हज़रते अब्बास अलैहिस्सलाम का अपने भाईयों से ख़ेताब
⭕तारीखों से पता चलता है कि हज़रत अब्बास अलमबरदार ने अपने सब भाईयों को शहादत से पहले जमा किया और जब सब इकट्ठा हो गये तो आपने फ़रमाया :-
" ऐ मेरे भाईयों ! अब वह वक्त आ पहुंचा है कि तुम लोग भी मैदाने कताल में कदम रखो और ऐसी जंग करो कि मैं अपनी आखो से देख लूँ कि तुमने खुदा और रसूल की राह में अपनी जानें कुर्बान कर वीं। देखो, आज के दिन जान देने से गुरेज़ का महल नहीं है, लेहाज़ा उजलत करो और शर्फे शहादत हासिल करके बारगाहे रिसालत में सुर खुरू हो जाओ।
हज़रते अब्बास (अ) ने अपने बेटों और भाईयों की शहादत को अपनी शहादत पर मुकददम क्यों समझा ? इस जैल में साहब मुनाफउल अबरार का कहना है कि मुमकिन है इस ख़्याल के तहत ऐसा किया हो कि कारे खैर में जल्दी करना चाहिऐ इस लिये कि शैतान गैर मासूम को बहका कर अमरे खैर से बाज़ भी रख सकता है। लेकिन मौलाना सय्यद नजमुल हसन साहब करारवी ने अपनी किताब जिकरूल अबास में अपनी राय का इज़हार फरमाया है वह ज़्यादह करीने क़्यास है। आप फरमाते हैं:- " हज़रत अब्बास (अ) ने अपने से इसलिये मुकददम रखा कि मेरी शहादत उनकी नज़रों के सामने न हो। क्योंकि कहीं ऐसा न हो कि मेरे मरने से इनकी हिम्मत टूट जाय और वह शर्फे शहादत से महरूम रह जायें और इमाम (अ) की बदनामी हो कि इनके लश्कर में ऐसे लोग भी थे जो जान बचाने की खातिर मैदाने कारज़ार में नहीं आये "
(जिकरूल अब्बास प्रष्ठ २५३)
राजा सर किशन प्रशाद सदरे आज़म हुकूमते हैदाराबाद अपने रेसाला शहीदे करबला तबआ लखनऊ १३५८ हिज़री के प्रष्ठ १० में लिखते हैं:- " हज़रत अब्बास शहादत के लिये रास्ता बना रहे थे। वह जानते थे कि अलमदारी का ओहदह इमाम (अ) को जेहाद की उस वक़्त तक इजाज़त नहीं देने पर मजबूर न करेगा जब तक कोई तलवार उठाने वाला बाकी रहेगा।
यानी हज़रत अब्बास (अ) ने अपने भाईयों को जंग के लिये उभार कर इसलिये जल्द से जल्द शहीद कर दिया ताकि (खुद) उन्हें हौसला शहादत पूरा करने का मौका मिल जाय क्योंकि जब तक कोई भी बाकी रहेगा अलमदारे लशकर को दरजये शहादत पर फायज़ होने का मौका न मिलेगा "।
(बे शुक्रिया जिकऊल अब्बास प्रष्ठ २५३)।
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