ख़ाके शिफ़ा की फ़ज़ीलत
🔰ख़ाके शिफ़ा की फ़ज़ीलत
"इमाम सादिक (अ.स.)
अपने बच्चों को खाक-ए-शिफ़ा की घुट्टी दो के वो बलाओं से महफ़ूज़ रहेंगे।
📝तहजीब उल इस्लाम,स 263"
"इमाम काज़िम (अ.स.)
जब मय्यत को दफ़्न करें तो उसके मुंह के पास कर्बला की मिट्टी की एक सजदा-गाह रख दें।
📝तहज़ीब उल इस्लाम,स266"
"रिवायत"
अगर इस पाक मिट्टी (खाक ए शिफ़ा) को माल ए तिजारत में रख दिया जाए, तो वो माल तिजारत में बरकत का बाइस बनेगा।
📝इरफान ए मज़लूम, स22"
"रिवायत"
अपनी औलाद (नए जन्मे बच्चे) को आब-ए-फ़ुरात और खाक-ए-शिफ़ा की घुट्टी दो। और अगर यह न मिल सके तो बारिश के पानी की दो।
📝वसाइल उश शिया,ज15,स130"
"इमाम काज़िम (अ.स.)
मोमिन के पास 5 चीज़ें रहनी चाहिए: मिस्वाक (टूथब्रश), कंघी (कंघी), जा-नमाज़, खाक ए शिफ़ा की 34 दाने की तस्बीह और अक़ीक़ की अंगूठी।
📝तहज़ीब उल इस्लाम, स266"
"इमाम सादिक़ (अ.स.)
बच्चे (नवजात शिशु) को खाक ए क़ब्र ए इमाम हुसैन (अ.स.) (खाक ए शिफ़ा) की घुट्टी दो के उसको बहुत से दर्दों से, बलाओं से, बीमारियों से महफ़ूज़ रखेगी।
📝तहज़ीब उल इस्लाम,स124"
"इमाम सादिक़ (अ.स.)
अपने बच्चों के मुंह के तलवे (तालू) में क़ब्र ए हुसैन (अ.स.) की मिट्टी (खाक ए शिफ़ा) मलो क्यों कि ये उनके हिफ़्ज़ ओ अमान (सुरक्षा) का बाइस है।
📝कामिल उज़ ज़ियारत,स374"
"रिवायत
बेहतर ये है कि तस्बीहात ए ह. ज़हरा (स.अ.) ऐसी तस्बीह से पढ़ी जाए जो इमाम हुसैन (अ.स.) की क़ब्र की मिट्टी से बनी हो क्यों कि पढ़ने वाले से ज़्यादा वो तस्बीह ही तस्बीह करती है.
📝मआरेफ़त ए ज़हरा (स.अ.), ज69"
"इमाम सादिक़ (अ.स.)
इमाम हुसैन (अ.स.) की क़ब्र की मिट्टी पर सजदा करना (यानी ख़ाक ए शिफ़ा पर सजदा करना) खुदा और बंदे के दरमियान 7 परदों को हटा देता है और दुआओं को क़ुबूलियत की मंज़िल तक पहुँचा देता है।
📝मीज़ान उल हिकमा (इंतेखाब ओ तख़लीस),ज3,स94"
"इमाम महदी (अतफ़श)
तुर्बत ए सय्यदुश शोहदा (अ.स.) की फ़ज़ीलत यह है कि खाक ए शिफ़ा की तस्बीह हाथ में लेकर घूमा जाए, तो उसका सवाब तस्बीह ओ ज़िक्र का सवाब होता है, अगर कोई ज़िक्र ओ दुआ भी न पढ़ी जाए।
📝शरह चहल हदीस इमाम महदी (अ.त.फ.स.),स19"
"इमाम सादिक़ (अ.स.)
जो शख़्स खाक ए शिफ़ा की तस्बीह हाथ में रखें तो उसे एक अस्तगफ़ार पढ़ने से 70 अस्तगफ़ार पढ़ने का सवाब लिखा जाएगा और अगर खाली तस्बीह फिराता रहे तो भी हर दाना 7 अस्तगफ़ार का सवाब होगा।
📝तहजीब उल इस्लाम, स266"
"इमाम सादिक़ (अ.स.)
जब क़ब्र ए हुसैन (अ.स.) की मिट्टी (खाक ए शिफ़ा) को खाए तो ये पढ़े ""अल्लाहुम्मा इन्नी असालुका बे हक़्किल मलकिल लज़ी तनावाल्लाहु, वर रसूलल्लाहि बव्वा अहू, वल वसीयिल्लज़ी ज़़
ज़ुम्मिना फ़ीही अन तज'अलाहु शिफ़ा'अन मिन कुल्ली दाईं"" और आख़िर में अपनी बीमारी का नाम ले.
