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शोहदा ए कर्बला के मुख़्तसर सवाने हयात

1  हज़रते हुर इब्ने यज़ीदे अर-रियाही आप का नामे नामी और इस्मे गिरामी हुर्र इब्ने यज़ीद इब्ने नाजीया इब्ने अनब इब्ने इताब इब्ने हुरमी इब्ने रिया इब्ने यरबू इब्ने खन्ज़ला इब्ने मालिक इब्ने ज़ैदमना इब्ने तमीम अल यरबूई अर रियाही था। आप अपने हर अहदे हयात में शरीफे कौम थे। आप के बाप दादा की शराफ़त मुसलेमात से थी पैग़म्बरे इस्लाम के मशहूर सहाबी ज़ैद इब्ने उमर इब्ने कैस इब्ने इताब जो (अहवज़) के नाम से मशहूर थे और शायरी में बा-कमाल माने जाते थे वो आप के चचा ज़ाद भाई और आप के ख़ानदान के चश्मों चराग़ थे। हज़रते हुर्र का शुमार कुफे के रइसों में था। इब्ने ज़ियाद ने जब आप को एक हज़ार के लश्कर समैत इमाम हुसैन (अलै०) से मुकाबेला करने के लिये भेजा था उस वक़्त आप को एक गैबी रिश्ते ने जन्नत की बशारत दी थी। जनाबे हुर्र का लश्कर मैदान मारता हुआ जब मकामे "शराफ्" पर पहुँचा और इमाम हुसैन (अलै०) के काफिले को देखकर दौड़ा तो तमाज़ते आफ‌ताब और रास्ते की दोश ने प्यास से बेहाल कर दिया था। मौला की ख़िदमत में पहुँच कर जनाबे हुर्र ने पानी का सवाल किया। साकिये कौसर के फ़र्ज़न्द ने सेराबी का हुक्म दे कर आने की...

अज़ादारी अहलेबैत अस की नज़र में

अज़ादारी - अहलेबैत (अ.स.) की नज़र में 1 इमाम काज़िम (अस)  ने मुख़्तलिफ़ मौक़े पर मजलिस ए अज़ा का एहतमाम किया। 📚हमारी अज़ादारी, स 33 2 इमाम सादिक (अ.स.)  ने अबू बसीर से फ़रमाया, "बुलंद आवाज़ में रोया करो"।  📚हमारी अज़ादारी, स 33 3 रसूल ख़ुदा (स.अ.व.)  बेशक, हुसैन (अ.स.) हिदायत का चिराग़ और नजात की कश्ती है।  📚इरफ़ाने मज़्लूम है, स 8 4 रसूल ख़ुदा (स.अ.व.)  बेशक, हुसैन (अ.स.) की मोहब्बत मोमेनीन के दिलों में पोशिदा है।  इरफ़ान ए मजलूम, स 11 5 इमाम सादिक (अ.स.)  जो हम पर हुए ज़ुल्म पे ग़मज़दा है, उसकी हर सांस तस्बीह है और उसका मातम इबादत है।  📚अज़ादारी 40-हदीस 6 इमाम रज़ा (अस)  ऐ इब्ने शबीब! अगर तू रोना चाहता है तो फिर हुसैन बिन अली (अ.स.) पर रोया कर। 📚 क़ुर्बान उश शहादा, स 81 7 इमाम सादिक (अ.स.)  ऐ ज़ुरारह! आसमान 40 दिन तक शहादते इमाम हुसैन (अ.स.) पे रोया था।  📚मुस्तदराकल वसाएल, ज1, स391, अज़ादारी-40 हदीस 8 इमाम हुसैन (अस)  जिस शख़्स की आंख से हमारे ग़म में एक आंसू निकल आए तो अल्लाह तआला उसे जन्नत के एक महल अता फ़रमाएगा।...

मुबाहिला क्यों और कैसे हुआ था ?

