कर्बला का जुगराफियाई (भोगौलिक) पस मंज़र

♦️कर्बला का जुगराफियाई (भोगौलिक) पस मंज़र

जो सर ज़मीन कर्बला के नाम से मौसूम (नामित) है वह दरअसल इन कारीयों और ज़मीनी दुकड़ों का मजमुआ (समूह) है जो इस ज़माने में एक दूसरे से मुलहिक (जुड़े) थे। अरब में छोटे छोटे अरज़ी कत्आत मुख़्तलिफ नामों से मौसूम हुआ करते थे। चुंनाचे जब इन्हें इनकी खुसूसियत के एतबार से देखा जाता तो वह कई मुकाम मुतसव्वर (समझे) होते और जब इनकी बाहमी कुर्ब पर नज़र की जाती तो वह सब एक करार पाते और यही वजह है कि एक मुकाम का वाक़्या दूसरे मुकाम से मन्सूब किया जा सकता था। जैसा अल्लामा सैय्यद हेब्लुद्दीन शहर सतानी ने "नहज़तुल हुसैन” में तहरीर किया है।

“कर्बला के महल वकू के तहत जो बहुत से नाम मशहूर हैं मसलन नैनवा, गाज़िरया और शते फरात इन्हीं एक ही जगह के मुतअदि नाम नहीं समझना चाहिये बल्कि वह मुतअद्दि जगहें थी जो बाहमी एत्तेसाल की वजह से एक ही समझी जा सकती थीं और इसलिये महल वकू वाक्या के एतबार से हर एक का नाम तआरूफ़ के मौके पर ज़िक्र किया जाना दुरूस्त है।"

🔹नैनवा

यह एक गाँव था, इसके पहलू में गाज़िरयह था जो कर्बला बनी असद की एक शाख़ ग़ाज़रह से निसबत रखता था और इसमें यही लोग आबाद थे। गालबन यह वह ज़मीन है जो अब हुसैनिया के नाम से मौसूफ (नामित) है। इस जगह सफिया नामी एक छोटा सा गाँव था और यहीं पर एक कता उफ़तादह आराज़ी कर्बला के नाम से थी जो अब मौजूदाह शहर कर्बला का मशरिकी व जुनूबी हिस्सा है। इसी से मुत्तसिल अक्रेबाबुल नाम का एक करिया था जो ग़ाज़िरयात के शुमाल व मग़रिब में स्थित था जहां अब ख़न्डरात के आसार पाये जाते हैं। यह करया दरियाए फरात के किनारे आबाद था और टीलों में घिरे होने की वजह से एक कता की हैसियत रखता था । इसी के मुकाबिल ग़ाज़िरयात के दूसरी तरफ "नवावीस” नाम का रैंक मुकाम था जो इस्लामी फतुहात से पहले एक कब्रस्तिान था, इसी के वस्त " हैर " नाम की एक ज़मीन थी जो अब " हायर " के नाम से मारूफ है और इसी ज़मीन पर इमाम हुसैन की कब्रे मुबारक है।

" हैर" एक वसीअ (बड़ी) मैदान की शक्ल में था जो तीन तरफ से पहलू ब पहलू टीलों से घिरा हुआ था। इन टीलों का सिलसिला शुमाल (उत्तर) व मशरिक (पूरब) की जानिब से जिधर हरम हुसैनी का बाबुस्सदर (मुख्य द्वार) और मनारए अब्द है शुरूअ होकर मग़रिब की जानिब बाब ज़ैनबबिया के हदूद तक पहुंचा था और वहां से ख़म होकर दरे किबला के मुकाम पर आकर ख़त्म हो जाता था। इन टीलों के इजतेमा से एक हेलाली (चन्द्र आकार) दायराह की शक्ल बनती थी। इस दायरे में दाखिल होने का रास्ता इस तरफ से था जिधर से हज़रत अब्बास के रौज़े अकदस में जाने का रास्ता है।

तहक़ीक़ाती इन्केशाफ़ से अब तक यह बात पाई गई है कि इन मकानात के आसार जो कब्र इमाम हुसैन (अ.) के गिर्द हैं शुमाली और मग़रिबी सिम्त की ज़मीन की बुलन्दी पर हैं। और नशेब (नीचे) में अलावा नरम मिट्टी के और कुछ नहीं है। इससे मालूम होता है कि इस मुकाम की कदीमी सूरत ऐसी ही थी कि मशरिक की तरफ यह हमवार और शुमाल व मग़रिब की तरफ से चन्द्रमा की शक्ल में बुलन्द व नाहमवार और यही वह दायराह है जहां मज़लूमें कर्बला इमाम हुसैन (अ.) को घेर कर शहीद किया गया था। 

🔹फ़रात
जिसे हम दरियाए फरात कहते हैं इसका बराह-रास्त ताल्लुक करबला की सरज़मीन से नहीं था बल्कि वह हिल्ला और मुसय्यब वगैरह से गुज़र कर कूफे के बैरूनी हिस्से को सेराब करता था लेकिन इसकी एक शाख मुकाम रिज़वानिया के पास से अलग होकर करबला के शिमाली व मशरिकी (उत्तरी पूर्वी) रेगिस्तानों से होती हुई उस मुकाम से गुज़रती थी जहाँ अब अलमदारे हुसैनी हज़रत अबुलफज़्लिल अब्बास अलैहिस्सलाम का रौज़ए मुबारक और अबदी आरामगाह है। यह छोटी सी नहर, नहरे अलकमा से मारूफ (प्रसिद्ध) थी और इसे अपनी असल के ऐतबार से फरात भी कह दिया जाता था।

🔹तफ
तफ के मानी हैं नहर का किनारा, खुसूसी तौर पर दरियाए फरात के उस किनारे को तफ कहा जाता था जो जुनूबी (दक्षिणी) पहलू में बसरह से हैत तक था इसी मुनासेबत से अलकमा के इस किनारे को भी तफ कहा जाने लगा जिसमें करबला स्थित था इसी वजह से कर्बला के वाकेये को वाकेयातुलतफ़ कहा जाता था और कर्बला को शत्तेफ़रात के नाम से भी याद किया जाता था।

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