ईदे अकबर ईदे ग़दीर

⭕ग़दीरे ख़ुम का वाक़िआ और जानशीन की तअ़यीन

आमाले हज बजा लाने के बाद मुसलमान अपने अपने शहरों और देहात की तरफ़ रवाना हुए। आँ हज़रत स०अ० मदीने की तरफ़ चले। जब आँ हज़रत स०अ० का यह कारवाँ ग़दीरे ख़ुम की सरज़मीन (जहफा से पांच किलोमीटर के फास्ले) पर पहुंचा तो ख़ुदा की जानिब से हज़रते जिबरईल अ०स० सूरए माएदा की आयत नम्बर 67 लेकर आँ हज़रत पर नाज़िल हुए कि उसमें इरशाद हैः
القرآن الكريم..
{۞ يَٰٓأَيُّهَا ٱلرَّسُولُ بَلِّغۡ مَآ أُنزِلَ إِلَيۡكَ مِن رَّبِّكَۖ وَإِن لَّمۡ تَفۡعَلۡ فَمَا بَلَّغۡتَ رِسَالَتَهُۥۚ وَٱللَّهُ يَعۡصِمُكَ مِنَ ٱلنَّاسِۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهۡدِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلۡكَٰفِرِينَ《٦٧ المائدة!》}
{या अय्योहर्मूलो बल्लिग मा उन्ज़िला इलैका मिर्रब्बेका व इंल लम तअल फ्‌मा बल्लगता रिसालतहू वल्लाहो यअसेमोका मिनन्नासे......}

"ऐ पैग़म्बर स०अ० ! आप इस हुक्म को पहुंचा दें जो आपके परवरदिग़ार की तरफ़ से नाज़िल किया गया है और अगर आप ने यह न किया तो गोया उसके पैग़ाम को नहीं पहुंचाया और ख़ुदा आपको लोगों के शर से महफूज़ रखेगा"।

दर हक़ीक़त ग़दीर का बियाबान ऐसा चौराहा था जो हिजाज़ के लोगों के रास्ते एक दूसरे से जुदा करता था। एक रास्ता मदीने, दूसरा ईराक, तीसरा मिस्र और चौथा यमन की तरफ़ जाता था।

आँ हज़रत स०अ० ने वहाँ पर अपने असहाब को रुकने का हुक़्म दिया। यह एलान किया जो लोग आगे निकल गये हैं वह वापस आ जायें और जो अभी तक नहीं पहुंचे उनका इन्तिज़ार किया जाये। 90 हज़ार, बाज़ के बक़ौल एक लाख चौदह हज़ार बाज़ के बक़ौल एक लाख बीस हज़ार और बाज़ के बक़ौल एक लाख चौबीस हज़ार पर मुशतमिल जम्मे गफ़ीर उस झुलसा देने वाले बियाबान में इस बात का मुनतज़िर था कि देखें, रसूले ख़ुदा स०अ० कौन सा अहेम पैगाम पहुंचाने वाले हैं?

18 ज़िलहिज्जा बरोज़े जुमेरात आँ हज़रत स०अ० के फ़रमान से ऊँटों के पालानों का मिम्बर तैयार हुआ, आप स०अ० उस पर तशरीफ ले गये। हम्दो सना करने और कुछ दीगर अहम तरीन मतालिब इरशाद फ़रमाने के बाद अचानक झुके और हज़रत अली अ०स० का हाथ पकड़ कर बलन्द किया और फरमायाः

मन कुन्तो मौलाहो अलीय्युन मौलाह
{من كنتُ مولاه فهذا عليٌّ مولاه}

"पस जिस जिस का मैं मौला हूँ उस उस के अली अ०स० मौला हैं'।"

आप स०अ० ने इस जुमले को तीन और बाज़ के बकौल चार मर्तबा तक़रार फ़रमाया। उसके बाद अली अ०स० के दोस्तों के हक़ में दुआ और दुश्मनों पर लानत भेजी। फिर इस बात का एलान किया कि हाज़िरीन यह ख़बर उन लोगों तक पहुंचायें जो यहाँ पर मौजूद नहीं हैं।

उसके बाद मुसलमान रसूले ख़ुदा स०अ० के हुक्म से बड़े जोर ओ शोर से हज़रत अली अ०स० की ख़िदमते अक्दस में हाज़िर हुए और उन्हें रसूले ख़ुदा स०अ० के बाद इमामत व रहबरी की मुबारक बाद दी। (📚वाक़िए ग़दीर अहले सुन्नत की बेशुमार क़ुतुब के हवालों के साथ किताबुल ग़दीर की जिल्द अव्वल में मज़कूर है)

पस आँ हज़रत स०अ० के वसीले से जानशीन की तक़र्रूरी के बाद इस्लाम का आईन मुक़म्मल हुआ और जो कुछ रसूले ख़ुदा स०अ० के ज़िम्मे लगाया गया था वह मुक़म्मल हुआ। पैग़म्बरे अकरम स०अ० न खुतबए ग़दीर में खासकर दो चीज़ों के बारे में वसीय्यत करते हुए फ़रमायाः

