मेराज हज़रते रसूले अकरम सअवव

🪐मेराजुन नबी स०

अल्लामा जीशान हैदर जव्वादी रक़म तराज़ हैं:-

"27 रजब की शब आलमे इस्लाम में वह अज़ीम रात है जिसे "शबे मेराज" कहा जात है। मेराज की दास्तान कुरान मजीद में दो मुकाम पर तफ़सील के साथ ब्यान हुई है। एक मर्तबा सूरये असरा में और दूसरी मर्तबा सूरये वननज्म में। बाज़ ओलमाये कराम ने उन्हें खुसूसियात के पेश नज़र यह रास्ता इख़तियार किया है कि सरकारे दो आलम स० को कम अज़ कम दो मर्तबा मेराज हुई है।

एक का हाल सुरये असरा में ब्यान हुआ है जिसका ज़ाहिर सफ़र मस्जिदे अक्सा पर तमाम हो गया था और दूसरी का तज़किरा सूरये वननज्म में है जहाँ सिदरतुल मुनतहा और काबा कौसैन तक तज़किरा है। इस सिलसिले में यह एहतेमाल भी पाया जाता है कि यह दो सफ़र हों ओर यह एहतेमाल भी है कि एक ही सफर दो मरहलों में हों। एक मरहला मस्जिदे अक्सा पर तमाम हुआ और दूसरा मरहला मस्जिदे अक्सा से शुरू हुआ हो और अरशे आज़म पर तमाम हुआ हो। बहर हाल सूरते वाकिया कुछ भी हो। न सरकार स० की मेराज में कोई शक हो सकता है और न रवायात के पेशे नज़र तअदु मवाज में कोई शक किया जा सकता है।"

तारीखे अबुलफिदा में है कि जनाबे अबुतालिब की वफात से क्बल मेराज हुई जबकि इब्ने जौज़ी का ख्याल है कि हज़रत अबुतालिब की वफात के बाद नबूवत के बारहवें साल मेराज हुई। तफ़सीर सेयवती में अमरू बिन शुऐब से मरवी है कि हिजरत से एक साल पहले 17 रबीअव्वल की शब में आन हज़रत स० मर्तबे मेराज पर फायज़ हुए। मुल्ला अली कारी शरहफिकए अकबर में फ़रमाते हैं कि वाकिया मेराज जसदी यानि रसूले मकबूल का बहालत बेदारी समावत व मुकामाते आलिया की सैर फ़रमाना हक़ है और उसकी हदीसें तारीख़े मुत्ताइदा से साबित है बस जो शख़्स कि मेराजे जिस्मानी की तरदीद कर ले और उसकी सेहत पर ईमान न लाये वह ग़ुमराह ओर बिदअती है। इब्ने इसहाक और इब्ने जरीर ने आयशा से रवायत की है कि शबे मेराज रसूल स० का जसदे अकदस अपनी जगह पर बरकार रहा और अल्लाह ताला ने आपकी रूहे अतहर को आसमानों की सैर करायी।

मुनदर्जा बाला तहरीरों से यह बात वाज़ेह और आशकार हो जाती है कि मेराजे पैग़म्बर स० के सिलसिले में ओलमा, मोअरिंखीन और मुहद्देसीन ने क़दम क़दम पर इख़तेलाफ किया है मेराज की इब्तेदा कहाँ से हुई कब हुई? किस शक्ल में हुई? जिस्मानी हुई या रूहानी? वह कौन सी तारीख़ और कौन सा साल था? चौदह सौ बरस के अरसे में ओलमा तय न कर सके। इस जै़ल में जानबीन के ओलमा की तरफ़ से खूब खूब खामा फरसाइयां और मार्का आराईंयां हीं हैं और मोहकिक तूसी. इमाम गजाली इमास राजी और मुल्ला अब्दुल रज्जाक लाहिची वगैरा ने बड़ी बड़ी बहस की हैं और हर तरीके से हुज़ूरे अकरम स० की मेराजे जिस्मानी और उसकी मामूलियत के तमाम असबाब व मुशाहेवात को ऐन इमकानी क़रार दिया है और यही दुरूस्त भी है क्योंकि आंहज़रत की खिलकते नूरी थी और नूर की रफ़्तार का अंदाज़ा इससे हो सकता है कि इन्सानी आँख का नूर एक सकेण्ड से भी कम कफ्फे में चाँद और सितारों का जायजा ले लेता है तो जो नूरे मुजस्सम हो उसका आसमान पर जाना, वहाँ की सैर करना और इस वकयों में पलट आना कि ज़ंजीरे दर हिलती रहे. ताज्जुब खेज़ हरगिज़ नहीं हो सकता।

शिया ओलमा ने मेराज की जो हक़ीक़त ब्यान की है वह यह है कि 27 रजब सन 216 बेस्त की रात को ख़ल्लाके आलम ने अपने हबीब हजरत मुहम्मद मुस्तफा स० को जिब्ररील और बुर्राक के ज़रिये काबा कौसैन की मंजिल पर तलब फ़रमाया ओर वहाँ हजरत अली इन्ने अबुतालिब अ० की खिलाफत व इमामत से मुतालिक हिदायतें दीं। इसी मुबारक और इरतेकायी सफ़र को मेराज के नाम से याद किया जाता है। यह सफर उम्मे हानी बिन्ते जनाबे अब्दुल मुत्तलिब के घर से शुरू हुआ था। आप पहले बैतुल मुकद्दस गये और वहाँ से आसमान पर रवाना हुए। तमाम आसमानी मनाज़िल को तय करते हुए जब आप सिरनतुन मुतहा तक पहुँचे तो जिबरील ने कहा या रसूल अल्लाह अगर इसके आगे मैं एक कदम बढ़ा तो जल जाऊँगा। चुनानवे वहाँ आप ने जिबरील को छोड़ा और रफ़ रफ़ पर बैठकर आगे बढ़े।

रफ़ रफ़ नूरी तख़्त था जो नूर के दरिया में रवां दवां था। यहाँ तक कि आप इस मंज़िले मकसूद तक पहुँच गये जहाँ से आप और हिजाबात व अनवारे इलाही के दरमियान सिर्फ दो कमानों का फासला रह गया, वहाँ परवर दिगार ने आपसे अली अ० के लहजे में बातें कीं और आप वापस आये। आपकी वापसी के बाद उम्मते इस्लामिया पर पाँच वक़्त की नमाज़ वाजिब की गयी।

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