दिन 'अब्दुल्लाह इब्ने उमर' इमामे हसन (अ.स.) और इमामे हुसैन (अ.स.) के सामने फर्ख़ा इफ़्तिख़ार की बातें करने लगे जिनमें गुरूर झलक रहा था। ये सुन कर इमामे हसन (अ.स.) ने फ़रमाया कि तुम "गुलाम ज़ादे" हो। इस पर अब्दुल्लाह इब्ने उमर रंजीदा हुए। अपने बाप के पास गये और इमाम हसन (अ.स.) ने जो कुछ कहा था उनसे बयान किया। ये सुनकर बाप ने कहा कि बेटा ये बात उनसे लिखवा लो अगर लिख दे तो मेरे कफ़न में रख देना। इस रिवायत को शायरों ने भी नज़्म किया है इस लिये बहुत मशहूर है।

रावी कहता है कि एक दिन 'अब्दुल्लाह इब्ने उमर' खाना-ए-काबा के साये में बैठे हुए थे लोगों से गुफ़्तुगू कर रहे थे कि उसी दौरान सामने से इमामे हुसैन (अ.स.) आते हुए दिखाई दिये। अब्दुल्लाह इब्ने उमर ने लोगों को मुख़ातिब करते हुए कहा कि देखो ये शख़्स (इमामे हुसैन अ.स.) अहले आसमान के नज़दीक तमाम अहले ज़मीन से ज़्यादा महबूब है।

एक मर्तबा इमामे हुसैन (अ.स.) घोड़े पर सवार हो रहे थे, सहाबिये रसूल "हजरत इब्ने अब्बास ने देखा ओर दौड़ कर रकाब थाम ली और हुसैन (अ.स.) को सवार किया। किसी ने कहा कि "इब्ने अब्बास "तुम तो इमाम हुसैन (अ.स.) से उम्र और रिश्ते दोनों में बड़े हो। फिर तुमने ऐसा क्यों किया? इब्ने अब्बास ने गैज़ व गज़ब में फ़रमाया कि कमबख़्त तुझे क्या मालूम कि ये कौन है और इनका शरफ़ क्या है? ये 'ये फरज़न्दे रसूल हैं। इन्हीं के सदके में मैं नेमतों से बहरावर हूँ। अगर मैंने इनकी रकाब थाम ली तो क्या हुआ? (📚नासिरखुन्तबारी 29 जिल्द 6 पेज 45)

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