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कर्बला के 23वें शहीद

कर्बला के 23वें शहीद हज़रते मसूद इब्ने हज्जाज अल तमीमी आप अमीरूल मोमिनीन के ख़ास शियों में से थे और निहायत ही शुजा और बहादुर थे। उमर इब्ने साद के हमराह कूफ़े से करबला पहुँचे और यौमे आशूरा से पहले इब्ने सअद की तरफ से निकल कर हज़रत इमाम हुसैन अ० की ख़िदमत में हाज़िर हो गये और यौमे आशूर अव्वल हमले में शहीद हो कर सआदते अबदी के मालिक बन गये। ओलमा ने लिखा है कि आप के हमराह आप के र्फज़न्द अब्दुर्र-रहमान इब्ने मसऊद भी ह थे जौ साथ ही शहीद हुये।

कर्बला के 22वें शहीद

कर्बला के 22वें शहीद हज़रते जेबिल्ला इने अली अल-शोबानी आप कूफ़े के मशहूर बहादुरों में से थे। हज़रते मुस्लिम इब्ने अकील के कूफ़े पहुँचने के बाद उनके साथ हो गये और निहायत दिलेरी से आपका साथ देते रहे हज़रत मुस्लिम की शहादत के बाद आप इमाम हुसैन की ख़िदमत में हाज़िर हुऐ और यौमे आशूरा हमला-ऐ-अव्वल में शरफे शहादत से मुशर्रफ हो गये।

कर्बला के 21वें शहीद

कर्बला के 21वें शहीद हज़रते ज़हिर इब्ने उमर अल-कन्दी आप जनाब उमर इब्ने अल हमक अमीरुल मोमिनीन के मशहूर सहाबी के हर वक़्त साथ रहा करते थे एक मर्तबा ज़ियाद इब्ने अबी और उमर इब्ने अल हमक में हज़रत अली के बारे में सख़्त इख़्तेलाफ हो गया जिस के नतीजे में उसने आपको माविया के हवाले कर दिया और उसने उन्हे कत्ल कर दिया जब आप माविया के पास पहुँचे थे आपके हमराह ये ज़ाहिर कृन्दी भी थे। माविया ने उन्हे कत्ल नही किया। आप आले मोहम्मद की मोहब्बत में निहायत शोहरत रखते थे। एक ज़बरदस्त पहलवान और पुख़्ताकार बहादुर की हैसियत से मशहूर थे। 60 हिजरी में आप हज के लिये मक्का-ऐ-मोअज़्ज़मा पहुँचे और इमाम हुसैन अ० के हमराह करबला आये आप के पोतो ने मोहम्मद बिन सनान इमाम रज़ा और इमाम मोहम्मद तकी अलै० से हदीस के रावी गुज़रे हैं मोहम्मद इब्ने सन्नान की वफात सन् 220 हिजरी में हुई है। ज़ाहिर कन्दी मक्का से करबला तक इमाम हुसैन अलै० की ख़िदमत करते रहे और सुबहे आशूर हमल-ऐ -अव्वल में शहीद हो गये।

कर्बला के 20वें शहीद

कर्बला के 20वें शहीद हज़रते अम्मारा इब्ने सलामता अल दलानी आप क़बाइले हमदान से कबीला-ऐ-बनी दालान के (इज़्ज़त दार) शख़्स थे। आप का पूरा नाम अम्मार इब्ने सलामः इब्ने अब्दुल्लाह इब्ने इमरान इब्ने रास इब्ने दालान अबुसलामा हमदानी था। आप को हुजूर रसूले करीम के सहाबी होने का शरफ हासिल था। अल्लामा समावी का बयान है कि आप अमीरुल मोमिनीन के असहाब में थे जंगे जमल व सिफ्फीन और नहरवान में हज़रत के साथ रहे बसरा की तरफ जंग के इरादे से रवाना होते वक़्त मंज़िल जी-वकार पर उन्हे अबू सलामा दालानी ने हज़रत अली से पूछा था कि बसरा पहुँच कर आप का क्या तर्जे अमल होगा आप ने फ्रमाया था कि मैं तबलीग करूँगा और लोगो को खुदा की तरफ दावत दूँगा अगर न माने तो फिर लडूगाँ इस के जवाब में दलानी ने कहा था हुजूर ज़रूर ग़ालिब आयेंगे क्यों कि खुदा की तरफ बुलाने वाला कभी मगलूब नही होता। अल-ग़रज़ यह अबु सलामा अमारा दालानी बड़ी खूवियों के मालिक थे। आले मोहम्मद का साथ देना अपना फ्रीज़ा जानते थे। आप इमाम हुसैन अलै० कि ख़िदमत में ब-मकाम करबला हाज़िर हुये और सुबहे आशूर शहीद हो गये।

