आख़िरी शब, एक शब की मोहलत
⚫आख़िरी कोशिश
⭕हमला और एक शब की मोहलत
आठवीं मोहर्रम का दिन गुज़रा और नवीं मोहर्रम की मुज़तरिब रात ने नवासए रसूल (स.) की दुआए सलामती के लिये करबला पर चांदनी का मुसल्ला बिछा दिया।
हज़रत इमाम हुसैन (अ.) अपने बड़े भाई हसन (अ.) की तरह क़त्ल व ग़ारत गरी और ख़ूरेजी के ख्वाँहा नहीं थे। इसलिये आपने मुनासिब समझा कि आख़िरी बार सुलह की पेशकश के ज़रिऐ हुज्जत तमाम कर ली जाये। चुनानचे आपने उमरू बिन करज़ा बिन काअब अन्सरी को उमरे साअद के पास इस पैग़ाम के साथ भेजा कि वह आज रात में मुझसे दोनों लश्कारों के दरमियान मुलकात करें।
उमरे साउद ने इमाम (अ.) की इस ख़्वहिश को तसलीम किया और जब रात का कुछ हिस्सा गुज़र चुका तो वह बीस सवारों को साथ लेकर अपने ख़ेमें से निकला। इमाम भी इतने ही जाँबाजों के साथ तय शुदा मुकाम की तरफ़ चले, लेकिन जब क़रीब पहुँचे तो आपने सिर्फ़ हज़रते अब्बास (अ.) और हज़रत अली अकबर (अ) को अपने साथ रखा। बाक़ी अफ़राद को आगे बढ़ने से रोक दिया। उमरे साअद ने भी अपने लड़के और गुलाम को साथ लिया और बाकी लोगों से अलाहदगी अख़तियार करके इमाम (अ.) की सिम्त आगे बढ़ा। फिर दोनों एक मुकाम पर बैठ गये और रात काफ़ी देर तक गुफ़तुगू का सिलसिला जारी रहा। इस मौके पर इमाम ने फ़रमायाः-
" ऐ उमरे साअद ! अल्लाह के एताब व अज़ाब से डर, तू अपने दिल में मेरे क़त्ल का इरादा रखता है हालाँकि मैं तेरे नबी का नवासा हूँ। यकीनन ख़ुदा इस अमर से राज़ी व खुशनूद होगा कि तू मेरे साथ नेकी व नरमी का बरताव कर "।
उमरे साअद ने कहाः- “ यज़ीद बड़ा ज़ालिम व जाबिर है वह इब्ने ज़ेयाद के ज़रिऐ मेरे घर को मिसमार करके तबाह व बरबाद करा देगा "।
इमाम ने फ़रमाया- अगर ऐसा हुआ तो मैं वादह करता हूँ कि तेरे घर से बेहतर तूझे दूसरा घर बनवा दूँगा।
उमरे साअद ने फ़रमायाः- मेरा सारा माल मताअ लूट लिया जायेगा। आपने फ़रमायाः- मै इससे ज़्यादह तूझे दूँगा।
फिर उमरे साअद ने फ़रमाया : मेरे बाल बच्चे भी हैं, मैं इनकी तबाही व बरबादी से डरता हूँ। इसके अलावह “रै” की हुक़ूमत का छोड़ना भी मेरे इमकान से बाहर है।
यह कहकर वह ख़ामोश हो गया और इमाम ने फ़रमाया कि ऐ उमरे साअद हश्र के दिन अल्लाह तेरी बख़शिश न करे (दमआ साकेवा स ३२३)।
तारीखें शाहिद हैं कि हज़रत इमाम हुसैन (अ.) और उमरे साअद में जितने भी तखलिये हुये वह सबके सब तन्हाई में हुये। लेकिन इस मुलाकात में २०-२० सवारों का साथ होना यह वाज़ेह करता है कि अब उमरे साअद के ख़यालात में तबदीली आ चुकी है और वह क़त्ले इमाम पर कमर बस्ता हो चुका है। इस गुफ़तुगू के बाद दोनों फ़रीक़ अपने अपने खे़मों में चले गये (तबरी ज ६ स २३५)
