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इमामे हसन असकरी अलैहिस्सलाम

हजरत इमामे हसन असकरी (अ.स.) हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) के बाद हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) इमाम हुए। आप रसूले इस्लाम के ग्यारहवें जानशीन और सिलसिल-ए-इस्मत की तेरहवीं कड़ी थे। आप भी अपने आबा व अजदाद की तरह इमामे मनसूस, मासूम और अफ्ज़ले कायनात थे (📚इरशाद मुफ़ीद पेज 502) आपको सिफाते हसना, इल्मो सख़ावत वगैरा अपने वालिद से विरसे में मिले थे। (📚अरहजुलमतालिब 461) "अल्लामा मोहम्मद बिन तलहा" का बयान है कि आप को ख़ुदा वन्दे आलम ने जिन फज़ायलों मनाक़िब और कमालात और बुलन्दी से सरफराज़ किया है उनमें मुकम्मल दवाम मौजूद है न वह नज़र अन्दाज़ किये जा सकते हैं और न उनमें कोहनगी आ सकती है और आप का एक अहम शरफ़ यह भी है कि इमाम मेहदी (अ.स.) आप ही के एकलौते फ़रज़न्द हैं, जिन्हें परवरदिगारे आलम ने तवील उम्र अता की है। (📚मतालिबुल सऊल पेज 292) आपकी विलादते बा सआदत सन् 232 हिजरी में हुई। उस वक्त "वासिक बिल्लाह बिन मोतसिम" बादशाह था। फिर मुतवक्किल ख़लीफा हुआ। फिर 247 हिजरी में मुसतनसिर बिन मुतवक्किल ख़लीफा हुआ। फिर 248 हिजरी में मुसतईन ख़लीफा हुआ। फिर 252 हिजरी में मोतिज़ बिल्लाह ख़लीफा हुआ...

इमामे अली नक़ी अलैहिस्सलाम

हजरत इमाम अली युन्नकी (अ.स.) हजरत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के बाद हजरत इमाम अली नक़ी (अ.स.) इमामे मासूम मिनल्लाह हुए जो रसूले ख़ुदा सअवव के दसवें जानशीन और इस्मती सिलसिले की बारहवीं कड़ी थे। आप भी अपने आबा व अजदाद की तरह से आलमे ज़माना और अफ़ज़ले कायनात थे। आप इल्म, सख़ावत, तहारते नफ़्स, किरदार की बुलन्दी और जुमला सिफाते हसना में अपने वालिद माजिद की जीती जागती तस्वीर थे। (📚सवायके मोहर्रिका पेज 123 मतालिबुल सऊल पेज 291, नूरूल अबसार पेज 149) आपकी विलादत बा सआदत सन् 214 हिजरी में हुई थी। उस वक्त मामून अब्बासी बादशाह था उसका सन् 218 हिजरी में इन्तिक़ाल होने पर मोतसिम बादशाह हुआ। सन् 227 हिजरी में वासिक इब्ने मोतसिम ख़लीफा हुआ जिसका सन् 232 हिजरी में इन्तिक़ाल हो गया और मुतवक्किल अब्बासी ख़लीफा हुआ। सन् 247 हिजरी में इसका बेटा मुनतसिर और 248 हिजरी में मुसतईन 252 हिजरी में जुबैर इब्ने मुतवक्किल अल-मकनी व मोतिज़ बल्लाह अलल तरतीब ख़लीफा हुए। ये सब के सब अजली दुशमनाने अहले बैत थे। जिन्होंने इमाम अलीयुन्नकी (अ.स.) को सुकून से नहीं रहने दिया। इन सब में मुतवक्किल बड़ा ज़ालिम व जाबिर था उसे बनी अब...