कर्बला के 19वें शहीद

कर्बला के 19वें शहीद हज़रते सवारा इब्ने अबी अमीर अल-मेहरानी आपका पूरा नाम सवारा इब्ने मनगम जाबिस इब्ने अबी अमीर इब्ने नैहमल हमदानी अल-हमी है। आप हमदान के रहने वाले थे। आशूर के पहले दूसरी और दसवीं के अन्दर किसी तारीख को करबला पहुँचे थे आपके नाम के साथ लफ़्ज़ "नेहमी" अपने दादा की तरफ इन्तेसाब कि वजह से लगा हुआ है बाज़ ओलमा ने नहमी को फहमी तहरीर फ्रमा है लेकिन ये मेरे नज़दीक गलत है। आप ने यौमे आशूर पहले हमले में जामे शहादत नौश फ्रमाया है। आप के बारे में बाज़ किताबों में है कि आप हमला-ए-अव्वल में ज़ख्मी होकर गिरे तो सवार की कौम के लोगों ने उन्हे उठा लिया और इब्ने साद से इजाज़त के बाद छः माह अपने पास रखा बिल आखिर आप ने शहादत पाई।

कर्बला के 18वें शहीद

कर्बला के 18वें शहीद नोअमान इब्ने उमर रासेबी आप भी क़बीला-ए-अज़्द के चश्मो चराग थे। आप हलास अज़्दी के हकीकी भाई और इमाम हुसैन अलै० के जाँनिसार थे। आपको भी अमीरूल मोमिनीन के असहाब में होने का शरफ हासिल था इब्ने साद के लश्कर के साथ करबला में आकर इमाम हुसैन अलै० की ख़िदमत में हाज़िर हुऐ और सुबह आशूर शहीद होकर सआदत अबदी के मालिक बन गये।

कर्बला के 17वें शहीद

कर्बला के सत्रहवें शहीद हज़रते हलास इब्ने उमर रासबी आप कूफ़े के रहने वाले और कबीला-एं-अज़्द की रासब शाख की यादगार थे। अमीरूल मोमिनीन के असहाब में आप का शुमार होता था कूफ़े से उमरे सअद के लश्करी होकर करबला पहुँचे थे और इब्ने साद के लश्कर वालों के साथ ही थे जब आप को यकीन हो गया कि इमाम हुसैन से सुलह न हो सकेगी तो आप रात के वक़्त पोशीदगी के साथ आ मिले और यौमे आशूरा शहीद हुए।

कर्बला के 16वें शहीद

कर्बला के सोलहवें शहीद हज़रते उमर इब्ने अब्दुल्लाह अल-जुनैदी आप का पूरा नाम उमर इब्ने अब्दुल्लाह अल-हमदानी अल-जुनैदी था जुनैदा बाइले हमदान में से एक कबीले का नाम है। आप इमाम हुसैन अलै० से करबला में मिलें थे और जब से हाज़िरे ख़िदमत हुऐ थे हर किस्म की ख़िदमत करते रहे और यौमे आशूरा जंगे मगलूबा में शहीद हुऐ सिपहर काशानी और अल्लामा मजलिसी फाज़िल अरबली ने लिखा है कि आप जंगे मगलूबा में शहीद हुऐ है लेकिन अल्लामा समावी का ब्यान है कि आप जंग करते-करते शहीद हुऐ है और आप पर ज़ियारते नाहिया में दर्द आगीन अल्फाज़ के साथ सलाम किया गया है।

कर्बला के 15वें शहीद

कर्बला के पंद्रहवें शहीद हज़रते हयान इब्ने हारिस अल-सलमानी आप कबीला-ए-अज़्द के चश्मो चराग़ थे आपके दिल में आले मोहम्मद स० की मोहब्बत का अज़ीमुश्शान समन्दर मौजज़न था। इमाम हुसैन अलै० की ख़िदमत को अपना फ्रीज़ा जानते थे। जिस वक्त से आप इमाम हुसैन अलै० कि ख़िदमत में पहुँचे ख़ादिमो की तरह ख़िदमत गुज़ारी करते रहे और तक़रीबन हर मौके पर अपने फ्रीज़ा-ऐ-ख़िदमत अदा किया और सुबह आशूरा जंगे मगलूबा में शहीद हुऐ।