तबरी का कहना है कि फ़रीक़ैन के दरमियान यह तमाम गुफ़तुगू सिग़ये राज़ में हुई मुखतसरन यह मालूम हो सका कि आख़िर में हुसैन (अ.) इस पर आमादह हो गये थे कि वह इराक में क़्याम का इरादह तर्क कर देंगे और अरब के हदूद से निकलकर किसी दूर दराज़ मुकाम पर चले जायेंगे। (तबरी ज ६ स २३५)
दौरान मुलाक़ात इमाम की मसालेहाना गुफ्तुगू से उमरे साअद इतना मुतासिर हुआ कि इसने इब्ने ज़ेयाद को यह ख़त लिखा किः- “अलहमदो लिल्लाह हुसैन (अ.) सुलह के रास्ते पर गामज़न हैं। जंग की जुरूरत इसलिये नहीं रह गयी कि वह अरब के हुदूद से निकल कर किसी दूर दराज़ मुकाम का सफ़र अख़तियार करने को तैयार हैं "। फिर उमरे साअद ने अपनी राय भी लिखी, इन अलफाज़ में किः-
मेरे ख़्याल में फितना की आग फरू हो गयी है और मुसलमानों का शीराज़ह मुन्तिशर होने से बच गया है मेरे नज़दीक मुखासमत (जंग) बे सूद है लेहाज़ा इस मामले को यहीं ख़त्म हो जाना चाहिऐ "।
उमरे साअद इब्तेदा ही से इमाम हुसैन (अ.) के क़त्ल से बचना चाहता था और वह जानता था कि आले रसूल (स.) की मुख़ालेफ़त व मुखासेमत का अंजाम जहन्नुम की आग है मगर इसकी हरीस (लालची) तबियत ने (रै) की सरदारी के आगे इस इंबरत नाक अंजाम की तरफ़ से आँखें फेर ली थीं।
गर्ज़ की क़ासिद उमरे साअद का ख़त लेकर बर्क रफतारी के साथ इब्ने ज़ेयाद की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और कहा जाता है कि इब्ने ज़ेयाद ने भी उमरे साअद की इस तजवीज़ को पसन्द किया और इसकी राय को मंजूर करना चाहा मगर शिमर मलऊन (का असल नाम शरजील बिन उमरू विन मोआविया बताया जाता है वह बनी आमिरा बिन साअसा में आले वहद क़लवी में से था (अखबारूल तवाल स २५३-२५४) जो इस मौके पर वहाँ मौजूद था बिगड़ गया और उसने तेवारियां चढ़ाते हुये इब्ने ज़ेयाद से कहाः- “ हुसैन (अ.) इस वक़्त तेरी मुठठी में हैं अगर वह बगैर बैयअत किये तेरे क़ब्ज़े से निकल गये तो फिर इन पर काबू पाना तेरे लिये नामुमकिन होगा। क्योंकि कूव्वत व इज़्ज़त हुसैन (अ.) के साथ होगी और आजेज़ी और कमज़ोरी तेरे साथ, बगैर बयअत लिये इन्तेहाई ज़िल्लत की बात और कमज़ोरी की अलामत है। उमरे साअद के इस ख़त का क्या ऐतबार, मैंने सुना है कि वह हुसैन (अ.) के लिये अपने दिल में नर्म गोशे रखता है और रातें इनके साथ बातों में गुज़रता है "। (तबरी ज ६ स २३५)।
