ज़ियारते इमामे अली रज़ा अलैहिस्सलाम की फ़ज़ीलतें

💠 ज़ियारते इमामे अली रज़ा अलैहिस्सलाम की फ़ज़ीलत

🔹इमाम तकी (अ.स.)
जो शख़्स मेरे वालिद-ए-माजिद (इमाम रज़ा (अ.स.)) की ज़ियारत करेगा उसके लिए जन्नत है।
वसाइल उश शिया, ज10, स304

इमाम सादिक़ (अ.स.)
हमारी मौत के बाद हमारी ज़ियारत करने वाला, हमारी ज़िंदगी में हमारी ज़ियारत करने वाले इंसान के मानिंद है।
आदाब ए इस्लामी, ज2, स277

इमाम काज़िम (अ.स.) ने इमाम अली रज़ा (अ.स.) की तरफ़ इशारा करके फ़रमाया, "जो शख़्स मेरे इस बेटे की ज़ियारत करेगा उसके लिए जन्नत है"।
कामिल उज़ ज़ियारत, स410

इमाम रज़ा (अ.स.)
जो हमारी ज़ियारत को नहीं आ सकते, वो हमारे नेक और सालेह शिया की मुलाक़ात करे। उन्हें हमारी ज़ियारत करने का सवाब मिलेगा…
ग्रेटर सिंसI, 7 ग्रेटर सिंस

इमाम सादिक़ (अ.स.)
जो हमारी वफ़ात के बाद हमारी क़ब्रों की ज़ियारत करता है, वो हमारी ज़िंदगी में ही हमारी ज़ियारत कर रहा होता है।
मीज़ान उल हिकमा (इंतेखाब ओ तख़लीस), ज3,स71

इमाम रज़ा (अ.स.)
जो शख़्स भी मेरी ज़ियारत करेगा और उसे बारिश, सर्दी या गर्मी की कुछ तकलीफ़ पहुंचाएगी तो ख़ुदा उसके जिस्म को दोज़ख पर हराम क़रार दे देगा।
वसाइल उश शिया, ज10,स306

इमाम तक़ी (अ.स.)
जो कोई मेरे वालिद (इमाम रज़ा (अ.स.)) की (तुर्बत की) ज़ियारत करने जाए और इस सिलसिले में गर्मी और सर्दी की तकलीफ़ उठाएँ तो अल्लाह उसपर दोज़ख की आग हराम कर देगा।
अमाली - शेख सदूक,स608

इमाम सादिक़ (अ.स.)
जो कोई भी इमाम रज़ा (अ.स.) के मक़ाम (अज़मत) को पहचानते हुए उसकी ज़ियारत करेगा तो ख़ुदा उसको फ़तेह मक्का की राह में माल खर्च करने और जिहाद करने के बराबर अज्र देगा।
अमाली - शेख सदूक, स120

इमाम नक़ी (अ.स.)
.जो शख़्स भी मेरे जद्द अली बिन मूसा अर रज़ा (अ.स.) की ज़ियारत करे और रास्ते में आसमान (बारिश) का एक क़तरा भी उसके जिस्म पर पड़ जाए तो (अल्लाह) उसके जिस्म को आतिश ए जहन्नुम पर हराम क़रार देगा।
वसाईल उश शिया,ज10,स305

इमाम सादिक़ (अ.स.)
से सवाल हुआ के, "आप (अइम्मा ए अहलेबैत [अ.स.]) में से किसी एक की ज़ियारत करें, उसके लिए क्या (अज्र ओ सवाब) है?" इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया, "वो उस शख़्स की मानिंद है जो रसूले खुदा (स.व.) की ज़ियारत करे"।
वसाइल उश शिया, ज10, स312

इमाम रज़ा (अ.स.)
हमारी क़ब्रों की तरफ़ सफ़र करना चाहिए। आगा हो जाओ, मैं ज़हर से शहीद किया जाऊँगा। मैं आलमे मुसाफ़िरत में दफ़न किया जाऊँगा। जो शख़्स मेरी ज़ियारत को आएगा, उसकी दुआ कुबूल होगी और उसके गुनाह माफ़ हो जाएँगे।
ख़िसाल,स87

रिवायत 
इमाम रज़ा (अ.स.) ने हमसे कहा, "हमारी औलाद का दीदार इबादत है"। रावी ने पूछा, "आपकी नस्ल से इमाम (अ.स.) या आपकी ज़ियारत इबादत है?" इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया, "मेरी तमाम औलाद से मोहब्बत करना इबादत है, जब वो गुनाहों से आलूदा न हों"।
मफ़ातिह अल हयात,स260