कर्बला के 14वें शहीद

कर्बला के चौदहवें शहीद हज़रते मुजमाअ इब्ने अब्दुल्लाह अल-आन्दी आपका पूरा नाम मजमाअ इब्ने अब्दुल्लाह इब्ने मजमा इब्ने मालिक इब्ने आयास इब्ने अब्द मनात इब्ने अबीदुल्लाह इब्ने सअद अल-अशीरा अल-मज़हजी कही आन्दी था। आप किबला मज़हज एक नुमाया मर्द थे आपके वालिद अब्दुल्लाह इब्ने मुजमाअ सहाबी-ए-रसूल थे और अहदे रिसालत में अच्छी हैसियत के मालिक थे। लोगो की निगाह में आपकी बड़ी इज़्ज़त थी। खुद मुजमाअ का शुमार ताबईन में था और आप को अमीरूल मोमिनीन के साहाबी होने का शरफ हासिल था। मकाम अज़ीब हजानात में जिन लोगो को हुर्र ने इमाम हुसैन अ० के साथ होने से रोका था। उन में आप भी थे। आप ही से इमाम हुसैन अलै० ने अहले कूफा के हालात अजीब में दरयाफ्त फ्रमाये थे और उन्ही अब्दुल्लाह ने अर्ज की थी कि, मौला ! कूफे के जितने रईस-ओ-सरदार है सब को इब्ने ज़्याद ने डरा धमका कर और रूपये देकर आप के खिलाफ कर दिया है सब आप से लड़ने को तय्यार है। और ऐ मौला ! यही हाल गुरबा का भी है उन के दिल अगर चें आपके साथ है लेकिन उनकी तलवारें आपकी हिमायत में नही है। फिर आपने अपने कासिदे कैस इब्ने मसहर के मुताल्लिक फ्रमाया कि मैंने अहले कूफा के...

कर्बला के 13वें शहीद

कर्बला के तेराहवें शहीद हज़रते अब्दुर-रहमान अल-अरजब आप मशहूर ताबई और बड़े शुजा व बहादुर थे। आप क़बीला बनी हमदान की शाख बनी अरजब के चश्मों चराग थे। आप का पूरा नाम अब्दुर्र रहमान इब्ने अब्दुल्लाह अल-कज़न इब्ने अरजब इब्ने मालिक इब्ने माविया इब्ने सअब इब्ने रोमान इब्ने बकीर-अल-हमदानी-अल-अरजबी था। आप उन वफूद के एक मेम्बर थे जो इमाम हुसैन अलै० की ख़िदमत में अर्जियाँ लेकर कूफ़े से मक्का -ए-मोअज़्ज़मा गये थे। पहले वफ्द में अब्दुल्लाह इब्ने सबाअ और अब्दुल्लाह दाल थे। और दुसरे में कैस और यही अब्दुर्र रहमान गये थे। उन के हमराह पचाँस अर्जियाँ थी ये वफद बाँरह माहे सयाम को मक्क-ए-मोअज़्ज़मा पहुँचा था। मोअर्रखीन का कहना है कि जब इमाम हुसैन अलै० ने मुस्लिम इब्ने अकील को ब-कस्दे कूफा रवाना किया तो उनके हमराह उन्ही अब्दुर्र रहमान को भी कैस और अम्माराः के साथ कर दिया था। अब्दुर्र रहमान हज़रत मुस्लिम को कूफा पहुँचा कर फिर मक्का-ए-मोअज़्ज़मा पहुँचे और इमाम हुसैन अलै० की मुस्तक्लि बैअत इख़्तेयार कर ली और हज़रत के साथ-साथ करबला आये और यौमे आशूरा शहीद हुऐ। 📝72 तारे, अल्लामा नजमुल हसन करारवी सा0 मरहूम 

कर्बला के 12वें शहीद

कर्बला के बारहवें शहीद हज़रते सैफ इब्ने मालिक अबदी आप का पूरा नाम सैफ इब्ने मालिक अबदी-अल-नमीरी अल-बसरी था। आप हज़रत अली अलै० के ख़ास शियों में से थे। इमाम हुसैन अलै० की नुसरत के लिये मारिया के मकान में जो ख़ुफ़िया इजतेमा हुआ करता था। उसमें आप भी शामिल हुआ करते थे। आपने मक्के में इमाम हुसैन की बैअत इख़तेयार की थी और आप त-दमें आखिर साथ रहे यौमे आशूरा शहीद हो गये।

कर्बला के 11वें शहीद

कर्बला के ग्यारहवें शहीद हज़रते गामिर इब्ने मुस्लिम अबदी आप हज़रत अमीरूल मोमिनीन अलै० के शिया और बसरा के रहने वाले थे आप का पूरा नाम गामिर इब्नेमुस्लिम अबदी अल-मतरी था आप मक्का-ए-मोअज़्ज़मा में इमाम हुसैन अलै० के साथ हो गये थे और त-दमे आख़िर साथ ही रहे आप के हम राह आप का गुलाम सालिम भी था ज़ियारत नाहिया की बिना पर सालिम भी आप ही के हमराह आशूर के दिन शहीद हुआ।