मुबाहिला क्यों और कैसे हुआ था ? 🔹इस अंदाज़ में अहलेबैत अस मैदाने मुबाहिला में जलवा अफ़रोज़ हुए। فَمَنْ حَاجَّكَ فِيهِ مِن بَعْدِ مَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ فَقُلْ تَعَالَوْا نَدْعُ أَبْنَاءَنَا وَأَبْنَاءَكُمْ وَنِسَاءَنَا وَنِسَاءَكُمْ وَأَنفُسَنَا وَأَنفُسَكُمْ ثُمَّ نَبْتَهِلْ فَنَجْعَل لَّعْنَتَ اللَّهِ عَلَى الْكَاذِبِينَ फिर जब तुम्हारे पास इल्म (क़ुरआन) आ चुका उसके बाद भी अगर तुम से कोई (नसरानी) ईसा के बारे में हुज्जत करें तो कहो के (अच्छा मैदान में) आओ हम अपने बेटों को बुलाएं तुम अपने बेटों को और हम अपनी औरतों को (बुलाएं) और तुम अपनी औरतों को और हम अपनी जानों को (बुलाएं) और तुम अपनी जानों को उसके बाद हम सब मिलकर ख़ुदा की बारग़ाह में गिड़गिड़ाएं और झूठों पर ख़ुदा की लानत करें। پھر جب تمہارے پاس علم (قرآن) آچکا اس کے بعد بھی اگر تم سے کوئی (نصرانی) عیسیٰؑ کے بارے میں حجت کرے تو کہو کہ (اچھا میدان میں) آؤ ہم اپنے بیٹوں کو بلائیں تم اپنے بیٹوں کواور ہم اپنی عورتوں کو(بلائیں) اور تم اپنی عورتوں کو اور ہم اپنی جانوں کو (بلائیں) اور تم اپنی جانوں کو اسکے بعد ہم سب مل خدا کی بارگاہ ...

आयते एलाने विलायते अमीरूल मोमेनीन अलैहिस्सलाम

يَا أَيُّهَا الرَّسُولُ بَلِّغْ مَا أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ ۖ وَإِن لَّمْ تَفْعَلْ فَمَا بَلَّغْتَ رِسَالَتَهُ ۚ وَاللَّهُ يَعْصِمُكَ مِنَ النَّاسِ ۗ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِرِينَ   اے رسولؐ جو حکم تمہارے پروردگار کی طرف سے تم پر نازل کیا گیا ہے پہنچا دو اور اگر تم نے ایسا نہ کیا تو (سمجھ لو کہ) تم نے اس کا کوئی پیغام ہی نہیں پہنچایا اور (تم ڈرو نہیں) خدا تم لوگوں کے شر سے محفوظ رکھے گا خدا ہر گز کافروں کی قوم کو منزل مقصود تک نہیں پہنچاتا۔ 🔸Al-Maaida : 67🔸

जनाबे हानी बिन उरवाह

 जनाबे हानी कौन थे ❓ हानी इब्ने उरवाह क़बीला मुराद के सरदार थे, और जब ये चलते थे तो 12 हज़ार आहन पोश सवार इनके हमरेकाब होते थे। इस तरह जनाबे मुस्लिम अस ने हानी के घर में पनाह ले कर अपने को ज़ाहेरी तौर पर 12000 शमशीर ज़न बहादुरों के हल्क़े में पहुंचा दिया था। (📚तफ़सीरे कर्बला) , इमाम अली अ.स. के ख़ास सहाबी और कूफ़े के बुज़ुर्ग लोगों में से थे, आप जमल और सिफ़्फ़ीन की जंग में भी मौजूद थे, जब हुज्र इब्ने अदी ने ज़ेयाद इब्ने अबीह के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई तो हानी इब्ने उरवह उनके मिशन का अहम हिस्सा थे, और यज़ीद की बैअत के हमेशा विरोधी रहे, और उबैदुल्लाह इब्ने ज़ियाद के कूफ़ा पहुंचने के वक़ हानी का घर शियों के राजनीतिक और फ़ौजी लोगों का सेंटर था, मुस्लिन इब्ने अक़ील के क़ेयाम में आपका अहम किरदार था, मुस्लिम इब्ने अक़ील की शहादत के बाद आपका सर भी इब्ने ज़ेयाद के हुक्म से आपके बदन से अलग कर दिया गया, आपकी शहादत की ख़बर इमाम हुसैन अ.स. को कूफ़े के रास्ते में मिली, इमाम अ.स. आपकी शहादत की ख़बर सुन कर बहुत रोए और आप पर रहमत नाज़िल करने की अल्लाह से दुआ की, आपको कूफ़े के दारुल एमारह में ही दफ़्न क...

