ईदे ग़दीर 14 सितारे में

⭕असहाब का तारीख़ी इजमाअ और तबलीग़े रिसालत स० की आख़िरी मन्ज़िल हज़रत अली अ० की ख़िलाफत का ऐलान

यह एक मुसल्लिमा हकीकत है कि खल्लाके आलम ने इन्तेख़ाबे खिलाफ़त को अपने लिये मख़सूस रखा है और इस में लोगों का दस्तरस नही होने दिया। फ़रमाया है। रब्बुका यख़लुको मा यशाओ व यख़तारो मा काना लहुमुल ख़ियरा सुब्हानल्लाहे तआला अम्मा युशरिकून "तुम्हारा रब ही पैंदा करता है और जिस को चाहता है। (नुबूव्वत व ख़िलाफत) के लिये मुनतख़ब करता है।" याद रहे कि इन्सान को न इन्तेख़ाब का कोई हक़ है और न वह इस में ख़ुदा के शरीक हो सकते हैं (प 20। रूकू 10)। यही वजह है कि उसने अपने तमाम खुलफ़ा आदम से खातम तक खुद मुकर्रर किये हैं और उनका ऐलान अपने नबियों के ज़रिये से कराया है। (📚रौज़तुस सफ़ा, तारीख़े कामिल, तारीख़ इब्ने अलवरदी, अराएस सालबी वगैरा और इस में तमाम अम्बिया के किरदार की मुवाफेक्त का इतना लेहाज़ रखा है। कि तारीख़े ऐलान तक में फ़क्र नही आने दिया। अल्लामा बहाई व अल्लामा मज्लिसी लिखते हैं कि तमाम अम्बिया ने खिलाफ़त का ऐलान 18 ज़िल-हिज्जा को किया है। (📚जामए अब्बासी व . एखतियाराते. मजलिसी) मोवरेखीन का इत्तेफ़ाक है कि आंहज़रत सअवव ने हुज्जतुल विदा के मौके पर 18 ज़िल-हिज्जा को बंमकाम ग़दीरे ख़ुम हुक्मे खु़दा से हज़रत अली अहैहिस्सलाम के जानशीन होने का ऐलान फ़रमाया है।

🔹हुज्जतुल विदा : हज़रत रसूले करीम स० 25 ज़ीकादा सन 10 हिजरी को हज्जे आख़िर के इरादे से रवाना होकर 4 ज़िल-हिज्जा को मक्के पहुँचे। आप के हमराह आप की तमाम बीबिया और हज़रत सय्यदा सलामुल्लाहे अलैहा थी। रवानगी के वक़्त हज़ारों सहाबा साथ रवाना हुए और बहुत से मक्के में ही जा मिले। इस तरह आप के असहाब की तादाद एक लाख चौबीस हज़ार हो गयी। हज़रत अली अ० यमन से मक्के पहुँचें। हुज़ूर सअवव ने फ़रमाया  तुम कुरबानी और मनासिके हज में मेरे शरीक हो। इस हज के मौके पर लोगों ने अपनी आँखो से आंहज़रत सअवव को मनासिके हज अदा करते हुए देखा और मारेकतुल आरा ख़ुत्बे सुने। जिन में बाज़ बातें यह थी। 1. जाहिलयत के ज़माने के दस्तूर कुचल डालने के क़ाबिल हैं। 2. अरबी को अजमी और अजमी को अरबी पर कोई फ़ज़ीलत नही। 3. मुसलमान एक दूसरे के भाई हैं। 4. गुलामों का ख़्याल ज़रूरी है। 5. जाहिलयत के तमाम खून माफ कर दिये गये।⭕6. जाहिलयत के तमाम वाजिबुल अदा सूद बातिल कर दिये गये।