शिमर की इस खुशामदाना और फितना परवर गुफतुगू ने इब्ने ज़ेयाद को इन्सानियत गुरूर व तकव्बुर और खुद सताई व खुद बीनी और खुद पैदा करके इसे शोला बना दिया। इब्ने ज़ेयाद उमरे साअद की तरफ से बदगुमानी में भी मुबतिला हुआ और शुकूक व शुबहात ने उमरे साअद की इस खैर ख़्वाहाना तहरीर पर जुल्म का पानी फेर दिया वह सोचने लगा कि क्या वजह है कि जंग के बजाय उमरे साअद हुसैन (अ.) से तखलिया में रात-रात भर बातें करता है ? और हमें धोका देने की कोशिश करता है। चुनानचे इसी दिमाग़ी उलझन और कशमाकश की हालत में उसने उमरे साअद के ख़त का जवाब तहरीर किया और उसमें लिखा किः- “मैंने तुम्हें मैदाने जंग में इसलिये नहीं भेजा कि तुम हुसैन (अ.) और इनके साथियों के साथ मराअत (रेआयत) व नर्मी अख़तियार करो, उन्हें ज़िन्दगी की उम्मीदें दिलाओ उनसे रातों में मसालेहाना बातें करो और उनकी सेफारिश में अपनी ज़बान खोलो। अगर हुसैन (अ.) और उनके असहाब अपने आपको मेरे रहम व करम पर छोड़ने को तैयार हैं तो उन्हें खामोशी से मेरे पास भेज दो और अगर इन्कार करें तो उन पर फौरन हमला करके उन्हें कत्ल कर दो। (अखबारूल तवाल प्रष्ठ २५३) और आज़ा कृता करके उनकी लाशों को पामाल कर दो। और अगर तुमसे यह मुमकिन न हो तो लश्कर की सरदारी से अलायहदा हो जाओ और अपना मनसब शिमर के सुपुर्द कर दो। हमने इसे मुकम्मल हिदायतें कर दी हैं और यह हुक्म दे दिया है कि अगर उमरे साअद हुकम की तामील में ताख़ीर करे तो वह माअजूल होगा और तुम उसकी जगह सरदारे लश्कर करार पाओगे, हुसैन (अ.) से जंग करोगे और उनका सर काट कर मेरे पास रवाना करोगे"। (तबरी भाग ६ प्रष्ठ २३६)।
यह ताजीली और तम्बीही हुक्म नामा लेकर शिमर मलऊन करबला की तरफ रवाना हुआ। इस हुक्म के बाद जंग का इल्तेवा गैर मुमकिन था क्योंकि उमरे साअद इस अमर से बखूबी वाकिफ था कि हुसैन (अ.) यज़ीद की बैयअत की या इब्ने ज़ेयाद की ऐताअत पर हरगिज़ राजी न होंगे इसलिये जब शिमर इब्ने ज़ेयाद के इस ख़त के साथ वारिदे करबला हुआ और उमरे साद ने ख़त पढ़ा तो पहले शिमर पर बरहम हुआ और इसकी सरन्जिश करते हुये इसने कहा कि कसम खुदा की यह सिर्फ तेरी ही हरकत है कि तूने इब्ने ज़ेयाद को वरगलाया और मेरे मशवेरों पर अम्ल करने से बाज़ रखा खुदा तुझे ग़ारत करे।
फिर उसने अपनी इज़तेराबी हालात पर काबू हासिल करते
हुये कहाः- “ खुदा की कसम हुसैन (अ.) कभी यज़ीद की बैयअत या इब्ने ज़ेयाद की ऐताअत पर अमादा न होंगे क्योंकि उनके पहलू में उनके बाप अली (अ.) का दिल है "।
शिमर ने कहाः- इन बातों को छोड़ो, अब यह बाताओ कि तुम क्या करोगे ? अपने अमीर इब्ने ज़ेयाद के हुक्म पर अम्ल करोगे या लश्कर की सरदारी मेरे सुपुर्द करोगे ?"