हज़रते मुस्लिम इब्ने अक़ील अलैहिस्सलाम

शहीद-ए-कूफ़ा हज़रत मुस्लिम बिन अक़ील (अ.स.) लेखक: पैग़म्बर नौगांवी सन 60 हिजरी में जब मुआविया के देहांत की ख़बर कूफ़ा पहुँची, तो सुलेमान बिन सरद खुज़ाई के घर में एक राजनीतिक बैठक हुई. यह उस समय की बात है जब इमाम हुसैन (अ.स.) यज़ीद की बैअत से इनकार करके मक्का की ओर हिजरत कर चुके थे, और इस बैठक में शामिल लोग इमाम हुसैन (अ.स.) के इस क़दम से वाक़िफ़ थे। इस बैठक में यह तय किया गया कि सब मिलकर इमाम हुसैन (अ.स.) की मदद करेंगे, उन्हें अकेला नहीं छोड़ेंगे और अपनी जानें भी उन पर क़ुर्बान कर देंगे. फिर बैठक के आयोजकों ने मिलकर इमाम हुसैन (अ.स.) को एक ख़त लिखा, जिसमें आप (अ.स.) को कूफ़ा आने का न्योता दिया गया। इस ख़त पर सुलेमान बिन सरद खुज़ाई, मुसैयब बिन नजबा, रिफ़ाआ बिन शद्दाद और हबीब इब्ने मज़ाहिर के दस्तख़त थे, और ये लोग इमाम अली (अ.स.) के शिया थे। यह ख़त इमाम हुसैन (अ.स.) की सेवा में 10 रमज़ान 60 हिजरी को पहुँचा, जब आप (अ.स.) मक्का में ठहरे हुए थे, और यह अहले-कूफ़ा की तरफ़ से पहला ख़त था। जब इस ख़त की ख़बर कूफ़ा में आम हुई, तो दूसरे कूफ़ियों ने भी इमाम हुसैन (अ.स.) को ख़त लिखना शुरू कर दिए, ता...

इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम की शान में अकवाले रसूल सअवव

इमाम हुसैन (अ) की शान में अकवाले रसूल (स) इमामे हसन (अ.स.) और इमामे हुसैन (अ.स.) दोनों के लिये रसूले इस्लाम की हज़ारो बल्कि बेशुमार हदीसों व अकवाले रसूले (स.अ.) से किताबें भरी पड़ी है। हमारे बुर्जुग व बुलन्द मर्तबा उलमाये केराम ने अपनी पूरी पूरी उम्र इस काम में सर्फ कर दी हैं। अगर उनका मुखतसिर ज़िक्र किया जाय तो मुकम्मल किताब की ज़रूरत है जो यहाँ पर मुमकिन नहीं है। फिर भी इमामे आली मुकाम की अज़मत व मर्तबा और पेशे खुऊदा उनका मकाम व शानो शौकत की महज़ एक झलक के तौर पर चन्द हदीसों व अक्वाले रसूल (स.अ. ) पेश किये जा रहे हैं। (सब तर्जुमे हैं) 1- परवरदिगार मैं हुसैन को दोस्त रखता हूँ। तू भी उसे और उसके दोस्तों को दोस्त रखना। (📚मुसनद अहमद इब्ने हम्बल) 2- मैं अहले बैत से जंग करने वाले के लिये सरापा जंग और सुलह करने वाले के लिये सरापा सुलह हूँ। (📚मसनद अहमद) 3- हुसैन मुझसे है और मैं हुसैन (अ.स.) से हूँ। परवरदिगार हुसैन (अ.स.) के दोस्त को दोस्त रखता है। (📚मसदन अहमद) 4- हसन (अ.स.) और हुसैन जन्नत के जवानों के सरदार है। (📚मसनद) 5- जो सरदारे जवानाने जन्नत को देखना चाहता है वह हुसैन (अ.स.) को देखे।...

