इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम की सख़ावत
इमाम हुसैन (अ.स.) की सख़ावत :-
इमामे हुसैन (अ.स.) अपने पिदरे बुर्जुगवार मौला अली (अ.) और अपने बड़े भाई इमामे हसन (अ.स.) की तरह से ही सखी थे। आप अपनी पुश्त पर अनाज और दीगर चीज़ों को लाद कर रात में गरीबों के घर पहुँचाते थे। आपकी शहादत के बाद आपकी पुश्ते मुबारक पर गटठरों के ढ़ोने के घट्टे पड़े हुए देखे गये थे। एक बार रसूले इस्लाम के सहाबा "उसामा बिन ज़ियाद" बीमार पड़ गये और इमामे हुसैन (अ.) उनकी अयादत के लिये तशरीफ़ ले गये। आपने देखा कि उसामा बहुत रंजीदा है। इमाम हुसैन (अ.) ने वजह मालूम की। उसामा ने अर्ज की मौला सात हज़ार दिरहम का कर्ज़दार हूं । आपने फ़रमाया घबराओ नहीं मैं क़र्ज़ अदा कर दूँगा और इमाम ने उसामा पर जो क़र्ज़ था वह अदा भी कर दिया। इसी तरह एक बार एक देहाती मदीने में आया और उसने लोगों से पूछा कि यहाँ सबसे ज़्यादा सखी कौन हैं? लोगों ने "इमामे हुसैन" का नाम बताया। वह इमामे हुसैन (अ.स.) की ख़िदमत में हाज़िर हुआ। मौला ने उसको चार हज़ार अशरफियां इनायत कर दी।
इन्सानियत व सख़ावत का सबसे बड़ा वाकेआ और मुज़ाहिरा तो वह है जब कर्बला के रास्ते में दुश्मन का लश्कर आपका रास्ता रोकने आया था जो शदीद प्यासा था लोगों और उनके घोड़ों की ज़बानें बाहर आ गयीं थीं। तो मौला ने अपने हरम और बच्चों की प्यास की फ़िक्र न करके ज़ख़ीरा किया सारा पानी "हुर" के लश्कर और उसके घोड़ों को पिला दिया। ये जानते हुए कि दुश्मन की फौज उनका रास्ता रोकने और उन्हें गिरफ़्तार करने के लिये आई है।
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