कर्बला 10वें शहीद

कर्बला के दसवें शहीद हज़रते ज़रगामा इब्ने मालिक-अल-तग़लबी आप का नाम इसहाक और लकब ज़रगामा था। आप अमीरूल मोमिनीन के जाँबाज़ सहाबी हज़रत मालिके अशतर के बेटे और इब्रराहीम इब्ने मालिक के भाई थे। आप निहायत शुजा और बहादुर थे और जैसा कि नाम से ज़ाहिर है शेरे नर की तरह दिलेर थे। आप मज़हब व अकीदे में शिया थे। आपने कूफ़े में मुस्लिम इब्ने अकील के हाथों पर इमाम हुसैन की बैअत की थी। शहादते मुस्लिम के बाद लश्कर इब्ने ज़ियाद के साथ करबला में पहुँकर इमाम हुसैन अलै० की ख़िदमत में हाज़िर हो गये। और यौमे आशूरा जामे शहादत नौश फ्रमा कर राही-ए-ज़न्नत हुये। फाज़िल दर बन्दी का कहना है कि आप 500 सवारों को कत्ल करके शहीद हुऐ है।

कर्बला के 9वें शहीद

कर्बला के नौवें शहीद हज़रते उमर इब्ने सबीकह अल सनबई आप का पूरा नाम उमर इब्ने सबीकह इब्ने कैस इब्ने सअलबता सनबई था। आप निहायत शुजा और अज़ीम शह सवार थे। इब्ने साद की कोशिशो से इमाम हुसैन अलै० के मुकाबले के लिये कूफ़े से करबला आये थे। लेकिन सही हालात से ब-ख़बर होने के बाद आप ने मक़सदे इब्ने साद व इब्ने ज़्याद पर लानत कर दी और लश्कर को खैरबाद कह कर इमाम हुसैन अलै० की ख़िदमत में हाज़िर हो गये और सुबहे आशूर शहीद हो कर राही-ए-जन्नत हुये।

कर्बला के 8वें शहीद

कर्बला के चौथे शहीद हज़रते इमरान इब्ने कअब अल-अशजई आप का पूरा नाम् इमरान इब्ने काब इब्ने हारिस अल-अशजई था। आप निहायत शुजा और बे-इन्तेहा दीनदार थे। आप ने इमाम हुसैन अ० का जिस वक़्त से साथ इख़्तेयार किया है आख़िर दम तक उसी पर कायम रहे। यहाँ तक कि आप ने सुबहे आशूर जंगे मगलूबा में जामे शहादत नोश फरमाया।

कर्बला 7वें शहीद

कर्बला के चौथे शहीद हज़रते इमरान इब्ने कअब अल-अशजई आप का पूरा नाम् इमरान इब्ने काब इब्ने हारिस अल-अशजई था। आप निहायत शुजा और बे-इन्तेहा दीनदार थे। आप ने इमाम हुसैन अ० का जिस वक़्त से साथ इख़्तेयार किया है आख़िर दम तक उसी पर कायम रहे। यहाँ तक कि आप ने सुबहे आशूर जंगे मगलूबा में जामे शहादत नोश फरमाया। 📝72 तारे अल्लामा नजमुल हसन करारवी सा0 मरहूम 

कर्बला के 6वें शहीद

कर्बला के चौथे शहीद हज़रते इमरान इब्ने कअब अल-अशजई आप का पूरा नाम् इमरान इब्ने काब इब्ने हारिस अल-अशजई था। आप निहायत शुजा और बे-इन्तेहा दीनदार थे। आप ने इमाम हुसैन अ० का जिस वक़्त से साथ इख़्तेयार किया है आख़िर दम तक उसी पर कायम रहे। यहाँ तक कि आप ने सुबहे आशूर जंगे मगलूबा में जामे शहादत नोश फरमाया।

कर्बला के 5वें शहीद

कर्बला के चौथे शहीद हज़रते इमरान इब्ने कअब अल-अशजई आप का पूरा नाम् इमरान इब्ने काब इब्ने हारिस अल-अशजई था। आप निहायत शुजा और बे-इन्तेहा दीनदार थे। आप ने इमाम हुसैन अ० का जिस वक़्त से साथ इख़्तेयार किया है आख़िर दम तक उसी पर कायम रहे। यहाँ तक कि आप ने सुबहे आशूर जंगे मगलूबा में जामे शहादत नोश फरमाया।

कर्बला के 4थे शहीद

कर्बला के चौथे शहीद हज़रते इमरान इब्ने कअब अल-अशजई आप का पूरा नाम् इमरान इब्ने काब इब्ने हारिस अल-अशजई था। आप निहायत शुजा और बे-इन्तेहा दीनदार थे। आप ने इमाम हुसैन अ० का जिस वक़्त से साथ इख़्तेयार किया है आख़िर दम तक उसी पर कायम रहे। यहाँ तक कि आप ने सुबहे आशूर जंगे मगलूबा में जामे शहादत नोश फरमाया।