ईद के रोज़ जन्नत से कपड़े आना

ईद के रोज़ जन्नत से कपड़े आना :-  एक बार ईद के मौके पर हसनैन (अ.स.) ने माँ से कहा मादरे गिरामी कल ईद है। मदीने के तमाम बच्चे नये कपड़े पहनेंगे और हम लोगों के पास लिबास नहीं है। हम ईद कैसे मनायेंगे? माँ फातिमा जहरा (स.अ.) ने कहा कि बच्चों तुम्हारे कपड़े दर्ज़ी के यहाँ गये हैं वह सिल कर लायेगा। अभी सुबह नहीं हुई थी कि किसी ने दरवाज़ा खटखटाया। घर की कनीज़ फिज़्ज़ा दरवाज़े पर गई। आने वाले ने कहा मैं हसनैन का दर्ज़ी हूँ। कपड़े लेकर आया हूँ। जनाबे फ़िज़्ज़ा ने कपड़ो को जनाबे सय्यदा (स.अ.) की ख़िदमत में पेश किया। वह कपड़े मये अम्मामों के थे। जनाबे फ़ातिमा (स.अ.) समझ गई कि कपड़े ख़ुदा ने भिजवाये हैं। और लाने वाला कोई और नहीं "रिज़वाने जन्नत" है और ये हसनैन (अ.स.) की फ़ज़ीलत है कि वह कपड़े सफेद थे मगर बच्चों ने कहा कि हमें रंगीन कपड़े चाहिये। रसूले इस्लाम तशरीफ़ लाये और बच्चों से पूछा कि तुम्हें कौन सा रंग पंसद है। इमामे हसन (अ.स.) ने सब्ज़ (हरा) और इमामे हुसैन (अ.) ने सुर्ख (लाल) रंग पंसद किया। जिबरईल आफताबा लिये हुए नाजिल हुआ और कपड़ों पर पानी डाला और कपड़े हस्बे ख्वाहिश सुर्ख और सब...

इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम की गर्दे क़दम और अबु हुरैरा लानती

इमाम हुसैन (अ.स.) की गर्दे क़दम और अबू हुरैरा :- अबू हुरैरा जो झूठी हदीसे गढ़ने में माहिर थे और मुआविया ने मौला अली (अ.) के ख़िलाफ़ झूठी हदीसों के गढ़ने की इन्हीं को जिम्मेदारी सौंपी थी। इनका ये हाल था कि ये नमाज़ हजरत अली (अ.) के पीछे पढ़ते थे और खाना मुआविया के दस्तरख्वान पर खाते थे। बहर हाल इस मुनाफ़िकत के बावुजूद एक बार एक मैयत में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और अबू हुरैरा साथ-साथ शरीक थे। साथ-साथ चल रहे थे। रास्ते में थोड़ी देर के लिये रूक गये तो 'अबू हुरैरा' ने फौरन रूमाल निकाल कर इमामे हुसैन के पाये मुबारक की ख़ाक और जूतियों की गर्द झाड़ना शुरू कर दी। 'इमामे हुसैन (अ.स.) ने मना किया तो 'अबू हुरैरा' ने कहा "मौला मना न फ़रमायें। आप इस काबिल है कि आपकी गर्दे क़दम साफ करूँ। मुझे यकीन है कि अगर लोगों को आपके फज़ायल व करामात मालूम हो जायें जो मैं जानता हूँ तो ये लोग आपको अपने कन्धों पर उठाये फिरे। (📚तारीख़े तबरी जिल्द 3 पेज 19)

एतेराफ़े शरफ़

एतेराफे शरफः- एक बार का ज़िक्र है कि खलीफा-ए-दोम मिंबर पर खुतबा दे रहे थे कि इमामे हुसैन (अ.स.) मस्जिद में दाखिल हुए और ख़लीफ़ा को मुख़ातिब करके बोले कि मेरे बाप के मिंबर से उतर आ। ख़लीफा मिंबर से उतर आये और कहा मेरे माँ बाप आप पर फिदा हों कभी-कभी आ जाया कीजिये। दोबारा मुलाकात पर कहा फज़न्दे रसूल मुझ पर मेरे बेटे से ज़्यादा आपका हक़ है। (📚असाबा पेज 252) उलमाये अहले सुन्नत का बयान है कि एक दिन 'अब्दुल्लाह इब्ने उमर' इमामे हसन (अ.स.) और इमामे हुसैन (अ.स.) के सामने फर्ख़ा इफ़्तिख़ार की बातें करने लगे जिनमें गुरूर झलक रहा था। ये सुन कर इमामे हसन (अ.स.) ने फ़रमाया कि तुम "गुलाम ज़ादे" हो। इस पर अब्दुल्लाह इब्ने उमर रंजीदा हुए। अपने बाप के पास गये और इमाम हसन (अ.स.) ने जो कुछ कहा था उनसे बयान किया। ये सुनकर बाप ने कहा कि बेटा ये बात उनसे लिखवा लो अगर लिख दे तो मेरे कफ़न में रख देना। इस रिवायत को शायरों ने भी नज़्म किया है इस लिये बहुत मशहूर है। रावी कहता है कि एक दिन 'अब्दुल्लाह इब्ने उमर' खाना-ए-काबा के साये में बैठे हुए थे लोगों से गुफ़्तुगू कर रहे थे कि उसी दौरा...