गरज कि हज से फ़राग़त के बाद आप मदीना के इरादे से 14 ज़िलहिज्जा को रवाना हुए। एक लाख चौबीस हज़ार असहाब आप के हमराह थे हुजफा के करीब मकामे ग़दीर पर पहुंचे ही थे आयते बल्लिग़ का नुज़ूल हुआ आप ने पालाने शुतुर का मिम्बर बनाया और बिलाल रज़ी० को हुक्म दिया कि 'हय्या अला खैरिल अमल" कह कर आवाज़ दें मजमा सिमट कर नुक्ताए एतेदाल पर आगया। आप स० ने एक फ़सीह व बलीग़ ख़ुत्बा फ़रमाया जिसमे हम्द व सना के बाद अपनी फ़ज़ीलत का इक़रार लिया और फ़रमाया कि मैं तुम मे दो गिराकद्र चीज़े छोड़े जाता हूँ। एक क़ुरान दुसरे अहलेबैत इसके बाद अली अ० को अपने नज़दीक बुलाकर दोनो हाथो से उठाया और इतना बलन्द किया कि सफेदी-ए-ज़ेरे बगल जाहिर होगयी फिर फ़रमाया 'मनकुनतो मौलाहो फा हाज़ा अलीयुन मौला" जिस का मैं मौला हूँ उस का यह अली अ० भी मौला है। ख़ुदाया अली अ० जिधर मुड़े हक़ को उसी तरफ़ मोड़ देना। फिर अली अ० के सिर पर सियाह अमामा बाँधा, लोगो ने मुबारकबादियाँ देना शुरू की। सब आप के जानशीनी से मसरूर हुए। ह० उमर ने भी नुमाया अलफाज़ में मुबारकबाद दी जिबराईल ने भी बज़बाने कुरआन इकमाले दीन और इतमामे नेमत का मुज़दा सुनाया सीरतुल हलबिया में है कि यह जानशीनी 18 ज़िलहिज्जा को वाके हुइ है नूरूल अबसार सफा 78 में हैं कि एक शख़्स हारिस बिन नोमान फहरी ने हज़रत के अमले ग़दीरे ख़ुम पर ऐंतेराज़ किया तो उसी वक़्त आसमान से उस पर एक पत्थर गिरा और वह मर गया।

वाज़ेह हो कि इस वाक्ये ग़दीरे खु़म को इमामुल मोहदेसीन हाफिज़ इब्ने अब्दा ने एक सौ सहाबा से इस हदीसे ग़दीर की रवायत की है। इमाम जज़री व शाफयी ने 80 अस्सी सहाबियों से अहमद बिन हमबल ने 30 सहाबियों से और तबरी ने 75 सहाबियों से सवायत की है अलावा इस के तमाम अकाबिरे इस्लाम मसलन जहबी, सनआई और अली अलकारी वगैरा इसे मशहूर और मुतावातिर मानते है महजुल वुसूल सिद्दीक हसन सफा 13, तफसीरे सआलबी फतहुल बयान सिद्दीक हसन जिल्द 1 सफ़ा 48 |

♦️जनशीन बनाने का हक़ सिर्फ ख़ुदा को है

क़ुरआने मजीद के पारा 20 रूकू 7/10 में ब-सराहत मौजूद है कि ख़लीफ़ा और जा-नशीन बनाने का हक़ सिर्फ़ ख़ुदा वन्दे करीम को है। यही वजह है कि उस ने तमाम अम्बियां का तक़रूर ख़ुद किया और उनके जा-नशीन को ख़ुद मुक़र्रर कराया। अपने किसी नबी तक को यह हक़ नहीं दिया कि वह ब-तौरे ख़ुद अपना जा-नशीन मुकर्रर कर दे। चे जाये कि उम्मत को इख़्तेयार देना कि इजमा से काम लेकर मनसबे इलाहिया पर किसी को फाएज़ करदें और यह हो भी नहीं सकता था। क्योंकि तमाम उम्मत ख़ताकार है और ख़ताकारों का इजमा न सवाब बन सकता है और न खातियों का मजमूआ मासूम हो सकता है। और जा-नशीने रसूल का मासूम होना इस लिये ज़रूरी है कि रसूल स० मासूम थे। यही वजह है कि ख़ुदा ने रसूले करीम स० का जा-नशीन हज़रत, अली अ० और उनकी ग्यारह औलाद को मुक़र्रर फ़रमाया। (📚यनाबीउल मुवद्दत सफा 93) जिसका संगे बुनियाद दावते जुलअशीरा के मौके पर रखा और आयते विलायत और वाकए तबूक (📚सहीह मुस्लिम जिल्द 2 सफा 272) से इसतहकाम पैदा किया फिर "इज़ा फगता फन्सब से हुक्म के निफाज़ का फ़रमान जारी फ़रमाया और आयते बल्लिग़ के ज़रिये से एलाने आम का हुक्म नाफिज़ फ़रमाया। चुनांचे रसूले करीम स० ने यौमे जुमा 18 ज़िलहिज्जा सन 10 हिजरी को बमुकाम ग़दीरे ख़ुम एक लाख चौबीस हज़ार असहाब की मौजूदगी में हज़रत अली अ० की खिलाफ़त का एलाने आम फ़रमाया। रौज़तुस्सफा जिल्द 2 सफा 215 में है कि मजमें को एक मरकज़ पर जमा करने के लिये जो एलान हुआ था वह "हय्या अला ख़ैरिल अमल के ज़रिये से हुआ था। किताब तवारीख़ व अ-हदीस में मौजूद है कि इस एलान पर उमर ने भी मुबारकबाद दी थी। जिसकी तफ़्सील बाब 1 में गुज़री।