इमामे मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम

हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) इमाम अली रिज़ा (अ.) के बाद हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.) इमाम हुए जो रसूले ख़ुदा सअवव के नवें जानशीन और सिलसिला-ए-इस्मत की ग्यारहवीं कड़ी थे। आप भी अपने आबा व अजदाद की तरह से मासूम थे सारी कायनात से अफज़ल थे। अल्लामा इन्ने तलहा शाफ़ई लिखते हैं कि इमाम मो० तक़ी (अ.स.) अगरचे तमाम मासूमीन में सबसे कम्सिन और छोटे थे लेकिन आप की क़द्रो मन्ज़िलत आप के आबाओ अजदाद की तरह निहायत ही अज़ीम थी और आप का बुलन्द तज़किरा बर सर नोके ज़बान था। (📚मतालिबुल सऊल पेज 159) "अल्लामा हुसैन वायज़ काशिफी" लिखते हैं कि "आप की मन्ज़िलत व हस्ती निहायत ही बुलन्द थी।" (📚रौजेतुश्शोहदा 438) "अल्लामा खाविन्द शाह" लिखते हैं "इल्मो फज़्लो अदब व हिक़मत में इमामे मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को वह कमाल हासिल था जो किसी को भी नसीब नहीं था।" (📚रौज़तुस्सफा जिल्द 3 पेज 16) "अल्लामा शलन्जी" लिखते हैं कि इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) कम सिनी के बावजूद फज़ायल से भर पूर थे ओर आप के मनाकिबो मदहा बे शुमार हैं। (📚नूरूल अबसार पेज 145) आपके शरफ़ो क़मालात से मुतासिर हो क...

इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम

हजरत इमाम अली रिजा (अ.स.) इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) के बाद इमाम अली रिज़ा (अ.स.) इमाम हुए। आप रसूले ख़ुदा सअवव के आठवें जानशीन और इस्मत के सिलसिले की दसवीं कड़ी थे। आप भी मासूम मिनल्लाह और अफज़ले कायनात थे। "अल्लामा इब्ने हजरे मक्की" कहते हैं कि आप तमाम लोगों में जलीलुल कद्र और अज़ीमुल मर्तबत थे। (📚सवायके मोअर्रिका पेज 122) "अल्लामा अब्दुल रहमान जामी" के मुताबिक आप की बातें पुर अज़ हिक़मत और आप का अमल दुरूस्त और किरदार महफूज़ अनिल ख़ता था आप इल्मों हिक़मत से भर पूर थे रूए ज़मीन पर आप की मिसाल नहीं थी। (📚शवाहिदुन्नबूवत पेज 196 तबए लखनऊ 1904) "अल्लामा शहीर" लिखते हैं कि "आप अशरफ़े मख्लूके ज़माना थे (हबीबुल यसीर) आपको इल्मे माकाना व मायकू न आवा व अजदाद से वरासतन पहुँचा था। (📚वसीलतुन्नजात पेज 377) आप हर ज़बान और हर लुगत में फसीह और दाना तरीन मर्दुम थे। जो शख़्स जिस ज़बान में बात करता था उसको उसी ज़बान में जवाब देते थे (📚रौज़तुल अहबाब) "अल्लामा मो. तलहा शाफ़ई" के मुताबिक "आप बारह इमामों में तीसरे अली हैं। आप का ईमान हद से बढ़ा हुआ था। आपकी...