📝कामिल उज़ ज़ियारत,स376"
"रिवायत
इमाम सादिक़ (अ.स.) ने कभी भी सैयदुस शोहदा (इमाम हुसैन [अ.स.]) की तुरबत (खाक ए शिफ़ा) के अलावा किसी चीज़ पर सजदा नहीं किया और आपने इस ज़ेल में फ़रमाया के, ""इंसान को तुरबत ए इमाम हुसैन (अ.स.) ऐसी नूरानियत अता करती है जो तमाम तारीक (अँधेरे) पुरदों को दूर कर देती है"".
📝असरार ए नमाज़,स170"
"इमाम बाक़िर (अ.स.)
अल्लाह तआला ने इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत के मक़सद से उन्हें ये एज़ाज़ अता फ़रमाया के इमामत उनकी ज़ुर्रियत में रखी और उनकी तुर्बत को खाक ए शिफ़ा का दरज़ा दिया और उनकी क़ब्र के पास दुआओं की क़ुबुलियत मुक़र्रर की। ज़ायर ए हुसैन (अ.स.) की आमद ओ शेल्फ़ के अय्याम (आने जाने के दिन) उसकी उम्र में से शुमार नहीं किए जाते।
📝क़ुर्बान उश शहादा,स34"
"इमाम महदी (अतफ़श) ने सवाल किया कि "क्या खाक-ए-शिफ़ा की तस्बीह बनाई जाए और क्या इसमें कोई फ़ज़ीलत है?" इमाम-ए-असर (अतफ़श) ने जवाब दिया, "ऐसा ही करो क्यों कि इससे बेहतर और बरतर कोई तस्बीह नहीं है। इसकी फ़ज़ीलत में यही काफी है कि कोई तस्बीह पढ़ना भूल जाए और तस्बीह को हरकत देता रहे तो भी उसके लिए सवाब-ए-तस्बीह लिखा जाएगा।"
📝एहतेजाज-ए-तबरीसी, ज2, स346
"रिवायत
एक ज़िना-कार औरत अपने पैदा होने वाले बच्चों को जला देती थी। उस औरत की मौत के बाद उसे जितनी बार भी दफ़न किया गया, क़ब्र ने उसे बाहर फेंक दिया। किसी ने यह माजरा इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) से बयान किया। उनकी हिदायत पर उसकी क़ब्र में तुर्बत (ए इमाम हुसैन [अ.स.]) की मामूली मिक़दार (थोड़ी मात्रा) साथ रख दी गई। उसके बाद फिर क़ब्र ने उसे बाहर नहीं फेंका।
📝इरफ़ान ए मज़लूम,स23"
"रिवायत
इमाम सज्जाद (अ.स.) के पास एक कपड़े में बंधी हुई थोड़ी सी खाक-ए-शिफ़ा रहती थी। इमाम (अ.स.) के हम-रह खाक-ए-शिफ़ा का हमेशा रहना 3 हाल से खाली न था: 1) या उसे तबर्रुकन रखते थे, 2) या उसपर नमाज़ में सजदा करते थे, 3) या उसे ब-हैसियत मुहाफ़िज़ रखते थे और लोगों को यह बताना मक़सूद रहता था कि जिसके पास खाक-ए-शिफ़ा हो वो जुमला मसाएब ओ आलम से महफ़ूज़ रहता है और उसका माल चोरी नहीं होता
📝14 सितारे, स287"
"इमाम महदी (अतफ़श) से मुहम्मद बिन अब्दुल्ला हुमैरी ने सवाल किया, "क्या इमाम हुसैन (अ.स.) की क़ब्र की मिट्टी से तस्बीह बनाई जाती है?" इमाम ए ज़माना (अ.त.स.) ने सवाल के जवाब के आगाज़ में फ़रमाया, "तुर्बत ए क़ब्र ए हुसैन (अ.स.) (यानी ख़ाक ए शिफ़ा) की तस्बीह बना सकते हो जिससे खुदा वंदे आलम की तस्बीह करो, क्यों कि तुर्बत ए इमाम हुसैन (अ.स.) से बेहतर कोई चीज़ नहीं है। इसके फ़ज़ाइल में से एक ये है कि अगर कोई ज़िक्र भी न कहे और फ़क़त तस्बीह को घुमाता रहे, तो भी उसके लिए तस्बीह का सवाब लिखा जाता है"".
📝(एहतेजाज, ज2, स312, बिहार उल अनवार, ज53, स165)
शरह चहल हदीस इमाम महदी (अतफ़श), स19"
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