कर्बला के तीसरे शहीद

3 हज़रते नईम इब्ने अजलान अन्सारी अलैहिस्सलाम  आप क़बीला ख़ज़रज के चश्मों चराग थे। आप के दो भाई और थे। एक का नाम नज़र और दूसरे का नाम नोमान था ये तीनो भाई अमीरुल मोमिनीन हज़रते अली अलै० के असहाब में से थे। इन लोगो ने जंगे सिफ़्फ़ीन में बड़ी जवाँ मर्दी का सबूत दिया था शुजाअत उन के घर की लौंडी थी ये शायर भी थे। नज़र और नोमान वाक्या-ए-करबला से पहले वफात पा चुके थे। और नईम जंगे करबला में शरीक हुऐ। नईम का शुमार हुसैनी वफादारों में था आपको जब पता चला कि फर्ज़न्दे रसूल इमाम हुसैन अलै० आज़िमे इराक़ हैं तो आप कूफ़े से निकलकर हज़ की ख़िदमत में आहाज़िर हुए और आशुरे के दिन पहले हमले में शहीद हो गये। 📝72 तारे, अल्लामा नजमुल हसन करारवी सा0 मरहूम 

हज़रते हुर अलैहिस्सलाम के फ़रज़न्दों का तअर्रुफ़

💠हज़रते हुर अलैहिस्सलाम की औलाद हज़रते हुर्र की कई औलादें थी। अली इब्ने हुर्र ने करबला में शहादत पाई हजर इब्ने हुर्र को इमाम हुसैन अलै० पर पानी बन्द करने के लिये चार हज़ार का लश्कर दे कर भेजा गया था। लेकिन जब इब्ने ज़ियाद को मालूम हुआ कि हुर्र इमाम हुसैन अलै० की तरफ झुक रहा है तो फौरन शीस इब्ने रबीअ को एक लश्करे गरों के हमराह करबला में बन्दिशे आब के लिये भेजा और इब्ने हुर्र पर भी उसे निगरॉ कार दिया। मातीन 351 हिजरी में है कि हज़रते हुर्र के लश्करे उमरे सअद लई के निकल आने के बाद हजर इब्ने हुर्र भी निकल आये और उन्होंने हज़रत इमामे हुसैन अलै० से इजाज़त हासिल करके लश्करे उमरे सअद लई पर हमला किया और घमासान की जंग में 120 दुश्मनों को कत्ल करके शहीद हुये उन की शहादत के बाद इमाम हुसैन अलै० ने चाहा कि उन की लाश उठायें मगर दुश्मनों ने मज़ाहेमत बिल आखिर इमाम हुसैन अलै० ने जंग आज़माई शुरू की आठ सौ दुशमनों .को कत्ल करके लाशा-ए- हजर बिन हुर्र को खेमे तक पहुँचाया। अबीदुल्लाह इब्ने हुर्र क्रमकाम में है कि इस का शुमार शुजाआने अरब में था। उस ने जंगे सिफ्फीन में माविया के साथ हज़रत अली के लश्कर से जंग क...

हज़रते हुर अलैहिस्सलाम कौन थे?

🌐 हज़रते हुर्र इब्ने यज़ीदे अर-रियाही अलैहिस्सलाम  आप का नामे नामी और इस्मे गिरामी हुर्र इब्ने यज़ीद इब्ने नाजीया इब्ने अनब इब्ने इताब इब्ने हुरमी इब्ने रिया इब्ने यरबू इब्ने खन्ज़ला इब्ने मालिक इब्ने ज़ैदमना इब्ने तमीम अल यरबूई अर रियाही था। आप अपने हर अहदे हयात में शरीफे कौम थे। आप के बाप दादा की शराफत मुसलेमात से थी पैग़म्बरे इस्लाम के मशहूर सहाबी ज़ैद इब्ने उमर इब्ने कैसे इब्ने इताब जो (अहवज़) के नाम से मशहूर थे और शायरी में बा-कमाल माने जाते थे वो आप के चचा ज़ाद भाई और आप के ख़ानदान के चश्मों चराग़ थे। हज़रते हुर्र का शुमार कुफे के रइसों में था। इब्ने ज़ियाद ने जब आप को एक हज़ार के लश्कर समैत इमाम हुसैन (अलै०) से मुकाबेला करने के लिये भेजा था उस वक़्त आप को एक गैबी रिश्ते ने जन्नत की बशारत दी थी। जनाबे हुर्र का लश्कर मैदान मारता हुआ जब मकामे "शराफ्" पर पहुँचा और इमाम हुसैन (अलै०) के काफिले को देखकर दौड़ा तो तमाज़ते आफ‌ताब और रास्ते की दोश ने प्यास से बेहाल कर दिया था। मौला की ख़िदमत में पहुँच कर जनाबे हुर्र ने पानी का सवाल किया। साक्रिये कौसर के फ़र्ज़न्द ने सेराबी का ह...