"मैं अनक़रीब तुम्हारे दरमियान से जाने वाला हूँ, मैं दो ग़रौं क़द्र चीज़े तुम्हारे दरमियान छोड़े जा रहा हूँ। अगर इनके साथ तमस्सुक़ रखोगे और उन पर अमल करते रहोगे तो हरगिज़ गुमराह नहीं होगे। पहली चीज़ किताबे ख़ुदा है जो वही से मुत्तसिल है और दूसरी चीज़ मेरी इतरत है"। 
(📚मसनदे अहमद हम्बुल, जिल्द 3, सफ़ा 17, 59। सही मुस्लिम, जिल्द 2, सफ़ा 38। सवाइके, सफ़ा 91। तफसीर फ़ख़्रे राज़ी,♦️जिल्द 3, सफा 24)

आँ हज़रत स०अ० की यह वसीय्यत हदीसे सक़लैन के नाम से मारूफ़ है कि उसे शिया सुन्नी दोनों ने नक़्ल किया है और यह तारीख़े इस्लाम की एक मुसल्लम हक़ीक़त है। उसके बाद सूरए माएदा की आयत नम्बर 3 नाज़िल हुईः

अलयौमा अकमलतो लकुम दीनकुम व अतममतो अलैकुम नेअमती व रजीतो लकुमुल इस्लामा दीना.........

{الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الْإِسْلَامَ دِينًا}

"आज मैंने तुम्हारे लिये दीन को कामिल कर दिया है और अपनी नेमतों को तमाम कर दिया है और तुम्हारे लिये दीने इस्लाम को पसन्दीदा बना दिया है"।

पैग़म्बरे ख़ुदा स०अ० ने तकबीर कही, उस वक़्त लोग बड़े ज़ोरो शोर के साथ हज़रत अली अ०स० की ख़िदमत में आये और उन्हें इस मनसबे जलील पर फाएज़ होने पर मुबारकबाद दी। मारूफ़ो मशहूर लोगों में से  अबू बकर और  उमर हज़रत अली अ०स० की ख़िदमत में हाज़िर हुए और दोनों ने जुदागाना तौर पर कहाः

बख़्ख़िन बख़्ख़िन लका यब्ना अबी तालिबिन असबहता व अमसैता मौलाया व मौला कुल्लो मोमिनिन व मोमिनतिन

"ऐ अबू तालिब अ०स० के फ़रज़न्द ! आपको मुबारक हो, आप को मुबारक हो कि आप ने सुबह व शाम इस हालत में की है कि आप मेरे और तमाम मोमिनीन व मोमिनात के मौला बने"। 
(📚अलग़दीर, जिल्द 1, सफा 11, 47)

🌐हज़रत अली अ०स० की इमामत और रहबरी का इन्कार करने पर फ़ौरन अज़ाब

कुरआने करीम की सूरए मुबारिका मआरिज की पहली तीन आयात इसी वाक़िए की तरफ़ इशारा करती हैं कि वाक़िए ग़दीर और इमाम अली अ०स० की रहबरी का इन्कार करने पर फ़ौरन अज़ाब नाज़िल हुआः

"एक मांगने वाले ने वाक़िअ होने वाले अज़ाब का सवाल किया। जिसका काफ़िरों के हक़ में कोई दफ़ा करने वाला नहीं था। यह बुलन्दियों वाले ख़ुदा की तरफ़ से है।"

बहुत से मुफस्सिरीन और मुहद्दिसीन ने इस आयत के जै़ल में नक़्ल फ़रमाया है कि वाक़िए ग़दीर और रसूले ख़ुदा स०अ० की तरफ़ से♥️हज़रते अली अ०स० की ओहदए इमामत व रहबरी पर तक़र्रुरी के बाद लोग इधर-उधर से बाख़बर हुए। एक इन्तिहाई कमीना और ज़लील आदमी नोअमान बिन हारिस फ़हरी (85) आँ हज़रत स०अ० की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और गुस्ताखाना लहजे में कहने लगाः

तुमने हमें ख़ुदा की वहदानियत और अपनी रिसालत पर गवाही देने का हुक्म दिया, हमने इस बात पर गवाही दी। उसके बाद तुमने हमें नमाज़, रोज़े, जिहाद और ज़कात का हुक्म दिया। हमने उन तमाम अहकाम को क़ुबूल किया, उसके बावजूद तुम राज़ी नहीं हुए और अब इस जवान (हज़रते अली अ०स०) की तरफ़ इशारा किया) को अपना जानशीन और अपने बाद इसे हमारा रहबर व इमाम बना दिया है। क्या यह हुक़्म ख़ुदा की तरफ़ से है या ख़ुद तुम्हारी तरफ़ से?

आँ हज़रत स०अ० ने फ़रमायाः उस ख़ुदा की क़सम, जिसके सिवा कोई माबूद नहीं है, यह हुक्म ख़ुदा की तरफ़ से है। नोअमान जो कि इन्तिहाई गुस्से के आलम में था, उसने आँ हज़रत स०अ० की तरफ़ पुश्त करते हुए कहाः

अल्लाहुम्मा इन काना हाज़ा हुवल्लहक्को मिन इन्देका फ़मतिर अलैना हिजारतन मिनस्समाए

"खु़दाया! अगर यह बात हक़ है और तेरी तरफ़ से है तो आसमान से मेरे ऊपर पत्थर बरसा"। (86)

यह जुमले निकलने की देर थी कि आसमान से इस पर पत्थर नाज़िल हुआ, वह ज़मीन पर लोटने लगा और वासिले जहन्नम हो गया। यही वह मकाम है जहाँ पर सूरए मआरिज की पहली तीन आयात नाज़िल हुईं। 
(📚मजमअउल बयान, जिल्द 10, सफ़ा 325। अलग़दीर, जिल्द 1, सफ़ा 239 ता 246)

📝क़ससुल अम्बिया 

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