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दुआ ए फ़रज का तर्जुमा

Dua e Faraj بِسْمِ اللهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ. اَللّٰهُمَّ كُنْ لِوَلِيِّكَ الْحُجَّةِ بْنِ الْحَسَنِ صَلَوَاتُكَ عَلَيْهِ وَعَلٰى آبَائِه فِىْ هٰذِهِ السَّاعَةِ وَ فِىْ كُلِّ سَاعَةٍ وَلِيًّا وَّ حَافِظًا وَّ قَائِدًا وَّ نَاصِرًا وَّ دَلِيْلًا وَّ عَيْنًا حَتّٰى تُسْكِنَه اَرْضَكَ طَوْعًا وَتُمَتِّعَه فِيْهَا طَوِيْلًا۔ دعا فراج خدا کے نام سے جو بڑا مہربان، نہایت رحم کرنے والا ہے۔  اے خدا تیرا ولی ہو، حجت ابن الحسن، تیری رحمتیں ان پر اور ان کے آباء و اجداد پر اس گھڑی اور ہر گھڑی میں، ایک ولی، محافظ، اور رہنما، ایک تاکید، رہنما، اور ایک آنکھ، یہاں تک کہ تم اسے اپنی سرزمین میں اپنی مرضی سے آباد کرو اور اسے طویل عرصے تک لطف اندوز کرو۔ 🤲🏻दुआ ए फ़रज का तर्जुमा🤲🏻 ख़ुदा के नाम से जो बड़ा मेहेरबान निहायत रहम करने वाला है।            एै ख़ुदा तेरा वली हो हुज्जत इब्ने हसन अलैहिस्सलाम,तेरी रहमतें उन पर और उनके आबाओ अज्दाद पर इस घड़ी और हर घड़ी में एक वली, मुहाफ़िज़ और रहनुमा, एक ताक़ीद, रहनुमा और एक आंख यहां तक के तु उसे अपन...

हज़रते इमामे हसन अल-असकरी अलैहिस्सलाम के हवाले से कुछ सवालात और जवाबात

📕हज़रत इमामे हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के हवाले से कुछ सवालात और जवाबात📕 🔸सवाल 1: इमाम हसन अस्करी(अ०) कब और कहाँ पैदा हुए थे? जवाब : 10 रबिउस सानी सन 232 हिजरी को मदीने में पैदा हुए। 🔸सवाल 2 : आपके वालिद और वालिदा के इस्माए गिरामी बताएं? जवाब : इमाम अली नकी (अ०) आपके वालिद माजिद थे। हदीसा ख़ातून आपकी वालिदा थीं। 🔸सवाल 3: आपकी कुन्नियत क्या है? जवाब : अबु मुहम्मद । 🔸सवाल 4 : इमाम हसन अस्करी (अ०) के अलकाबात बताएं? जवाब : अस्करी, हादी, ज़की, सिराज। 🔸सवाल 5 : इमाम हसन अस्करी (०) की शादी किस खातून से हुई? जवाब : नरजिस खातून से। मोहतरमा कैसर रोम की पोती थीं औरामऊन वसी ईसा की नस्ल से थीं। 🔸सवाल 6 : इमाम हसन अस्करी (३०) की कितनी औलादों थीं? जवाब : सिर्फ इमाम मुहम्मद मेंहदी (अ०)। 🔸सवाल 7 : इमाम हसन अस्करी (५०) से कौन सी तफ्सीर मंसूब है? जवाब: आसारे हैदरी। 🔸सवाल 8 : इमाम हसन अस्करी (५०) को जब दरिन्दों के कमरे में कैद किया गया तो उन्होंने क्या सुलूक किया? जवाब : दरिन्दों ने आपके कदमों में सर रख दिये। 🔸सवाल 9: इमाम हसन अस्करी (०) को रोता देख कर बेहलोल ने वजह पूछी तो आपूने क्या बाते कीं? जव...

ज़ियारते अरबईन

ज़ियारते अरबीन इस महीने की बीस तारीख को हज़रत सय्येदुश शुहादा का चेहल्लुम है। इस दिन हज़रत इमाम हुसैन (अ०) की ज़ियारत पढ़ने में बहुत सवाब है। हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ०) से रिवायत है कि मोमिन की पाचँ निशानीयाँ हैं। दिन और रात में वाजिब और नवाफिल की (51) इक्कयावन रकअत नमाज़ पढ़ना, ज़ियारत-ए-अरबीन पढ़ना, दाहिने हाथ में अगूंठी पहनना, खाक पर सिज्दः करना और बिस्मिल्लाहिर्रहमा निररहीम तेज़ आवाज़ से कहना। इमाम जअफर सादिक (अ०) से फर्माया कि सफर की बीसवीं तारीख को उस वक्त जब कि सूरज ऊँचा हो रहा हो, इमाम हुसैन (अ०) की ज़ियारत पढ़ो और कहो : "अस्सलामो अला वलीयिल्लाह व हबीबेः अस्स्लामो अला खलीलिल्लाह व नजीबेः अस्सलामो अला सफीयिल्लाहे वब्ने सफीयेः अस्सलामो अलल हुसैनिल मज़लूमिश शहीद अस्सलामो अला असीरिल करोबाते व कृतीलिल अबारात अल्लाहुम्मा इन्नी अश्हदो अन्नाहू वलीयोका वब्नो वलीयेका व सफीयोका वब्नो - सफीयेकल फाऐज़ो बे करामतेका अक्रम्ताहू बिश शहादते व हबौताहू बिस्सआदातें वज्ताबैताहू बेतीबिल विलादाते व जाअल्ताहू सय्येदम मेनस सादाते काऐदम मेनल कादाते व ज़ाऐदम मेनज़ ज़ादाते व अअतैताहू मवारीसल अनाबियाऐ...

