ईद के रोज़ जन्नत से कपड़े आना

ईद के रोज़ जन्नत से कपड़े आना :- 

एक बार ईद के मौके पर हसनैन (अ.स.) ने माँ से कहा मादरे गिरामी कल ईद है। मदीने के तमाम बच्चे नये कपड़े पहनेंगे और हम लोगों के पास लिबास नहीं है। हम ईद कैसे मनायेंगे? माँ फातिमा जहरा (स.अ.) ने कहा कि बच्चों तुम्हारे कपड़े दर्ज़ी के यहाँ गये हैं वह सिल कर लायेगा। अभी सुबह नहीं हुई थी कि किसी ने दरवाज़ा खटखटाया। घर की कनीज़ फिज़्ज़ा दरवाज़े पर गई। आने वाले ने कहा मैं हसनैन का दर्ज़ी हूँ। कपड़े लेकर आया हूँ। जनाबे फ़िज़्ज़ा ने कपड़ो को जनाबे सय्यदा (स.अ.) की ख़िदमत में पेश किया। वह कपड़े मये अम्मामों के थे। जनाबे फ़ातिमा (स.अ.) समझ गई कि कपड़े ख़ुदा ने भिजवाये हैं। और लाने वाला कोई और नहीं "रिज़वाने जन्नत" है और ये हसनैन (अ.स.) की फ़ज़ीलत है कि वह कपड़े सफेद थे मगर बच्चों ने कहा कि हमें रंगीन कपड़े चाहिये। रसूले इस्लाम तशरीफ़ लाये और बच्चों से पूछा कि तुम्हें कौन सा रंग पंसद है। इमामे हसन (अ.स.) ने सब्ज़ (हरा) और इमामे हुसैन (अ.) ने सुर्ख (लाल) रंग पंसद किया। जिबरईल आफताबा लिये हुए नाजिल हुआ और कपड़ों पर पानी डाला और कपड़े हस्बे ख्वाहिश सुर्ख और सब्ज़ हो गये। सब्ज़ जोड़ा इमामे हसन (अ.स.) और सुर्ख इमामे हुसैन (अ.) ने ज़ेबे तन किया रसूले अकरम ने बच्चों को अपनी पुश्ते मुबारक पर सवार किया और मेहार की जगह अपनी ज़ुल्फें दोनों बच्चों के हाथों में दीं और फ़रमाया मेरे बच्चों अब रिसालत की बाग‌डोर तुम्हारे हाथों में है। जिधर चाहो मोड़ दो। बच्चों की फरमाइश पर रसूले इस्लाम (स.अ.) नाका बने और दहने मुबारक से नाके की आवाज़ भी निकाली।

इस वाक्ये से इमामे हसन (अ.स.) और इमामे हुसैन (अ.स.) की अज़मत का पेशे ख़ुदा और रसूल अन्दाज़ा होता है।

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