हज़रते हुर अलैहिस्सलाम कौन थे?
🌐 हज़रते हुर्र इब्ने यज़ीदे अर-रियाही अलैहिस्सलाम
आप का नामे नामी और इस्मे गिरामी हुर्र इब्ने यज़ीद इब्ने नाजीया इब्ने अनब इब्ने इताब इब्ने हुरमी इब्ने रिया इब्ने यरबू इब्ने खन्ज़ला इब्ने मालिक इब्ने ज़ैदमना इब्ने तमीम अल यरबूई अर रियाही था।
आप अपने हर अहदे हयात में शरीफे कौम थे। आप के बाप दादा की शराफत मुसलेमात से थी पैग़म्बरे इस्लाम के मशहूर सहाबी ज़ैद इब्ने उमर इब्ने कैसे इब्ने इताब जो (अहवज़) के नाम से मशहूर थे और शायरी में बा-कमाल माने जाते थे वो आप के चचा ज़ाद भाई और आप के ख़ानदान के चश्मों चराग़ थे।
हज़रते हुर्र का शुमार कुफे के रइसों में था। इब्ने ज़ियाद ने जब आप को एक हज़ार के लश्कर समैत इमाम हुसैन (अलै०) से मुकाबेला करने के लिये भेजा था उस वक़्त आप को एक गैबी रिश्ते ने जन्नत की बशारत दी थी। जनाबे हुर्र का लश्कर मैदान मारता हुआ जब मकामे "शराफ्" पर पहुँचा और इमाम हुसैन (अलै०) के काफिले को देखकर दौड़ा तो तमाज़ते आफताब और रास्ते की दोश ने प्यास से बेहाल कर दिया था। मौला की ख़िदमत में पहुँच कर जनाबे हुर्र ने पानी का सवाल किया। साक्रिये कौसर के फ़र्ज़न्द ने सेराबी का हुक्म दे कर आने की गरज़ पूछी, उन्होनें अर्ज की, मौला ! आप की पेश-क़दमी रोकने और आप का मुहासिरा करने के लिये हमको भेजा गया है। पानी पिलाने से फागत के बाद इमाम हुसैन (अलै०) ने नमाज़े ज़ोहर अदा फ्रमाई। हुर ने भी साथ ही नमाज़ पढ़ी। फिर नमाज़े अस्र पढ़ कर हज़रत इमाम हुसैन (अलै०) ने कूच कर दिया। हुर्र अपने लश्कर समेत काफिला-ऐ-हुसैनी से कदम मिलाये हुये चल रहे थे और किसी-किसी मक़ाम पर हज़रत की ख़िदमत में मौत का हवाला देते थे। मक़सद ये था कि यज़ीद की बैअत करके अपने को हलाकत से बचा लीजिये आप इस के जवाब में इरशाद फ़रमाते थे "हक पर जान देना हमारी आदत है" रास्ते में ब-मकामे अज़ीब तरमाह इब्ने अदी अपने चार साथियों समेत इमाम हुसैन (अलै०) से आ मिले। हुर्र ने कहा ये आप के हमराही नही है इस वक़्त कूफ़े से आ रहे है ये...... मैं इन्हे आप के हम-रकाब रहने न दूँगा आप ने फ्रमाया तुम अपने मुआहदे से हट रहे हो। सुनो ! अगर तुम अपने मुआहदे के ख़िलाफ इब्ने ज़्यिाद के हुक्म पहुँचने से पहले हम से कोई मुज़ाहेमत की तो फिर हम तुम से जंग करेंगे। ये सुन कर हुर्र खामोश हो गए और काफिला आगे बढ़ गया। “को बनी मुक़ातिल पर मालिक इब्ने नसर नामी एक शख्स ने हुर्र को इब्ने ज़ियाद का हुक्मनामा दिया जिस में मरकूम था कि जिस जगह मेरा यह ख़त तुम्हें मिलें उसी मक़ाम पर इमाम हुसैन अलै० को ठहरा देना। और उस अम्र का ख़ास ख़्याल रखना कि जहाँ वो ठहरें वहाँ पानी और सब्ज़ी का नामो निशान तक न हो इस हुक्म को पाते ही हुर्र ने आप को रोकना चाहा। आप तरमाह इब्ने अदी के मशविरे से आगे बढ़े और दो मोहरम यौमे पंजशम्बा ब-मकामे करबला जा पहुँचे हुर्र ने आपको बे-ग्याह जंगल में पानी से बहुत दूर ठहराया और इस अर्म की कोशिश की कि हुक्मे इब्ने ज़्याद ने फर्क न आने पाये। (१)
दूसरी मोहरम तक ज़मीने करबला पर हुर्रे रियाही इब्ने ज़ियाद और इब्ने संअद के हर हुक्म की तकमील क़रते रहे और हालात का जायज़ा लेते रहे। सुबहे आशूर आप इस नतीजे पर पहुँचे कि जन्नत व दोज़ख को का फैसला कर लेना चाहिये।
चुनान्चें आप इन्तेहाई तरद्दुद व तफ़कुकर में इब्ने सअद के पास गये और पूछा कि क्या वाकई इमाम हुसैन (अलै०) से जंग की जाये ? इब्ने सअद ने जवाब दिया बे-शक तन फड़केगें, सर बरसेगें, और कोई भी हुसैन और उनके साथियों में से न बचेगा।