⭕18 ज़िलहिज्जा
अल्लामा जलालुद्दीन सिवती ने लिखा है कि हज़रत उमर ने इस तारीख़ को यौमे ईद क़रार दिया है रईसुल उलमा हज़रत अल्लामा बहाउद्दीन आमली तहरीर फ़रमाते हैं कि सरकारे आलम की विलादत से 4 साल बाद 18 ज़िलहिज्जा सन 10 हिजरी को हजरत अली अ० की जा-नशीनी अमल में आई और आप के इमाम-उन-नास वल जिन्न होने का एलान किया गया। और इसी तारीख़ सन 34 हिजरी में उस्मान क़त्ल हुए और हज़रत अली अ० की बैयत की गई इसी तारीख़ हज़रत मूसा अ० साहिरों पर ग़ालिब आये। और हज़रत इब्राहीम को आग से निजात मिली और इसी तारीख़ को हज़रत मूसा अ० ने जनाबे यूशा इब्ने नून को हज़रत सुलेमान ने जनाबे आसिफ इब्ने बरख़िया को अपना जा-नशीन मुक़र्रर किया और इसी तारीख़ को तमाम अम्बिया ने अपने जा-नशीन मुक़र्रर फ़रमाये। (📚जामए अब्बासी या नज़्द दबाबी सफा 58 तबा देहली सन 1914 ई. व इख़तेयारात मजलिसी रहमतुल्लाह)

♻️दस्तावेज़-ए-खिलाफत

सरवरे काएनात अलैहिस्सलाम ने इबतेदा-ए-इस्लाम से लेकर ज़िन्दगी के आख़िरी अय्याम तक हज़रत अली अ० की जा--नशीनी का बार बार मुखतलिफ अन्दाज़ व उनवान से एलान करने के बाद ब-वक़्ते वफात यह चाहा कि उसे दस्तावेज़ी शक्ल दे दें लेकिन हज़रत उमर ने बनी बनाई इस्कीम के मातहत रसूले करीम स० को कामयाब होने न दिया। और उनके आख़िरी फरमान (कलम व दवात की तलबी) को बकवास और हिज़यान से ताबीर करके उनहें मायूस कर दिया। जिसके मुताल्लिक आप का खुद बयान है कि जब आं-हज़रत स० ने अपने मरजुल मौत में हक को छोड़ कर बातिल की तरफ जाना चाहा ता कि अली अ० के नाम की सराहत करदें। तो खुदा की कसम मैने आं-हज़रत को मना कर दिया। और आं-हज़रत अली अ० के नाम को तहरीरन ज़ाहिर न कर सके। (तारीखे बगदाद व शरह इब्ने अबील हदीद जिल्द 1 तबा तेहरान)। इमाम गज़ाली २० फरमातें है कि रसूलल्लाल स० ने अपनी वफात से कब्ल असहाब से कहा कि मुझे कलम दवात काग़ज़ देदो। ताकि मैं तुम्हारे लिये इमामत व ख़िलाफत की मुशकिलात को तहरीरन दूर करदूँ और बतादूँ कि मेरे बाद इमामत व खिलाफत का कौन मुसतहेक है। मगर हज़रत उमर ने इस वक़्त यह कह दिया कि इस मर्द को छोड़ दो, यह हिज़यान बक रहा है और बकवास कर रहा है। मुलाहेज़ा हो (📚सिर्सल आलमीन तबा बम्बई सफा 9 सतर 15 किताब अश-शिफाए काज़ी अय्याज़ तबा बरेली सफा 308 व नसीमुर्रियाज़ शरहे शफा शरहे मिशकात मोहद्दिस देहलवी व मदारेजुन नबूव्वत, हबीबुस सियर जिल्द 1 सफा 144 रौज़तुल अहबाब जिल्द 1 सफा 550 बुखारी जिल्द 6 सफा 654 अल-फारूक जिल्द 2 सफा 48)

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