हज़रते ज़ुहैर इब्ने कै़न अलैहिस्सलाम

⭕ हज़रते ज़ुहैर इब्ने कै़न अलैहिस्सलाम की तक़रीर

इमाम हुसैन (अ.) का ख़ुत्बा तमाम हुआ तो ज़ुहैर इब्ने कै़न जिनका शुमार उस्मानी गिरोह में था और वह मक्का से करबला के रास्ते में इमाम (अ.) के साथ हो गये थे, आगे बढ़े और उन्होंने कूफा व शाम के काज़िबों को ललकराते हुये कहाः- “ ऐ कूफा व शाम के गद्दारों ! अज़ाबे इलाही से डरो और ख़ौफ़ खाओ। अपनी जेहालत और शैतनत से इस्लामी रिशतऐ अखूवत को न तोड़ो। जब तक हमारे और तुम्हारे दरमियान तलवार नहीं चलती उस वक़्त तक यह रिश्ता क़ायम है और जब यह तलवार चलेगी तो यह खुद ब खुद टूट जायेंगे।

मैं तुम्हें आगाह करता हूँ कि परवरदिग़ार ने अपने नबी मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.) की औलाद इमाम हुसैन (अ.) के ज़रिये हमें अज़माईश में डाला है और वह यह देखना चाहता है कि हम उनके साथ क्या सुलूक करते हैं। अल्लाह ज़ालिमों को पसन्द नहीं करता। ख़ुदा के लिये इब्ने ज़ेयाद का साथ छोड़कर नवासए रसूल (स.) की मदद पर कमर बस्ता हो जाओ यकीन मानों की यज़ीद और इब्ने ज़ेयाद वगैरह का शुमार ज़ालमीन में है। यह लोग तुम्हारे साथ हमदर्दी का बरताव या बेहतरी का सुलूक नहीं कर सकते मैं तुम्हें आगाह करता हूँ कि यह वही लोग हैं जो तुम्हारे हाथ पाँव कटवाते, तुम्हें सूलियाँ दिलवाते, तुम्हारी आँखो में गर्म सलाखे चलवाते रहे हैं और यही वह लोग हैं जिन्होंने हाफ़िज़े क़ुरान हुजर इब्ने अदी उनके साथियों और हानी बिन अरवाह ऐसे बा कमाल अशखास का क़त्ल किया है। 📚(तबरी भाग 3 स243) ज़ुहैर इब्ने कै़न की इस इब्तेदाई तक़रीर का हक़ीक़त पसन्दाना ओर तल्ख़ लहज़ा इब्ने ज़ेयाद के हवा ख़्वाहों और खुशामदियों के लिये नाक़ाबिले बर्दाश्त साबित हुआ चुनानचे सफ़े मुख़ालिफ़ में कुछ लोगों ने ज़ुहैर की मज़म्मत करते हुये कहाः-

हम जब तक तुम्हें और तुम्हारे सरदार को क़त्ल नहीं कर लेंगे उस वक़्त तक दम नहीं लेंगे"।

इस गर्म गुफतारी के बावजूद जुहैर न तो खामोश हुये और न किसी खातिर में लाये बल्कि उन्होंने तकरीर को जारी रखा यहाँ तक शिमर मलऊन ने मदाखलत करते हुये तीर का एक वार किया और कहाः- “ खुदा तेरी ज़बान बन्द करे, बस अब खामोश हो जा"। जुहैर खामोश होने के बजाय शिमर से मुखातिब हुये और ऑपने दिल खोलकर उसकी मज़म्मत की। यहाँ तक कि शिमर ने झुंझलाहट में चीख कर कहाः- “ ज़रा देर में तू और तेरा सरदार क़त्ल हुआ चाहते है" जुहैर ने अपनी कुब्वते ईमानी को मुजतमा करके बे जिगरी के साथ जवाब दिया :- " बेवकूफ ! तू मुझे मौत से डराता है। खुदा की कसम नवासए रसूल (स.) की नुसरत में जान देना तेरे साथ अबदी ज़िन्दगी से कहीं बेहतर है "।

फिर जुहैर ने लश्कर को मुखातिब किया और कहाः- “ ऐ अल्लाह के बन्दों ! इन कमीनों के दामे फरेब में न आओ खुदा की कसम इन्हें रसूल (स.) की शफाअत कभी नसीब न होगी। यकीनन जिनकी गर्दनों पर औलादे रसूल का ख़ूने नाहक होगा वह जहन्नुम के हकदार होंगे "।

इमाम (अ.) ने जब यह देखा कि जुहैर की बातों का जवाब तीरों से दिया जा रहा है तो आपने फरमाया :- " जुहैर ! बस अब वापस आ जाओ, अगर मोमिन आले फिरऔन ने अपनी गुमराह कौम को नसीहत करके अपने फर्ज को पूरा कर दिया था तो यकीनन तुम भी अपना फर्ज पूरा कर चुके हो। यह लोग वह हैं जिन पर नसीहत या तबलीग़ का कोई असर नहीं हो सकता" (📚तबरी भाग ६ प्रष्ठ २४३-२४४)।

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