हज़रते अब्बास अलैहिस्सलाम का मदफ़न

हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम का मदफिन अल्लामा शेख फखरूद्दीन इब्ने अहमद बिन अली बिन अहमद बिन तरीह अल नजफी तहरीर फरमाते हैं, हज़रत अब्बास अ० तमाम शोहदा से अलाहिदा पहाड़ी के करीब मकामे कत्ल पर दफ्न किये गये हैं। जहां आज भी उनकी कब्र मौजूद है। (मुन्तख़ब शेख तरीही मजलिस 2 स0 22 तबअ मुम्बई 1308 हिजरी) अल्लामा मोहम्मद बाक़िर मजलिसी तहरीर फरमाते हैं बनी असद ने हज़रत अब्बास अ० गाजिरया के रास्ते में उसी जगह दफ्न किया है जहां आज भी उनकी कब्र मौजूद है। (बिहारूल अनवार जिल्द 10 स0 242, आलामुल वुरा स0 147, यही कुछ किताब इरशाद शेख मुफीद, अबसारूल ऐन स0 127, तोहफए हुसैनिया जिल्द एक स० 187, नूरूल ऐन 45, हिदायतुल जायरीन शेख अब्बास कुम्मी स0 110, अनवारे नेमानिया स0 344, उमरतुल मतालिब स० 349, रियाजुल एहज़ान स० 39, किफायतुल तालिब स० 298, और कामिल बहाई सैरायर इब्ने इदरीस यहिया लौलामा हल्ली मीज़ार दरदिस शहीद अव्वल शरह इरशाद अर्दबेली मिसबाहुल फकीहा रज़ा हवानी में है और अबू मोखन्नफ के अलावा और अहले मकातिल ने लिखा है कि जनाबे अब्बास ० के अलाहिदा दफ्न करने की वजह यह हुई कि आप की लाश पारा पारा होने की वजह से उठ नहीं सकती ...

इमामे मासूम का हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम पर सलाम

इमामे मासूम का हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम पर सलाम हज़रत साहबुल अस्र अलैहिस्सलाम जियारते नाहिया में हजरत अब्बास पर इन लफ़्ज़ों में सलाम फ़रमा रहे हैं: तर्जुमा : अमीरूल मोमेनीन हज़रत अली के फ़रज़न्द जनाबे अबुल फज़लिल अब्बास अलैहिस्सलाम पर सलाम हो जो अपनी जान अपने भाई पर निसार करने वाले और उन पर कुर्बान होने वाले। उन्हें अपनी रूह के जरिये से बचाने वाले और तलबे आब में अपने हाथों को कटाने वाले थे। खुदा उनके कातिलों यजीद इबने रेकाद और हकीम इबने तुफैल पर लानत करे। (📝बिहारूल अनवार जिल्द 10 स० 208 तबाअ ईरान)

हज़रते अब्बास अलैहिस्सलाम के हाथों क़त्ल होने वालों की तादाद

हज़रत अब्बास के हाथों क़त्ल होने वालों की तादाद हज़रत अब्बास के हाथों से कितने दुश्मनाने इस्लाम क़त्ल हुए हैं। इसकी तफ़्सील बतानी मुश्किल है। क्योंकि वह एक ऐसे बहादुर थे जो हज़रत अली की तरह जब तलवार उठाते थे पुरे के पुरे साफ़ कर देते थे और तलवार से क़त्ल किये जाने वालों की तादाद का लिखना इस लिये भी मुश्किल है कि तक़रीबन हर मुजाहिद मैदान में आपसे मदद चाहता था और आप जाकर तलवार चलाते रहे। अलबत्ता आपने नैज़े से जितने दुश्मनों को क़त्ल किया है उसकी तफ़सील यह है:- ताविया पर सवार होने से पहले 53, ताविया पर सवार होकर 280, नहरे फुरात में उतरने से पहले 800, दाहिना हाथ कटने से पहले 450, बायां हाथ कटने से पहले 50, दोनों हाथ कट जाने के बाद दांतों और कटी हुई कलाई के ज़रिये से 305, दुश्मनों को वासिले जहन्नुम किया। (📚नूरूल ऐन इमामे इस्हाक असफराएनी स० 58 ता 60 तबअ मुम्बई व इसरारूल शहादत आकाए दरबन्दी स0 337 तबअ ईरान)

असहाबे इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम और जन्नत में अपना मुक़ाम

♦️इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने जन्नत दिखला दी हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने असहाबे बावफ़ा का जाएज़ा लेने और पूरा पूरा इत्मिनान कर लेने के बाद अपने क़रीब बुलाते हैं और एक दफ़ा फिर फ़रमाते हैं कि तुम्हारी बातों से तौके बैयत उतारे लेता हूं। यह रात का पर्दा हाएल है इसे सिपर के काम में लाओ और अपनी जान बचा लो। यह दुश्मन तो सिर्फ मेरा खून चाहते हैं। जब मुझे क़त्ल कर लेंगे तो तुम्हारी तरफ़ रूख भी न करेंगे। वह बोले, ख़ुदा की कसम यह तो कभी न होगा।   आपने फ़रमाया। जो कहता हूं उस पर गौर करो। कल तुम सब के सब ज़रूर क़त्ल कर दिये जाओगे और एक भी न बचेगा। अर्ज़ की अलहम्दो लिल्लाह कि हम आपके साथ शहीद होने से मुशर्रफ होंगे। फिर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने असहाब को क़रीब बुलाया और फ़रमाया ज़रा सर तो उठाओ और देखो। उन्होंने सर उठाया और जन्नत में अपनी मंजिल और जगह देखी आप फ़रमाते जाते थे कि ऐ हबीब, ऐ ज़ुहैर वगैरा यह तुम्हारी जगह है यह तुम्हारी जगह है इसी तरह सब को दिखला दिया। उसे देखने के बाद हर शख़्स नैज़ों और तलवारों का अपने सीने और चेहरे से इस्तेक़बाल करने लगा। ताकि जल्द से जल्द जन्नत में दाखिल हो क...