फ़ज़ाएले अमीरुल मोमेनीन अस

अमाली में मुसलिम इब्ने कैस से मरवी है कि ऑहुजूर ने फ़रमाया और हज़रत अली (अस) में जनाबे लूत की नरम मिज़ाजी, जनाबे यहया का हुस्ने इख़लाक़, जनाबे अय्युब का ज़ोहद, जनाबे इब्राहीम की सख़ावत, जनाबे सुलेमान का दबदबा और जनाबे दाऊद की अज़मत है, नामे अली (अ.स) जन्नत के हर दरवाज़े पर मकतूब है। अल्लाह ने मुझे बशारते अली (अ.स.) से नवाज़ा है। अली (अ.स.) अल्लाह के यहाँ महमूद है। मलाऐका के यहाँ पाक वा पाकीज़ है मेरी ख़लवत व जलवत का हमनशीन है। मेरा चिराग़ है, मेरा मूनिस है। मेरा रफ़ीके सफ़र है। अली मुझसे है और मैं अली से हूँ। जिसने अली (स) से तवल्ला किया उसने मुझसे तवल्ला किया। मोहब्बते अली (अ.स.) नेमत है और इताअते अली (अ.स.) फ़ज़ीलत है। मलाऐका कुर्ब अली (अ.स.) के ख़्वाहिशमन्द रहते हैं। जिन अली (अ.स.) के गिर्द तवाफ़ करते हैं। मेरे बाद रूऐ ज़मीन पर हर तबके़ वाले की निसबत अली (अ.स.) इज़्ज़त, फ़ख़्र और रहनुमाई के ऐतबार से अफ़ज़ल और बेहतर होगा। अली (अ.स.) ना जल्दबाज़ है ना काहिल वा ग़ाफ़ेल। मेरे बाद रूऐ ज़मीन पर अली (अ.स) से अफ़ज़ल कोई मौलूद नहीं होगा। जिस घर में अली(अ.स.) होगा वहाँ बरकतों का नुज़ूल होगा। ...

ख़ुत्बा ए अयादत

ख़ुत्बा ए अयादत शुएैब बिन गफ़ला कहते हैं कि जिस वक़्त हज़रते फ़ातिमा ज़हरा सअ के दुनिया से रुख़सती का वक़्त क़रीब आया तो मुहाजरीन व अंसार की ख़्वातीन आप की अयादत के लिए हाज़िर हुईं और आपसे पूछा के एै बिन्ते पैग़म्बर अब आप की तबीयत कैसी है तो आप ने ख़ुदा की हम्दो सना और अपने बाबा पर दुरूद और सलाम के बाद फ़रमाया :- बिस्मिल्लाह हिर्रहमा निर रहीम   बा ख़ुदा मेरी कैफ़ियत ये है के अब मैं तुम्हारी दुनिया से बेज़ार और तुम्हारे मर्दों से मुत्नफ़्फ़िर हो चुकी हूं, मैंने उन्हें आज़माने के बाद उन से दूरी अख़्तियार कर ली है उनका इम्तेहान लेने के बाद मुझे उनसे नफ़रत हो गई ग़ासिबो के मुक़ाबले में सुकूत, इस्लामो मुस्लेमीन से ख़ेड़वाड़, फ़ुज़ूल काम और दुश्मनों के सामने झुक जाना, आक़ायद की ख़राबी और अफ़कार की गुमराही ये सब किस क़द्र बुरा है। यकीनन उनके नुफ़ूस ने अपने मुस्तक़बिल के लिए बहुत बुरा इंतेज़ाम किया है जिस के सबब अल्लाह उन पर ग़ज़बनाक हो गया और वो हमेशा के लिए अज़ाब में गिरफ़्तार हो गए। तो फिर हमने भी उन की लगाम ख़ुद उनकी गर्दन पर डालदी और उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया ज़िल्लत का सेहरा उन्ही...

ईदे ग़दीर की अज़्मत मासूमीन अस की निगाह में

  ईदे ग़दीर की अज़्मत मासूमीन अस की निगाह में  1 रसूल ख़ुदा (स.अ.) (ने मैदान ए ग़दीर में फ़रमाया) जिसका मैं मौला हूं ये अली (अस) उसके मौला हैं। एै अल्लाह! जो इन्हें दोस्त रखे, तू उसे दोस्त रख और जो इन्हें दुश्मन रखे, तू उसे दुश्मन रख, और उसकी मदद कर जो उसकी मदद करे और उसकी मदद कर जो इनकी मदद करे और उसकी मदद न कर जो इनकी मदद न करे और उस पर लानत कर जिसने इन पर ज़ुल्म किया।  📚मौला अली (अ.स.) की शान में 1000 हदीस, स.351 2 रिवायत :-  रसूले खुदा (सअ) ने अपने असहाब के दरमियान अख़ुव्वत बरकरार की, उमर और अबू बक्र को एक दूसरे का भाई बनाया और इसी तरह दुसरो के दरमियां भी अखुल्वत बरकरा की। इसी दौरान अली (अ.स.) पैगंबर ए ख़ुदा (सअ) के पास आये और अर्ज़ की, "आप ने असहाब के दरमियान अख़ुव्वत को बरक़रार किया लेकिन मुझे किसी का भाई नहीं बनाया"। रसूले ख़ुदा (सअ) ने फरमाया, "तुम इस दुनिया और आख़ेरत में मेरे भाई हो"।  📚मौला अली (अ.स.) की शान में 1000 हदीस, स.270 3 रिवायत :- रसूले ख़ुदा (सअ) ने अपने असहाब के दरमियान बिरादरी बरकरार की। उस वक्त खुद पैग़म्बर (सअ), अबू बक्र, उमर और अली (...