लालची कमज़ोर दिल और दुनियां पर जान देने वाला उमरे साअद अपनी हरीसाना (लालच) फितरत से मजबूर था क्योंकि आले रसूल (स.) और नवासे रसूल (स.) से ज़्यादह उसे रै की हुकूमत अज़ीज़ थी, लेहाज़ा उसने शिमर के सवाल पर ज़वाब दिया किः- मैं खुद इस मुहिम को सर करूंगा (अखवारूल तवाल प्रष्ठ २५३) अलबत्ता तुम्हें प्यादों का अफसर बनाये देता हूँ" (तबरी भाग ६ प्रष्ठ २५६) इस गुफतुगू के बाद उमरे साद ने उसी वक़्त हुसैन (अ.) पर हमले की तैयारी का हुक्म जारी कर दिया और नवीं माहे मोहर्रम (पन्चशम्बा) की शाम न होने पायी थी कि हुसैन (अ.) पर अचानक हमला कर दिया गया नमाज़े ज़ोहरैन से फरागत के बाद इमाम आली मकाम अपने खैमें के दर पर तलवार का सहारा लिये घुटनों पर सर रखे बैठे थे और आपकी आख लग गयी थी।
जब घोड़ों की टापों और यज़ीदी फौजों के शोरगुल की आवाज़ जनाबे जैनब (स.) के कानों में पहुँची तो घबरा कर आप दरे हौमा पर आयीं और इमाम (अ.) को मुखातिब करके फरमाया, भय्या । दुश्मनों की आवज़ें बहुत नज़दीक से आ रही हैं, शायद हम पर हमला कर दिया गया है इमाम (अ.) ने हज़रते जैनब (स.) की आवाज़ सुनकर सर उठाया और फरमाया ऐ बहन । अभी मैंने अपने नाना हज़रत रसूले खुदा (स.) को ख़्वाब में देखा है, वह मुझसे फरमा रहे हैं कि तुम अनकरीब हमारे पास आना चाहते हो।
एक तरफ दुश्मनों की यूरिश, दूसरी तरफ इमाम (अ.) का यह ख़्वाब- जनाबे जैनब (स.) बेचैन हो गयीं। आपकी ज़बान पर वा हुसैना, वा मोहम्मदा का नारा गिरयो ज़ारी के दरमियान बुलन्द हुआ। इमाम बहन को तसल्ली दे रहे थे कि हज़रत अबुल फज़लिल अब्बास (अ.) ने आकर इत्तेला दी की दुश्मनों की फौजों ने चढ़ाई कर दी है। और अमादह पैकार हैं। इमाम (अ.) ने फरमाया कि उनके पास जाकर सबब मालूम करो कि यह अचानक हमला क्यों किया गया ?
हज़रत अब्बास (अ.) ने हुक्म की तामील की दुश्मनों की तरफ से जवाब मिला कि इब्ने ज़ेयाद का हुक्म आया है कि अगर हुसैन (अ.) यज़ीद की बैयअत और इताअत कुबूल न करें तो उन्हें कुत्ल कर दिया जाय।
हज़रत अब्बास (अ.) सितम गरों की गुफतुगू सुनकर हुसैन (अ.) की खिदमत में हाज़िर हुये और वाकेए की कैफियत से इमाम आली मुकाम को आगह किया। इस तरह आपकी की तेवरियों पर बल पड़े थे और चेहरे से जलाल आशंकार था।
इमाम हुसैन (अ.) अपने शेर दिल भाई के गैज़ व ग़ज़ब को ताड़ गये जैनब की तरफ इशारा किया, बिन्ते ज़हरा (स.) आगे बढ़ीं और भाई के गुस्से को फरो (समाप्त) किया जब शेर का मिजाज़ ऐतदाल पर आया तो इमाम ने फरमाया, भय्या अगर मुमकिन हो सके तो उमरे साद से एक शब की मोहलत हासिल करो ताकि आज की रात हम इबादते इलाही में बसर कर सकें।
🔹हज़रते अब्बास (अ.) दुश्मनों की सफ में दिलेराना दाखिल हुये और हुक्मे इमाम के मुताबिक आपने एक रात की मोहलत तलब की (तबरी भाग ६ प्रष्ठ २६७) उमरे साअद, शिमर की जानिब मुतवज्जे हुआ और उसने पूछा कि इस बारे में तुम्हारी क्या राय है ? शिमर ने जवाब दिया, आप अफसर हैं जैसा मुनासिब समझें।
शिमर का यह जवाब तंज़ पर मबनी था इसलिये उमरे साआद ने दूसरे सरदारों से भी मशवरा लिया उमर बिन हेजाज़ ज़बीदी ने कहा के हुसैन (अ.) तो रसूल (स.) के नवासे हैं। अगर कोई शख़्स कबीला तुर्क व वेलम से भी होता और तुमसे इस मराअत का तलब गार होता तो तुम पर लाज़िम था कि तुम उसे यह मराअत देते। कैस बिन असास ने भी यही कहा की मोहलत दी जानी चाहिये. (तबरी भाग. ६ प्रष्ठ २६८) आखिर कार मोहलत दी गई और हज़रत अब्बास (अ.) उमरे साअद के एक नुमाइन्दे को लेकर इमाम की खिदमत में हाज़िर हुये उमरे साअद के नुमाइन्दे ने कहा कि अगर कल तक आपने बयअत न की तो जंग यक़ीनन होगी।
📚 तारीख़े कर्बला, अल्लामा फ़रोग़ काज़मी
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