हज़रत अब्बास अ० की ख़िदमत में अमान नामा

⭕हज़रत अब्बास अ० की ख़िदमत में अमान नामा मोहर्रमुल हराम की नवीं तारीख को दिन ढल चुकने के बाद शिम्र अपने खेमे से बरामद हुआ और हज़रम इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के करीब आकर आवाज़ दी। अब्दुल्लाह, जाफ व अब्बास व उस्मान कहां हैं। मेरे सामने आयें। मैं उनके लिये हुक्मे अमान लाया हूं। उन हज़रात ने जब अमन का लफ़्ज़ सुना खामोशी इख़्तियार फमाई और बज़ाहिर जवाब भी देने का इरादा न था। लेकिन हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने शिम्र के कलेमात सुनते ही हज़रत अब्बास अ० से फरमाया। तुम लोग देखो तो सही यह कहता क्या है। अगर चे यह फासिक है, लेकिन तुम्हारा मामू होता है। (1)      {1. अल्लामा कन्तूरी लिखते हैं कि बाज़ रिवायात की बिना पर हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने हज़रत अब्बास से नहीं बल्कि उनके भाईयों से फ्रमाया था कि शिम्र मलाऊन को जवाब दो। उनके एयूने अल्फाज़ यह हैं फकालल हुसैन ला खोतेहि अजबूहो और आपने यह इस लिये कहा था ताकि हज़रत अब्बास अ० का एहतेराम हो सके।} यह सुनकर हज़रत असदुल्लाह अली बिन अबीतालिब के चारों शेर खेमे से निकल पड़े, और करीब जाकर पूछा। क्या कहता है। उसने कहा ऐ मेरे भांजो ! तुम्हारे लिये...

हज़रते अब्बास अलैहिस्सलाम का अपने भाईयों से ख़ेताब

⭕तारीखों से पता चलता है कि हज़रत अब्बास अलमबरदार ने अपने सब भाईयों को शहादत से पहले जमा किया और जब सब इकट्ठा हो गये तो आपने फ़रमाया :- " ऐ मेरे भाईयों ! अब वह वक्त आ पहुंचा है कि तुम लोग भी मैदाने कताल में कदम रखो और ऐसी जंग करो कि मैं अपनी आखो से देख लूँ कि तुमने खुदा और रसूल की राह में अपनी जानें कुर्बान कर वीं। देखो, आज के दिन जान देने से गुरेज़ का महल नहीं है, लेहाज़ा उजलत करो और शर्फे शहादत हासिल करके बारगाहे रिसालत में सुर खुरू हो जाओ। हज़रते अब्बास (अ) ने अपने बेटों और भाईयों की शहादत को अपनी शहादत पर मुकददम क्यों समझा ? इस जैल में साहब मुनाफउल अबरार का कहना है कि मुमकिन है इस ख़्याल के तहत ऐसा किया हो कि कारे खैर में जल्दी करना चाहिऐ इस लिये कि शैतान गैर मासूम को बहका कर अमरे खैर से बाज़ भी रख सकता है। लेकिन मौलाना सय्यद नजमुल हसन साहब करारवी ने अपनी किताब जिकरूल अबास में अपनी राय का इज़हार फरमाया है वह ज़्यादह करीने क़्यास है। आप फरमाते हैं:- " हज़रत अब्बास (अ) ने अपने से इसलिये मुकददम रखा कि मेरी शहादत उनकी नज़रों के सामने न हो। क्योंकि कहीं ऐसा न हो कि मेरे मरने से ...