इमामे मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम

इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के बाद इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) इमाम हुए जो रसूले अकरम के सातवें जानशीन ओर इस्मत के सिलसिले की नवीं कड़ी थे। आप भी अपने आबा व अजदाद की तरह मासूम मिनल्लाह और अफज़ले कायनात थे। दुनिया की तमाम ज़बानें जानते थे। इल्मे गैब से आगाह थे जैसा की सभी इमाम थे। अल्लामा इब्ने हजरे मक्की लिखते हैं कि "आप हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ के इल्म, मारेफ़त कमाल और अफज़लयत में वारिस व जानशीन थे। आप दुनिया के आबिदों में सबसे बड़े इबादत गुज़ार, सबसे बड़े आलिम और सबसे बड़े सखी थे।" (📚सवायके मोहर्रिका पेज 121) इब्ने तलहा शाई लिखते हैं कि "आप बहुत बड़ी इज्ज़त व कद्र के मालिक इमाम और इन्तिहाई शान व शौकत के मुजतहिद थे। आपका इजतिहाद में नज़ीर न था। आप इबादत व ताआत में मशहूरे ज़माना और करामात में मशहूरे कायनात थे। इन चीज़ों में आप की कोई मिसाल न थी, आप सारी रात रूकूओ सुजूद और क़यामो कऊद में गुज़ारते और सारा दिन सदक़ा और रोज़े में बसर करते थे।" (📚मतालिबुल सऊल पेज 308) अल्लामा शिबली लिखते हैं कि आप बहुत बड़ी कद्रो मन्ज़िलत की दुनिया में मुनफ्रिद इमाम औ...

इमामे जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) इमाम मो. बाक़िर (अ.स.) के बाद इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) इमाम हुए। आप रसूले इस्लाम के छटे जानशीन हुए। आप भी अपने अजदाद की तरह मासूम, आलमे ज़माना और अफज़ले कायनात थे। अल्लामा इब्ने तलहा शाफ़ई लिखते हैं कि आप अहलेबैत और सादात की अज़ीम तरीन फ़र्द थे और मुख़्तलिफ़ क़िस्म के उलूम से भरपूर थे आप ही से कुरआने मजीद के मानी के चश्मे फूटते रहे हैं। आप के बहरे इल्म से उलूम के मोती रोले जाते थे। आप ही से इल्मी अजायबात व कमालात का ज़हूर व इन्किशाफ़ हुआ। (📚मतालिबुल सऊल पेज 273) अल्लामा इब्ने हजरे मक्की लिखते हैं कि उलमा ने आप से इस दर्जा नक्ले उलूम किया है जिसकी कोई हद नहीं हों। आपका आवाज़-ए-इल्म तमाम अमसा व दयार में फै़ला हुआ था (📚सवायके मोहर्रिका पेज 120) "मुल्ला जामी" लिखते हैं कि आपके उलूम का अहाता फ़हमो इदराक से बुलन्द है। (📚शवाहिदुन्नबूवत पेज 180) अल्लामा मिस्र शेख़ मो. खिज़री लिखते हैं कि इन से इमामे मालिक बिन उन्स, इमाम अबू हनीफ़ा और उलमाये मदीना ने रिवायत की है मगर इमाम बुख़ारी ने इनसे कोई रिवायत नहीं ली।(📚तारीख़े फिक़्ह पेज 273 कराची) इमाम जाफ़...

इमामे मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम

हज़रत इमाम मोहम्मद बाकर (अ.स.) इमाम जैनुल आबिदीन (अ.स.) के बाद इमाम मो. बाक़िर (अ.स.) इमाम हुए। आप भी अपने आबा व अजदाद की तरह इमाम मनसूस, मासूम और अफज़ले कायनात थे। "अल्लामा इब्ने हजरे मक्की" लिखते हैं कि आप इबादत इल्मो ज़ोहद वगैरा में हज़रत इमाम जैनुल आबिदीन (अ.स.) की जीती जागती तस्वीर थे (📚सवायके मुहर्रिका पेज 120) इसी तरह दीगर रावियों ने भी इमाम मो. बाकर (अ.स.) के फज़ायल व कमालात बयान किये हैं। आपकी ज़ाते अक़दस से सारी दुनिया फैज़याब हो रही थी मगर दुश्मनों की दुश्मनी में कोई कमी नहीं हुई। और बादशाहे वक़्त हश्शाम बिन अब्दुल मलिक ने आपको ज़हर दिलवा कर शहीद करा दिया। आप की तारीख़े शहादत 07 ज़िल्हिज 114 हिजरी पीर के दिन मदीने में हुई। आप जन्नतुल बक़ी में दफ़्न हैं। (📚कश्फुलगम्मा पेज 93, जिलाउल उयून पेज 264)