इमाम रज़ा (अ.स.)
जो आलम-ए-ग़ुरबत ओ मुसाफ़िरत में मेरी क़ब्र की ज़ियारत करेगा तो मैं क़यामत के 3 मुक़ाम पर उसके पास जाऊँगा और उसे वहां के हौलनाकियों से नजात दिलाऊँगा: 1) जब लोगों की दाएं बाएँ हाथ में नाम-ए-आम दिए जा रहे होंगे, 2) सीरात पर, 3) मीज़ान पर।
उयून अख़बार अर रज़ा,ज2,स550

इमाम सादिक़ (अ.स.)
जो शख़्स हमारी (मुहम्मद [स.व.] और आल-ए-मुहम्मद [अ.स.]) क़ब्रों की ज़ियारत नहीं कर सकता, उसको चाहिए कि वो हमारे नेक भाइयों (बा-अमल मोमिनीन) की क़ब्र की ज़ियारत करे। हमारे (ज़िंदा) सालेह (नेक) दोस्तों से मुलाक़ात करे। इस लिए के इसमें हमारी ज़ियारत का सवाब होगा।
मीज़ान उल हिकमा (इंतेखाब ओ तख़लीस),ज3,स73

इमाम तक़ी (अ.स.)
जो शख़्स तूस में मेरे वालिद-ए-माजिद (इमाम रज़ा (अ.स.)) की ज़ियारत करे तो ख़ुदा उसके अगले पिछले गुनाह माफ़ कर देगा और (बा रोज़-ए-क़यामत) ह. रसूले ख़ुदा (स.अ.व.) और अली मुर्तुज़ा (अ.स.) के मिम्बरों के बिल मुक़ाबले में उसके लिए एक मिम्बर बनाएगा यहाँ तक कि ख़ुदा लोगों के हिसाब और किताब से फारिग होगा।
वसाईल उश शिया,ज10,स303

इमाम रज़ा (अ.स.)
हर इमाम का शियों की गर्दन पर एक अहद (वादा/वादा) होता है जो उस वक़्त पूरा होता है जब शिया इमामों की ज़ियारत करता है इस लिए कि जो हमारी मोहब्बत के शौक़ में हमारी क़ब्रों की ज़ियारत करे और हमारी इमामत की दिल से तस्दीक़ करता हो तो हम क़यामत के दिन उसकी शफ़ाअत करेंगे (क्यों कि उसका अहद किया गया है)।
मीज़ान उल हिकमा (इंतेखाब ओ तख़लीस), ज3,स71

इमाम रज़ा (अ.स.)
मेरे शियों को ये पैग़ाम पहुँचा दो कि जो कोई मेरी ज़ियारत करेगा तो ख़ुदा के क़रीब 1000 हज के बराबर है। आप के फरज़ंद अबू जफ़र (अ.स.) ने कहा, "1000 हज के बराबर?" आपने फरमाया, "हाँ। ख़ुदा की कसम, 100 हज़ार (यानी एक लाख) हज उसके लिए है जो हमारी मारेफ़ते हक़ के साथ ज़ियारत करे"। (किताब कामिल उज़ ज़ियारत, पेज 410 में हज़ार हज़ार (यानी दस लाख) हज का सवाब लिखा है)
अमाली - शेख सदूक, स120

इमाम सादिक़ (अ.स.)
मेरे फरज़ंद मूसा बिन जाफ़र (अ.स.) की औलाद में से एक फ़र्द जिसका नाम ह. अमीरुल मोमेनीन अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) के नाम पर होगा, वो यहाँ से निकलकर तूस यानी खुरासान जाएगा जहाँ वो ज़हर से शहीद होगा और वही आलम ए मुसाफ़रात में दफ़न होगा. जो शख़्स उसके हक़ को पहचानते हुए उसकी क़ब्र की ज़ियारत को जाएगा, अल्लाह तआला उस शख़्स को क़बल ए फ़तेह मक्का राह ए खुदा में माल खर्च करने वाले और जिहाद करने वाले के बराबर अज्र देगा।
बिहार उल अनवार,ज5,स292