शबे आशूर इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम का ख़ुत्बा

🔰हज़रत इमाम हुसैन का एक और ख़ुत्बा  रात का एक हिस्सा गुज़र चुका है और तारीकी छा चुकी है। इमाम अलैहिस्सलाम ख़ेमे से बरामद हो कर अपने असहाब के क़रीब जाते हैं, और उनके फिर मजतमा होने का हुक्म फ़रमाते हैं। आने वाहिद में असहाबे बावफ़ा मौजूद होते हैं (📚नासिखुल तवारीख जिल्द 6 स0 247) आप साज की कुर्सी पर जलवा अफ़रोज़ हो कर अपने असहाब से बादीदा पुरनम फ़रमाते हैं। (📝रौज़तुल शोहदा स० 309) मेरे वफ़ादार असहाब मैंने तुम से बारे बैअत उठा लिया तुम अपने क़बीलों और अज़ीज़ों दोस्तों में जा मिलो। फिर अपने अहलेबैत अ० की तरफ़ मुतावज्जेह हो कर फ़रमाने लगे। मैं तुम्हें अपनी जुदाई के मुताल्लिक मशविरा देता हूं। इस लिये कि तुम दुश्मनों की कसरत ओर ताक़त की ताब न ला सकोगे और देखो दुश्मन सिर्फ मुझी को चाहते हैं तुम मुझे दुश्मनों में छोड़ कर चले जाओ बेशक ख़ुदा मेरी मदद करेगा और हमारे आबाओ अजदाद की तरह हम पर नज़रे मरहमत रखेगा। (📚दमअतुस्साकेबा स० 325 व नासेखुत्तवारीख़ जिल्द 6 स0 247) इस ख़ुत्बे के बाद भी जॉबाजों ने दिलेराना जवाब दिया। 📝ज़िकरुल अब्बास अलैहिस्सलाम 

हज़रते जौन अलैहिस्सलाम

⭕हज़रत जौन गुलामे अबुज़र गफ़्फ़ारी की शहादत ज़ुहैर इब्ने कै़न की शहादत के बाद अबु समामा साईदी, हेज़ाज बिन मसरूक, यहीया इब्ने कसीर, ख़ताला इब्ने साअद अब्दुलरहमान बिन हन्ज़ला और उमरू बिन करतता सफे हुसैनी से निकल कर मैदान में आये और एक अन्दाज़े के मुताबिक उन्होंने मजमुई तौर पर तकरीबन २६५ मुखालफीन को कत्ल किया और दर्जए शहादत पर फायज़ हुये। इन शहादतों के बाद हज़रते जौन गुलाम अबुज़र गफ़्फ़ारी इमाम की ख़िदमत में हाज़िर हुये और उन्होंने मैदाने कारज़ार की इजाज़त चाही। इमाम (अ.) ने इस ज़ईफ, सिन रसीदह और क़दीम जॉनिसार को इजाज़त दी। जौन ने मआरका कार ज़ार में दिलेरी और शुजाअत के ज़ौहर दिखाये और बहुत से दुश्मनों को फिन्नार (जहन्नम भेज) करके दर्जेए शहादत पर फायज हुये। इमाम (अ) जिस घड़ी जौन के सिरहाने पहुँच उस वक़्त जान बाकी थी और अबुज़र का यह वफादार गुलाम अपनी बंद आँखों से बेहिश्त के नज़ारे कर रहा था। इमाम (अ.) ने जौन के खून आलूद चेहरे को देखा और फरमायाः- “ अगर कोई ख़्वाहिश है तो ब्यान करो " जौन ने आँख खोल दी और कहा:-" या इब्ने रसूल (स.) मैंने तमाम उमर राहत और नेअमत के दरमियान आपकी ख़िदमत मे...

हज़रते ज़ुहैर इब्ने कै़न अलैहिस्सलाम

⭕ हज़रते ज़ुहैर इब्ने कै़न अलैहिस्सलाम की तक़रीर इमाम हुसैन (अ.) का ख़ुत्बा तमाम हुआ तो ज़ुहैर इब्ने कै़न जिनका शुमार उस्मानी गिरोह में था और वह मक्का से करबला के रास्ते में इमाम (अ.) के साथ हो गये थे, आगे बढ़े और उन्होंने कूफा व शाम के काज़िबों को ललकराते हुये कहाः- “ ऐ कूफा व शाम के गद्दारों ! अज़ाबे इलाही से डरो और ख़ौफ़ खाओ। अपनी जेहालत और शैतनत से इस्लामी रिशतऐ अखूवत को न तोड़ो। जब तक हमारे और तुम्हारे दरमियान तलवार नहीं चलती उस वक़्त तक यह रिश्ता क़ायम है और जब यह तलवार चलेगी तो यह खुद ब खुद टूट जायेंगे। मैं तुम्हें आगाह करता हूँ कि परवरदिग़ार ने अपने नबी मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.) की औलाद इमाम हुसैन (अ.) के ज़रिये हमें अज़माईश में डाला है और वह यह देखना चाहता है कि हम उनके साथ क्या सुलूक करते हैं। अल्लाह ज़ालिमों को पसन्द नहीं करता। ख़ुदा के लिये इब्ने ज़ेयाद का साथ छोड़कर नवासए रसूल (स.) की मदद पर कमर बस्ता हो जाओ यकीन मानों की यज़ीद और इब्ने ज़ेयाद वगैरह का शुमार ज़ालमीन में है। यह लोग तुम्हारे साथ हमदर्दी का बरताव या बेहतरी का सुलूक नहीं कर सकते मैं तुम्हें आगाह करता हूँ कि यह वही...