इबादते इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम

इमामे हुसैन (अ.स.) की इबादत :- इमामे हुसैन (अ.स.) आबिदे शब ज़िन्दादार थे। बेशुमार नमाज़े पढ़ते थे। दिन भर रोज़ा रहते थे। मदीना-ए-मुनव्वरा में क्याम के ज़माने में 25 हज पा प्यादा किये। इराक में कयाम के दौरान बनी उम्मैया की हंगामा अराइयों की वजह से आपको हज करने का मौका नहीं मिला। (📚असदुल गाबा जिल्द 3 पेज 27) शौके इबादत का सबसे बड़ा मुज़ाहिरा कर्बला के मैदान में हुआ जब आपने 9 मोहर्रम को फौजे यज़ीद से एक शब की मोहलत सिर्फ़ ख़ुदा की इबादत के लिये माँगी थी। रावी लिखता है कि इमाम हुसैन (अ.स.) के खेमों से तसबीहो तहलील की अवाज़े इस तरह आ रही थी जैसे शहद की मक्खियों के छत्ते से भनभनाहट की आवाज आती है। इमामे हुसैन (अ.स.) के शौके इबादत और बन्दगी की मेराज वह सजदा है जो उन्होंने तीन दिनों की भूख और प्यास की हालत में शिम्र मलऊन के कुन्द ख़न्जर के नीचे अदा किया और ख़ुदा ने उन्हें नफ़्से मुतमेइन्ना की सनद अता फरमाई।

इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम की सख़ावत

इमाम हुसैन (अ.स.) की सख़ावत :- इमामे हुसैन (अ.स.) अपने पिदरे बुर्जुगवार मौला अली (अ.) और अपने बड़े भाई इमामे हसन (अ.स.) की तरह से ही सखी थे। आप अपनी पुश्त पर अनाज और दीगर चीज़ों को लाद कर रात में गरीबों के घर पहुँचाते थे। आपकी शहादत के बाद आपकी पुश्ते मुबारक पर गटठरों के ढ़ोने के घट्टे पड़े हुए देखे गये थे। एक बार रसूले इस्लाम के सहाबा "उसामा बिन ज़ियाद" बीमार पड़ गये और इमामे हुसैन (अ.) उनकी अयादत के लिये तशरीफ़ ले गये। आपने देखा कि उसामा बहुत रंजीदा है। इमाम हुसैन (अ.) ने वजह मालूम की। उसामा ने अर्ज की मौला सात हज़ार दिरहम का कर्ज़दार हूं । आपने फ़रमाया घबराओ नहीं मैं क़र्ज़ अदा कर दूँगा और इमाम ने उसामा पर जो क़र्ज़ था वह अदा भी कर दिया। इसी तरह एक बार एक देहाती मदीने में आया और उसने लोगों से पूछा कि यहाँ सबसे ज़्यादा सखी कौन हैं? लोगों ने "इमामे हुसैन" का नाम बताया। वह इमामे हुसैन (अ.स.) की ख़िदमत में हाज़िर हुआ। मौला ने उसको चार हज़ार अशरफियां इनायत कर दी। इन्सानियत व सख़ावत का सबसे बड़ा वाकेआ और मुज़ाहिरा तो वह है जब कर्बला के रास्ते में दुश्मन का लश्कर आपका र...