ये सुन कर हुर्र ख़ामोशी के साथ आहिस्ता-आहिस्ता इमाम हुसैन (अलै०) के लश्कर की तरफ बढ़ने लगे यहाँ तक कि इमाम हुसैन (अलै०) की ख़िदमत में आ पहुँचे। बनी हाशिम ने इस्तेक़बाल किया। इमाम हुसैन अलै०ने सीने से लगाया। हुर्र ने अर्ज़ की, मौला ! ख़ता मुआफ मेरे पदरे नामदार ने आज शब को ख़्वाब में मुझे हिदायत की है कि मैं शरफे कदम बोसी हासिल कर के दरजा-ए-शहादत पर फाऐज़ हो जाऊँ। मौला ! मैं ने ही सब से पहले हुजूर को रोका था। अब सब से पहले हुजूर पर कुर्बान हो जाना चाहता हूँ।
{(१) मुअर्ररखीन का कहना है कि इब्ने ज़ियाद और उमरे सअद को हुर्र पर बड़ा ऐतेमाद था इसीलिये सब से पहले उन्ही को रवाना किया था और फिर यौमे आशूर लश्कर की तक्सीम के मौके पर भी उन्हें लश्कर के चौथाई हिस्से पर जो कबीला -ए-तमीम व हमदान पर मुश्तमिल था। सरदार कार दिया था।}
इज़्ने जिहाद दिजिये ताकि गर्दन कटाकर बारगाहे रिसालत में सुर्ख-रू हो सकूं।
इमाम हुसैन अलै० ने इजाजत दी. जनाबे हुर्र मैदान में तशरीफ लाये और दुश्मनों को मुखातिब करके कहा।
* ऎ दुश्मने इस्लाम शर्म करो अरे तुमने नवासे रसूले को खत लिखकर बुलाया। उन की नुसरत व हिमायत का वायदा किया और खुतूत में ऐसी बातें तहरीर कि के हुजूर को शरअन तामील करना पड़ी और वह जब तुम्हारे दावत नामों पर भरोसा कर के आ गयें हैं तो तुम उन पर मज़ालिम के पहाड़ तोड़ रहे हो उन्हे चारों तरफ से घेरा हुआ है और उन के लिये पानी की बन्दिश कर दी है।"
ऐ ज़ालिमों ! सोचो यहूदो नसारा पानी पी रहे हैं और हर किस्म के जानवर पानी में लोट रहे हैं लेकिन आले मोहम्मद एक-एक कतरा-ए-आब के लिये तरस रहे हैं। अरे तुमने मोहम्मद कि आल के साथ कितना बुरा सुलूक रवा रखा है।
जनाबे हुर की बात अभी ख़त्म न होने पाई थी कि तीरों की बारिश शुरू हो गई आप ज़ख़्मी हो कर इमाम हुसैन अलै० कि ख़िदमत में हाज़िर हुऐ और अर्ज की, मौला अब आप मुझसे खुश हो गये इमाम हुसैन अलै० ने दुआ दी और फरमाया" ऐ हुर्र । फरदा अज़ अतिशी दोज़ख आज़ाद ख्वाही वूद। तू फरदा-ए-क़यामत में अतिशे जहन्नम से आज़ाद हो गया।
इसके बाद जनाबे हुर्र फिर मैदान में तशरीफ लाऐ और निहायत बे-जिगरी से नबर्द आज़माँ हुऐ और आप ने पचास दुश्मनो को तहे तेग कर दिया दौराने जंग में अय्यूब इब्ने मशरा ने एक पैसा तीर मारा जो जनाबे हुर्र के घोड़े के पीठ में लगा और आपका घोड़ा बे-काबू हो गया आप प्यादा हो कर लड़ने लगे नागाह आप का नैज़ा टूट गया और आपने तलवार संभाली अलमदारे लश्कर को आप कत्ल करना ही चाहते थे कि दुश्मनों ने चारो तरफ से शदीद हमला कर दिया। बिल आख़िर कसूर लई इब्ने कुनाना ने सीना-ऐ-हुर्र पर एक ज़बरदस्त तीर मारा जिसके सदमे से आप ज़मीन पर गिर पड़े और इमाम हुसैन अलै० को आवाज दी मौला ख़बर लीजिये ! इमाम हुसैन अलै० जनाबे हुर्र की आवज़ पर मैदाने जंग में पहुँचे और देखा जाँ-निसार ऐडियाँ रगड़ रहा है। आप उसके करीब गये और आपने उनके सर को अपनी आगोश में उठा लिया। जनाबे हुर्र ने आँखें खोल कर चेहरा-ए-इमामत पर निगाह की और इमाम हुसैन अलै० को बेबसी के आलम में छोड़ कर जन्नत का रास्ता लिया।
रियाजे शहादत में है कि आप को सब शोहदा की तदफीन के मौके पर बनी असद ने इमाम हुसैन अलै० से एक प्रसख के फासले पर ग्रबी जानिब दफ्न किया और वही पर आप का रौज़ा बना हुआ है।
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