रिवायत
इमाम रज़ा (अ.स.) के असहाब में से एक बुज़ुर्ग हालात-ए-जाकनी की में थे के हज़रत उनके सराहने तशरीफ़ ले गए। वो सहाबी सकरात की हालत में आँख बंद किए हुए थे। एक मर्तबा अर्ज़ किया के, "इस वक़्त ज, रसूले खुदा (स.अ.व.), ज. अमीरुल मोमिनीन (अ.स.), ज. सिद्दीक़ा ताहिरा फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.),इमाम. हसन (अ.स.), इमाम हुसैन (अ.स.) और इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) तक तमाम आइम्मा ए ताहेरीन (अ.स.) यहाँ तशरीफ़ फ़रमाते हैं और मैं उन हज़रत की ज़ियारत से मुशर्रफ़ हो रहा हूँ"। फिर अर्ज़ किया, "अक़ा, आपकी नूरानी सूरत भी मौजूद है"।
मा'द, स38

रिवायत 
(इमाम (अ.स.) के नाम का एहतेराम) रावी का बयान है कि सालेहीन में से एक शख़्स ने ज. रसूले ख़ुदा (स.अ.व.) को ख़्वाब में देखा और अर्ज़ किया, "या रसूलल्लाह (स.अ.व.)! मैं आपकी औलाद में से किस की ज़ियारत करूँ?" आप (स.अ.व.) ने फ़रमाया, "मेरी औलाद में से उन लोगों की क़ब्र की ज़ियारत करो जो ज़हर से शहीद होकर मेरे पास आए हैं और मेरी औलाद में से उनकी क़ब्र की ज़ियारत करो जो क़त्ल होकर मेरे पास आए हैं"। उस मर्दे सालेह न कहा, या रसूल अल्लाह! मगर उनकी क़ब्र तो मुख़्तलिक मक़ामात पर हैं। उनमें से किस क़ब्र की ज़ियारत करूँ?" आप ने फ़रमाया, "उसकी क़ब्र की ज़ियारत करो जो तुमसे क़रीब वाकये हो और आलम ए गुरबत में मदफ़ून हो" उस मर्दे सालेह ने कहा, या रसूल अल्लाह! आप की मुराद हज़रते रज़ा अलैहिस्सलाम से है? आप ने फ़रमाया "(अरे ख़ाली नाम ले लिया)  उनके नाम के साथ 'सल्लल्लाह अलैहि व आलेही' कहो,  ये आपने 3 मर्तबा फ़रमाया। 
(उयून अख़बार अर रज़ा, ज2, स281) बिहार उल अनवार, ज5, स325

तारीख़ 
(इमाम रेज़ा की क़ब्र पर दुआ फ़ौरान क़ुबूल हुई) 
बल्ख़ का एक शेख मशहद ए मुकद्दस इमाम रेज़ा (अ.स.) की ज़ियारत को आया और उसके साथ उसका गुलाम भी था। दोनों ने इमाम रेज़ा (अ.स.) की ज़ियारत पढ़ी। फिर मालिक क़ब्र के सर की तरफ़ खड़े होकर नमाज़ पढ़ने लगा और गुलाम पाओन की तरफ़ मशगूल ए नमाज़ हुआ। जब दोनों नमाज़ से फ़ारिग़ हुए तो देर तक सजदे में रहे। गुलाम से पहले मालिक ने सर उठाया और गुलाम को आवाज़ दी तो गुलाम ने फौरन सजदे से सर उठाया और कहा, "लब्बैक या मौला. सरकार हाज़िर". मालिक ने हमें टोका, "आज़ादी चाहते हो?" गुलाम ने कहा, "जी हाँ". मालिक ने कहा, "अच्छा जाओ। तुम राह-ए-खु़दा में आज़ाद हो और मेरी फुलां कनीज़ जो बल्ख़ में है, उसको भी मैंने आज़ाद किया और उसका निकाह तुमसे इतने मेहर पर किया और तुम्हारी तरफ़ से मेहर की अदायगी मैं करूँगा। और मेरी फुलां जायदाद हैं, उसे मैंने तुम्हारी औलाद के लिए, बलके औलाद दर औलाद के लिए वक्फ़ कर दिया और इस पर मैं इस इमाम (अ.स.) को गवाह बनाता हूँ"। ये सुन्न-कर गुलाम मारे खुशी के ज़ार ओ क़तर रोने लगा और अल्लाह की और इमाम रज़ा (अ.स.) की क़सम खा कर कहने लगा, "अभी अभी मैंने सजदे में यही दुआ की थी और इतनी जल्दी अल्लाह ने मेरी ये दुआ कुबूल कर ली।"
बिहार उल अनवार,ज5, स327




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