27 रजब उल मुरज्जब बेसते रसूले अकरम सअवव

🌹बेअसत और नुजुले कुरान की इब्तेदा

हज़रत रसूले खुदा स० ने बेअसत से दो साल कबल (अड़तीस साल की उम्र में) कोहे हिरा के एक गार को जिसकी लम्बाई चार हाथ और चौड़ाई डेढ़ हाथ थी अपनी इबादत गुज़ारी के लिये मुनतख़ब फ़रमा लिया था और उसी गार में बैठ कर आप इबादत व रियाजत के साथ साथ कमाले मारफ़त के आईने में जमाल व जलाले इलाही का मुशाहिदा फ़रमाते और खान-ए-काबा को देख कर दिली सुकून व क़लबी इत्मिनान महसूस करते। कभी कभी खाने की अशया और पीने का पानी भी अपने हमराह ले जाते और चार चार छः छः दिन क्याम फ़रमाते नीज़ रमज़ानुल मुबारक का पूरा महीना वहीं गुज़ारते थे।

मुवरेखीन का ब्यान है कि जब आपकी उम्र चालीस साल एक यौम की हुई तो एक दिन आप इसी आलमे तन्हाई में मसरूफे इबादत थे कि कानों में आवाज़ आई "या मुहम्मद स०" आपने इधर उधर देखा मगर कोई दिखायी न दिया। फिर आवाज़ आयी और फिर आपने देखा तो आपकी नज़र एक नूरानी मख़लूक पर पड़ी। वह हज़रत जिबरील अ० थे. उन्होंने कहा या मुहम्मद स० ! पढ़ो "एकरा" आपने फ़रमाया "मा एक़रा" क्या पढ़ो? जिबरील ने कहा, "एक़रा बइसमे रब्बेकल लज़ी ख़ल्का। फिर आपने सब कुछ पढ़ दिया क्योंकि इल्में कुरान आपको पहले ही से था।

जिबरील अ० की तहरीके एक़रा का मक़सद सिर्फ यह था कि नुज़ूले कुरान की इब्तेदा हो जाये। इसके बाद आपने जिबरील के साथ वुज़ू किया और ज़ोहर की नमाज़ अदा करके अपने घर तशरीफ़ लाये। हजरत ख़दीजतुल कुबरा सअ और हजरत अली अ० से सारा वाकिया ब्यान किया, दोनों ने इज़हारे ईमान किया और नमाज़े असर बाजमात पढ़ी गयी। यह इस्लाम की पहली नमाज़ थी जिसमें बानिये इस्लाम इमाम और ख़दीजा व अली अ० मामूम थे। यह वाकिया 27 रजबुल मुरज्जब सन्42 आलमुल फील मुताबिक 610 ईस्वी का है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम की मुख़्तसर सवाने हयात

हज़रते अब्बास अलैहिस्सलाम के मानी ?

इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम की वसीयत इमामे सज्जाद अलैहिस्सलाम के नाम ?