नुसरते इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम के लिए हुक्मे रसूल सअवव

इमामे हुसैन (अ.स.) की नुसरत के लिये रसूले अकरम का हुक्मः- रसूले अकरम के सहाबी "उन्स बिन हारिस" का बयान है कि इमामे हुसैन (अ.स.) रसूले अकरम की गोद में थे। रसूले अकरम हुसैन (अ.स.) को प्यार कर रहे थे इसी दौरान आपने फ़रमाया कि "मेरा ये फरज़न्दे 'हुसैन" उस ज़मीन पर क़त्ल किया जायेगा जिसका नाम कर्बला है। देखो तुम मे से उस वक़्त जो भी मौजूद हो उसके लिये ज़रूरी है कि वह हुसैन की मदद करें। चुनांचे उन्स बिन हारिस कर्बला में मौजूद थे और उन्होंने हुसैन की नुसरत करते हुए जामे शहादत नोश किया। 📚असदुल गाबा जिल्द 1 पेज 123, 349, असाबा जिल्द 1 पेज 68, कनजुल अमाह जिल्द 6 पेज 223, जरवारिल उन्मबा मुहिब तबरी पेज 146)

इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम का मर्तबा पेशे ख़ुदा

इमामे हुसैन (अ.स.) का मर्तबा पेशे खुदाः- रसूले अकरम महज़ दुनियावी रिश्ते से हुसैन (अ.स.) को नहीं चाहते थे बल्कि ख़ुदा वन्दे आलम की खुश्नूदी भी इस मोहब्बत में शामिल थी जिनके गवाह सैकड़ों वाकेआत हैं। कुछ का ज़िक्र हम कर चुके हैं। एक वाकेआ ये भी है कि एक दिन इमामे हसन (अ.स.) और इमामे हुसैन (अ.स.) ने तख़्ती लिखी फिर आपस में मुकाबला हुआ कि किसकी तहरीर अच्छी है। दोनों अपने नाना के पास गये। नाना रसूले अकरम ने कहा कि अपने बाबा "अली" (अ.स.) के पास जाओ। दोनों भाई हज़रत अली के पास गये। अली (अ.स.) ने कहा कि अपनी माँ फ़ातिमा (स.अ.) के पास जाओ। दोनो भाई अपनी माँ की ख़िदमत में हाज़िर हुए और सवाल किया कि मादरे गिरामी किसका ख़त अच्छा है। माँ ने फ़रमाया दोनों का लेकिन अगर तुम नही मुतमइन हो तो इसका फैसला अल्लाह करेगा। मैं अपना गुलूबन्द तोड़े देती हूँ। दोनों इसके मोती चुन लो। उन्होंरे हार तोड़ कर डाल दिया जिसमें सात मोती थे। दोनों बच्चों ने मोती चुने और दोनों के हाथ तीन तीन मोती आये आख़िरी मोती के बचते ही ख़ुदा के हुक्म से जिबरईल नाज़िल हुए और उन्होंने मोती को दो हिस्सों में बाँट दिया। दोनों बच्च...

सहाबी ए रसूल हज़रते अबुज़र ग़फ़्फ़ारी रअ

हज़रते अबुज़र ग़फ़्फ़ारी रअ हजरत अबुज़र ग़फ़्फ़ारी मदीने से मशिरक की जानिब वाके एक छोटे से गांव "रबज़ा" के रहने वाले थे। आपका असल नाम जनदिब बिन जनादा था। जब रसूले अकरम सल० के बारे में सुना तो मक्के आये और ख़िदमते पैग़म्बर सल० में बारयाब होकर इस्लाम कुबूल किया जिस पर कुफ़्फ़ारे कुरैश ने उन्हें तरह तरह की तकलीफें और अज़ीयतें पहुंचाई मगर आपके सिबाते कदम में लगज़िश न आई। इस्लाम कुबूल करने वालों में आप पांचवें नम्बर पर शुमार किये जाते हैं। इस सबकते इस्लामी के साथ आपके ज़ोहद व तक़वा का यह आलम था कि रसूले अकरम सल० ने फ़रमाया, मेरी उम्मत में अबुज़र ज़ोहद व विरा में ईसा बिन मरयम की मिसाल हैं। आप उमर के ज़मानये ख़िलाफ़त में शाम चले गये थे और उस्मान के ज़मानये ख़िलाफ़त में भी वहीं मुकीम रहे और शब व रोज हिदायत व तबलीग़ के फाएज़ अंजाम देते रहे। हाकिमे शाम माविया को आपका तरीक़ा तबलीग़ गिरां गुजरता था क्योंकि आप उस्मान की सरमायादारी, अक़रूबा परवरी और बेराह रवी पर खुल्लम खुल्ला नक़द व तबसिरा किया करते थे। मगर उसके बावजूद माविया के कुछ बनाये न बनती थी। आख़िरकार उसने उस्मान को लिखा कि अगर अबुज...