हज़रते जौन अलैहिस्सलाम

⭕हज़रत जौन गुलामे अबुज़र गफ़्फ़ारी की शहादत

ज़ुहैर इब्ने कै़न की शहादत के बाद अबु समामा साईदी, हेज़ाज बिन मसरूक, यहीया इब्ने कसीर, ख़ताला इब्ने साअद अब्दुलरहमान बिन हन्ज़ला और उमरू बिन करतता सफे हुसैनी से निकल कर मैदान में आये और एक अन्दाज़े के मुताबिक उन्होंने मजमुई तौर पर तकरीबन २६५ मुखालफीन को कत्ल किया और दर्जए शहादत पर फायज़ हुये।

इन शहादतों के बाद हज़रते जौन गुलाम अबुज़र गफ़्फ़ारी इमाम की ख़िदमत में हाज़िर हुये और उन्होंने मैदाने कारज़ार की इजाज़त चाही। इमाम (अ.) ने इस ज़ईफ, सिन रसीदह और क़दीम जॉनिसार को इजाज़त दी। जौन ने मआरका कार ज़ार में दिलेरी और शुजाअत के ज़ौहर दिखाये और बहुत से दुश्मनों को फिन्नार (जहन्नम भेज) करके दर्जेए शहादत पर फायज हुये। इमाम (अ) जिस घड़ी जौन के सिरहाने पहुँच उस वक़्त जान बाकी थी और अबुज़र का यह वफादार गुलाम अपनी बंद आँखों से बेहिश्त के नज़ारे कर रहा था। इमाम (अ.) ने जौन के खून आलूद चेहरे को देखा और फरमायाः- “ अगर कोई ख़्वाहिश है तो ब्यान करो "

जौन ने आँख खोल दी और कहा:-" या इब्ने रसूल (स.) मैंने तमाम उमर राहत और नेअमत के दरमियान आपकी ख़िदमत में गुज़ारी है और आज मुझे इस बात का ऐहसास है कि मेरे जिस्म से बदबू आती है मेरा हसब व नसब मजहूल और मेरा रंग स्याह है। मुझे रसूले ख़ुदा के सामने जाने में कमतरी का एहसास होगा। लेहाज़ा मैं चाहता हूँ कि आप मेरे लिये दुआ फ़रमायें कि ख़ुदा मेरे चेहरे को नूरानी कर दे और मेरे जिस्म की बदबू को खुशबू में तबदील कर दे"।

यह कहकर जौन ने आँख बन्द कर ली और दर्जेए शहादत पर फायज़ हो गये। इमाम (अ.) ने जौन की मय्यत के सरहाने खड़े होकर फ़रमायाः- “ परवरदिगार ! इसके चेहरे को रौशन कर और इसके जिस्म को खुशबू अता कर, और इसे इस गिरोह के साथ महशूर कर जो मेरे नाना मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.) की पूरी माअरफ़त रखता हो "।

इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.) ने अपने वालिदे बुजुर्ग वार इमाम जैनुल आबदीन (अ.) से रेवायत की है कि जब शुहदाये करबला की तदफीन अम्ल में लायी गई तो उसके जिस्म से मुश्क व अम्बर की खुशबू आ रही थी।

जौन की शहादत के बाद मौत का बाज़ार तेज़ी से गर्म था। अन्सार व असहाब हुसैन (अ.) में जो लोग बाकी रह गये थे वह इस अम्र में कोशाँ थे कि पहले हम अपनी जान फरज़न्दे रसूल पर कुर्बान करें। चुनानचे इमाम हुसैन (अ.) का एक तुर्की गुलाम जब अपनी जान कुर्बान कर चुका तो बिलतरतीब अनस बिन हारिस, हेज्ज़ाज बिन मसरूक, ज़ेयाद बिन अरीब और सालिम बिन उमरू वगैरह ने अपनी जानें कुर्बान कीं और सफे शोहदा में शामिल हुये।

असहाब व अन्सार की शहादत के बाद अब अफराद खानदान बनी हाशिम की बारी थी। अगर हकीकत थी नज़रों से देखा जाय तो असहाब की वफादारी और जान निसारी का ये एक हैरत अंगेज़ कारनामा था कि जब तक इनमें तो एक शख़्स भी मौजूद रहा, खानवादहे रेसालत की किसी फर्द के जिस्म पर एक खराश तक नहीं आने पाई हालाँकि इस दरमियान जंग मगलूबा भी हुई नैज़े भी चले, तलवारों की झकांर भी गौंजी (गूँजी) और तीरों की बारिश भी हुई मगर इन तमाम मआरको आराइयों के बावजूद एक एक हाशमी बच्चा महफूज़ रहा।

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